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गडकरी पर संघ का वरदहस्त

बीजेपी अपना खुद का अध्यक्ष चुनना चाहती है लेकिन आरएसएस है कि मानने को तैयार नहीं. वह इस अंदरूनी लड़ाई में अपनी जीत के लिए जनता के सामने अपनी छवि को चोट पहुंचाने को भी तैयार है.

नितिन गडकरी
नितिन गडकरी
अपडेटेड 1 दिसंबर , 2012

छह नवंबर को 11 बजे सुबह संघ विचारक एस. गुरुमूर्ति ने वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी से उनके दिल्ली के 30 पृथ्वीराज रोड स्थित निवास पर मुलाकात की. मिठाइयों और कॉफी की चुस्कियों के बीच चार्टर्ड एकाउंटेंट गुरुमूर्ति ने आडवाणी को मनाने की कोशिश की कि अध्यक्ष नितिन गडकरी की कारोबारी गतिविधियों में कुछ भी अनैतिक या कानूनी तौर पर गलत नहीं है. लेकिन उनकी बात को समझाने की बजाए बीजेपी के वरिष्ठ नेता ने उलटे गडकरी के इस्तीफे की मांग कर डाली.

संघ और आडवाणी के रिश्तों में उस समय से ही तनातनी चल रही है जब 2005 में मुहम्मद अली जिन्ना पर की गई टिप्पणी की वजह से आडवाणी को पार्टी अध्यक्ष की कुर्सी छोडऩे के लिए विवश होना पड़ा था. आडवाणी के विरोध से गडकरी का बचाव करने के संघ के इरादे को और बल मिल गया है.

बैलेंस शीट और दस्तावेजों के साथ लैस होकर गुरु मूर्ति ने राज्यसभा सांसद बलबीर पुंज के साथ आडवाणी के पास दो घंटे बैठकर उन्हें पूर्ति ग्रुप के वित्तीय लेन-देन के बारे में विस्तार से बताया और दावा किया कि गडकरी कहीं भी दोषी नहीं हैं. गुरुमूर्ति ने दलील दी कि गडकरी पर लगे आरोपों की वजह दरअसल ‘‘तकनीकी विसंगतियां” हैं,  न कि जान-बूझकर किया गया भ्रष्टाचार. उन्होंने माना कि भ्रष्टाचार के आरोपों से खुद को बाहर निकालने में बीजेपी अध्यक्ष की ओर से हुई देरी पार्टी के लिए महंगी साबित हुई है.BJP

नतीजा सिफर रहा. जन-आंदोलन के जरिए राजनैतिक मंच पर आ विराजे अरविंद केजरीवाल ने जब उनके खिलाफ  आरोपों की बौछार की थी तो उस समय आडवाणी ही उनका साथ देने खड़े हुए थे, लेकिन अब उनके तेवर पूरी तरह बदले हुए हैं. आडवाणी ने गुरुमूर्ति से कहा कि लोगों के मन में पार्टी की जो छवि थी, वह मैली हो रही है और गडकरी की शख्सियत पर लगे छींटे साफ नहीं होने वाले,  लिहाजा उन्हें 17 दिसंबर को अपने कार्यकाल के खत्म होने से पहले इस्तीफा दे देना चाहिए.

गुरुमूर्ति ने जैसे ही संघ के आला नेताओं को नागपुर में यह बात बताई,  उन्होंने उन्हें निर्देश दिया कि वे पार्टी के अन्य नेताओं से मुलाकात कर अपने नेता के लिए समर्थन जुटाएं.

इसी बीच गडकरी को दिल्ली के 11 अशोक रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में शाम को पार्टी की कोर समिति की बैठक बुलाने के लिए कहा गया, जिसमें गुरुमूर्ति को भी मौजूद रहना था. आडवाणी और संघ के बीच एक अनिर्णय की स्थिति बन गई है. संघ के एक नेता ने बताया, ‘‘गुरुमूर्ति को जो संदेश देना था वह स्पष्ट थाः गडकरी अपना कार्यकाल पूरा करेंगे और उन्हें हटाने के लिए संघ पर कोई दबाव नहीं डालेगा.”

फिर भी, अगर संघ गडकरी को हटाने की बात मान भी ले तो उसके पास कोई तैयार विकल्प नहीं है. उनकी दलील है कि इसकी कोई गारंटी नहीं है कि नए अध्यक्ष को कांग्रेस या पार्टी के अपने ही सहयोगियों के षड्यंत्र का सामना नहीं करना पड़ेगा. संघ के एक नेता ने कहा, ‘‘कांग्रेस और केजरीवाल सरीखे लोग उनकी म्यान के जंग को खंगालने के लिए अपनी पूरी ऊर्जा झोंक देंगे और आज, इस युग में कुछ भी खोज लेना वाकई मुश्किल नहीं है.”

इसलिए फिलहाल संघ के लिए जो हैं सो गडकरी ही हैं. संघ के पूजनीय नायकों में से एक विवेकानंद के आइक्यू की तुलना माफिया सरगना दाऊद इब्राहिम से करने के बाद उनके बड़बोलेपन की आदत पर उन्हें मामूली टहोका देते हुए आगाह किया गया कि वे अपनी बोली पर लगाम रखें.BJP gadkari

वैसे गडकरी का दूसरा कार्यकाल कंपनी रजिस्ट्रार की जांच पर टिका है. बीजेपी नहीं चाहेगी कि गडकरी दोबारा कुर्सी पर आएं, लेकिन शीर्ष नेता उत्तराधिकारी के मामले पर एकमत नहीं हैं. वैसे संभावित विकल्पों में राजनाथ सिंह और एम. वैंकैया नायडु के नाम शामिल हैं, जो पहले भी बीजेपी अध्यक्ष का पद संभाल चुके हैं, इसके अलावा वरिष्ठ उपाध्यक्ष शांता कुमार का नाम भी सामने है. कुछ नेता ऐसे भी हैं जो महसूस करते हैं कि संघ के पास अंत में लोक सभा और राज्यसभा के विपक्ष के नेता—सुषमा स्वराज या अरुण जेटली में से किसी एक को चुनने के सिवा कोई और चारा नहीं होगा.

बीजेपी के अंदर की लड़ाई संघ और गैर-संघी नेताओं के बीच ठनी है. जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा जैसे वरिष्ठ नेताओं ने, जो संघ से नहीं जुड़े हैं, गडकरी के विरोध में राज्यसभा सांसद राम जेठमलानी से हाथ मिला लिया है. जेठमलानी ने 2 नवंबर को आडवाणी को चिट्ठी में लिखा, ‘‘गडकरी को अध्यक्ष पद पर बरकरार रखना देश और बीजेपी की बर्बादी का सबब होगा.” काफी नुकसान हो चुका है, अगर जमकर कोशिश की जाए तो अब भी सब कुछ सुधारा जा सकता है, और उन्होंने गडकरी के इस्तीफे की मांग की.

गुरुमूर्ति ने बाद में शाम को राम जेठमलानी से मुलाकात की लेकिन उनका फैसला बदलवाने में नाकाम रहे. जेठमलानी ने हैरानी जताई कि ‘कुछ ही घंटों में’ गुरुमूर्ति ने पूर्ति ग्रुप के विस्तृत दस्तावेजों को पढ़कर गडकरी को फटाफट क्लीन चिट कैसे दे दी.

इस बीच 6 नवंबर को गडकरी स्वराज और जेटली से मिलने पहुंचे. सूत्रों के अनुसार स्वराज ने गडकरी को पार्टी के ‘सबसे बुजुर्ग और सबसे बुद्धिमान्य नेता के लिए पद छोडऩे की सलाह दी थी. माना जाता है कि सुषमा ने यहां तक कहा कि 8 नवंबर को आडवाणी के 85वें जन्मदिन पर पार्टी को इस बारे में घोषणा करनी चाहिए. इसके बाद गुरुमूर्ति ने सुषमा से भेंट की और फिर सुषमा ने आनन-फानन में गडकरी के समर्थन में ट्वीट कर डाला. एक बीजेपी नेता कहते हैं, ‘‘दरअसल, सुषमा संघ से अपने रिश्तों को बेहतर करना चाहती हैं और इसमें वह कुछ हद तक सफल भी रहीं. वैसे भी, उन्हें पार्टी में अपने भविष्य के बारे में सोचना है. आडवाणी जी वहां बहुत समय तक तो रहेंगे नहीं.”

यह सही है कि संघ अभी बैकफुट पर है, लेकिन बीजेपी पर उसके असर को कमतर नहीं आंका जा सकता. संघ परिवार में उभरते नए समीकरण के बीच जेटली ने इस मुद्दे पर पूरी तरह चुप्पी साध रखी है जो एक तरह से गडकरी के प्रति उनके समर्थन पर सवाल खड़े करती है.

हाल-फिलहाल पार्टी में इस तरह की चर्चा जोरों से होती रही है कि जेटली मजबूती के साथ गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के पाले में जा खड़े हुए हैं और मोदी के साथ गडकरी के असहज रिश्तों की बात जगजाहिर है. सूत्रों के मुताबिक कोर कमेटी की बैठक के बाद जेटली ने गडकरी के समर्थन में सुषमा स्वराज के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस करने से भी इनकार कर दिया, जैसा कि इन दोनों ने गडकरी के समर्थन में पहले किया था.

कोर कमेटी ने गडकरी के पक्ष में मजबूती के साथ खड़ा होने का फैसला किया और जेटली को पार्टी की स्थिति को स्पष्ट करते हुए बयान तैयार करने को कहा गया. जेटली इसके लिए तो राजी हो गए, लेकिन उन्होंने इस बयान को सुषमा के साथ पढऩे से इनकार कर दिया. तब इस काम का जिम्मा पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद को सौंपा गया.

बयान में पार्टी के साथियों से अपील की गई कि वे बीजेपी अध्यक्ष के साथ पक्ष में खड़े रहें. बयान में कहा गया, ‘‘पार्टी की ऐसी छवि नहीं जानी चाहिए कि वह मीडिया के एक तबके और विपक्ष के अभियान के दबाव में आ गई. आरोपों में कोई दम नहीं है.” इसके साथ ही पार्टी नेताओं के इस मुद्दे पर बयान देने पर पाबंदी लगा दी गई.

एक पार्टी कार्यकर्ता ने कहा, ‘‘पार्टी के भीतर दुविधा और उथल-पुथल का माहौल है. इसमें संदेह नहीं कि संघ की स्थिति नैतिक रूप से कमजोर हुई है, लेकिन पार्टी के अंदर ऐसा कोई नहीं है जो इसका विरोध कर सके. आडवाणी कमोबेश हाशिए पर डाल दिए गए हैं. जेठमलानी की योजना के मुताबिक जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा और शत्रुघ्न सिन्हा भी बीजेपी कार्यकारिणी से इस्तीफा देने से हिचक गए.”

संघ के एक वरिष्ठ नेता ने इंडिया टुडे से कहा, संगठन गडकरी का समर्थन करता रहेगा. उन्होंने बड़ी बेबाकी से माना कि गडकरी को हटाने से बीजेपी पर संघ की पकड़ ढीली पड़ जाएगी. उन्होंने पलटकर सवाल किया, ‘‘गडकरी को ही इस्तीफा क्यों दे देना चाहिए? उन्हें कांग्रेस और पार्टी का एक गुट जान-बूझकर निशाना बना रहा है. यदि वे इस्तीफा देते हैं तो ये तत्व और मजबूत होंगे. तब हम पर और भी हमले होने लगेंगे क्योंकि ये लोग हमें आसान शिकार मान लेंगे.”

संघ अनावश्यक रूप से आम लोगों की सोच को तवज्जो नहीं दे रहा. संघ के एक अन्य नेता ने हालात का विश्लेषण कुछ इस तरह किया,  ‘‘हम बेवजह इस बात से परेशान नहीं होते कि लोग क्या सोचते हैं. अभी तो हमारे लिए यह अहम है कि पार्टी के लोग क्या सोचते हैं. इसलिए गुरुमूर्ति जी को भेजा गया जिससे पार्टी के भीतर चल रही परस्पर विरोधी धाराओं पर अंकुश लगाया जा सके. जनता की याददाश्त बहुत कमजोर होती है, वह जल्दी ही गडकरी के खिलाफ  आरोपों को भूल जाएगी. देखिए तो, भ्रष्टाचार के आरोपों के बावजूद कांग्रेस ने भी तो सलमान खुर्शीद को आगे बढ़ा दिया.”

संघ जो भी सोचे, लेकिन बीजेपी के अंदर एक बड़ा प्रभावशाली खेमा आर-पार के मूड में नजर आ रहा है. कई नेता ताजा हालात को संघ के साये से निकल कर एक अलग राह अख्तियार करने के मौके के तौर पर देख रहे हैं. यह जरूर है कि विरोध के स्वर मुखर नहीं हैं, लेकिन इस तरह सोचने वालों को लगता है कि पार्टी की छवि को जो आघात पहुंचा है, उसे दुरुस्त करने की जरूरत है.

जैसा कि अकेले मोर्चा संभाल रहे जेठमलानी ने 7 नवंबर को कहा, ‘‘यह मेरी जिम्मेदारी बनती है कि पार्टी को आगाह करूं कि उसकी नैतिक जमीन कमजोर हो रही है इससे भ्रष्टाचार के खिलाफ  लडऩे की पार्टी की ताकत भी कुंद हो रही है. यह जनता के साथ धोखा है.” अभी तो जेठमलानी ने अकेले ही विरोध का झंडा बुलंद कर रखा है, लेकिन उन्हें भरोसा है कि जल्द ही दूसरे लोगों में भी ‘पार्टी और देशहित’ के लिए आवाज उठाने की हिम्मत आ जाएगी.
 —साथ में देवेश कुमार

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