पश्चिम बंगाल के कांग्रेस विधायकों का एक प्रतिनिधिमंडल 25 सितंबर को नई दिल्ली में था. वे केंद्रीय मंत्रियों से मिलकर राज्य के लिए परियोजनाएं मंजूर करवा रहे थे. जैसे ही वे केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश के ऑफिस में पहुंचे, रमेश जोर से बोले 'मुक्ति!' पूरे प्रतिनिधिमंडल ने पूरे उत्साह के साथ उनकी इस बात पर सहमति जताई. रमेश अकेले ऐसे कांग्रेसी नहीं हैं जो ममता बनर्जी के गठबंधन से बाहर होने पर राहत महसूस कर रहे हैं. कांग्रेस के एक धड़े का यह भी मानना है कि ममता बनर्जी की तुनकमिजाज मौजूदगी की जगह उनके बिना चलने वाली सरकार ज्यादा सक्षम और सक्रिय गठबंधन साबित होगी.
निश्चित रूप से प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी टीम के मंत्री ममता की गैरमौजूदगी का मातम मनाने में जरा भी समय बर्बाद नहीं कर रहे. जैसा कि एक कैबिनेट मंत्री कहते हैं, ''कम से कम इससे कोल-गेट सुर्खियों से बाहर हो गया है. अब अगर जाना भी पड़ा तो यह आर्थिक सुधारों जैसे सकारात्मक पहलू के कारण होना चाहिए, किसी घोटाले के कारण नहीं.''
कोयला घोटाले से घिरी कांग्रेस एक महीने से भी ज्यादा समय से सुर्खियों में छाई कहानी को बदलने की कोशिशों में लगी हुई थी. अचानक सरकार योजनाओं और वादों से लबरेज हो गई और फिर से एजेंडे पर लौट आई. असल में न भी सही, कम से कम लगता तो ऐसा ही है. 25 सितंबर को कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में सोनिया गांधी ने अपने उद्घाटन भाषण में मनमोहन सिंह के सुधारों का पुरजोर समर्थन किया जो अब तक मुरझाए पार्टी कार्यकर्ताओं को सहारा देने के लिए काफी था.
यह खेल असल में जून के आखिरी हफ्ते से शुरू हुआ, जब यह तय हो गया था कि प्रणब मुखर्जी को अगला राष्ट्रपति बनाया जाएगा. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष सी. रंगराजन वित्त मंत्रालय में पी. चिदंबरम को वापस लाने के लिए प्रधानमंत्री के सामने पैरवी करने लगे. बताया जाता है कि उन्होंने मनमोहन से कहा, ''हम यह जानते हैं कि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्या करना है. लेकिन ऐसा करने के लिए हमें नेताओं की जरूरत है, टेक्नोक्रेट्स की नहीं. ''
अगस्त के पहले सप्ताह में रंगराजन की इच्छा पूरी हुई. यूपीए-2 में पहली बार प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री एक ही तरह की नीतिगत सोच वाले थे और वे आपस में संवाद भी कर रहे थे. तथ्य यह है कि मोंटेक सिंह आहलुवालिया और रंगराजन जैसे टेक्नोक्रेटिक दिमाग पर भरोसा जताने के मामले में प्रधानमंत्री के साथ चिदंबरम भी शामिल हो गए. ये सभी लोग पी.वी. नरसिंहराव के प्रधानमंत्री रहने के दौरान महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके थे जिससे सुधारों के एजेंडे पर आपसी तालमेल बनाने में आसानी हुई. यह एजेंडा 45 दिनों के भीतर सार्वजनिक किया जाना था.
सरकार ने 14 सितंबर को मल्टी-ब्रांड रिटेल, एविएशन, ब्रॉडकास्टिंग और पावर ट्रेडेड एक्सचेंजों को विदेशी निवेश के लिए खोलकर सबको हैरत में डाल दिया. इसके बाद 24 सितंबर को सरकार ने घोषणाओं की एक और फेहरिस्त का खुलासा कर दिया. तब तक भारतीय अर्थव्यवस्था को सुधारने का जिम्मा पाने वाली टीम का मूड आशावादी हो चुका था.
एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, अतिसक्रिय चिदंबरम अपने पहले 100 दिन के कार्यकाल में ही कुछ बदलाव लाने को प्रतिबद्ध थे. कोल-गेट की आंच ने पहले 50 दिन के भीतर ही उनके सामने ऐसा कुछ करने का मौका खोल दिया. ये अधिकारी बताते हैं, ''अब वे हर माह कुछ न कुछ घोषणाएं करेंगे.''
चिदंबरम के सहयोग से प्रधानमंत्री कांग्रेस कार्यसमिति को अपने एजेंडे का समर्थन करने को राजी कर सके. आर्थिक वृद्धि दर 5 फीसदी से नीचे आ गई है, रोजगार के मौके सिकुड़ते जा रहे हैं, निवेशक दूसरे देशों की ओर रुख कर रहे हैं और महंगाई लगातार 8 फीसदी से ऊपर बनी हुई है, ऐसे में सरकार को अपने मजबूत इरादों का संकेत देना ही था. कुछ न करने और महंगाई से आने वाली मंदी को बने रहने देने का सरकार को कहीं ज्यादा खामियाजा भुगतना पड़ता, उस अल्पकालिक राजनैतिक कीमत की तुलना में जो डीजल की कीमत बढ़ाने, एलपीजी सब्सिडी या बिजली दरें बढ़ाने से चुकानी पड़ती है.
यही नहीं, संभवत: इन उपायों का सरकार को असल फायदा मिलने के लिहाज से भी बहुत देर हो चुकी है क्योंकि इसमें बहुत समय लगता है. फिर भी सरकार अब जब भी नए सिरे से जनता के दरबार में जनादेश के लिए जाएगी तो उसके पास खड़े रहने के लिए एक आधार तो होगा. पिछले पखवाड़े सरकार की घोषणाओं के बड़े हिस्से को वास्तविक सुधार माना जा सकता है, जिनका उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने साफ संकेत देना है. हालांकि, कई ऐसे साफ-सफाई वाले उपाय हैं जिन पर किसी भी तरह के अतिरिक्ïत खर्च की जरूरत नहीं होगी. इसी तरह मौजूदा कल्याणकारी योजनाओं में सुधार और बाजार के मूड को सुधारने के लिए भी कुछ कदम उठाए गए हैं.
वाजिब सुधार
एफडीआई से यूपीए के गंभीर कदम का इशारा
विश्लेषकों का कहना है कि एफडीआइ के लिए घोषणाएं इस बात के लिए ज्यादा की गई हैं कि पार्टी में नई जान फूंकी जा सके, विदेशी निवेशकों के सामने अपने इरादों का इजहार किया जा सके और रेटिंग एजेंसियों की रेटिंग को और अधिक गिराने से रोका जा सके. सरकार ने अपने दो अल्पकालिक लक्ष्य तो हासिल कर लिए. लेकिन 25 सितंबर को स्टैंडर्ड ऐंड पूअर्स ने भारत के वृद्धि अनुमान को और घटाकर 5.5 फीसदी कर दिया. इन उपायों का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पर असर होने में अभी समय लगेगा. क्रिसिल रिसर्च में डायरेक्टर (बॉक्स देखें) बिनैफर जहानी ने कहा, ''पिछले पांच साल में आए करीब 190 अरब डॉलर (9,50,000 करोड़ रु.) के एफडीआइ की तुलना में देखें तो रिटेल में आने वाला एफडीआइ सीमित साबित हो सकता है.
डीजल कीमतों में बढ़ोतरी और सब्सिडी वाले एलपीजी सिलिंडर की आपूर्ति को सीमित कर सरकार ने यह संकेत दिया है कि वह अपने वित्तीय घाटे को काबू में रखने के लिए प्रतिबद्ध है. इससे मौजूदा वित्त वर्ष में ही सरकार के ईंधन सब्सिडी बोझ में 20,000 करोड़ रु. की कमी आएगी. फिर भी, यह सरकार के कुल ईंधन सब्सिडी की तुलना में बहुत छोटा हिस्सा ही होगा. 2011-12 में सरकार की कुल ईंधन सब्सिडी बढ़कर 1.40 लाख करोड़ रु. तक पहुंच गई है. डीजल की कीमत बढ़ाने और एलपीजी पर अंकुश लगाने के बाद भी इस वित्त वर्ष में सब्सिडी का बोझ बढ़ते हुए 1.70 लाख करोड़ रु. तक पहुंच सकता है. वाजिब सुधारों के बारे में हैदराबाद स्थित इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस के कृष्णमूर्ति सुब्रह्मण्यम का तर्क है कि सरकार को नियंत्रित मूल्य व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म कर देना चाहिए. उन्होंने कहा, ''डीजल का उपभोग करने वाले कौन लोग हैं? इसे ज्यादातर धनी किसान और उच्च मध्य वर्ग के लोग इस्तेमाल करते हैं. ऐसे लोगों को सब्सिडी की जरूरत नहीं है. ''
बिजली कंपनियों को राहत आधे मन से किए गए सुधार का अच्छा उदाहरण है. राज्यों की वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) को 31 मार्च, 2011 तक कुल मिलाकर 1.9 लाख करोड़ रु. का घाटा हो चुका था. लंबे समय से बिजली दरों में बदलाव न होने, सब्सिडी का भुगतान न होना, ऊंची कीमत पर बिजली खरीदना और वितरण में भारी नुकसान, राज्य बिजली बोर्डों (एसईबी) के खस्ताहाल होने की मुख्य वजहें हैं. पीएमओ ने 16 मई को हुई एक बैठक में वितरण कंपनियों की देनदारी की नए सिरे से व्यवस्थित करने के लिए एक प्रस्ताव का समर्थन किया था. प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव पुलक चटर्जी की 6 जून को बुलाई गई एक बैठक में इसके लिए खाका तैयार किया गया.
इसके मुताबिक, 31 मार्च, 2012 तक की बकाया शॉर्ट टर्म देनदारी (एसटीएल) का 50 फीसदी राज्य सरकारें वहन करेंगी. बाकी 50 फीसदी की बैंक रीस्ट्रक्चरिंग करेंगे और सैद्धांतिक रूप से तीन साल के एक स्थगन के बाद डिस्कॉम्स इसका पालन करेंगी. इसे राज्य सरकारों की गारंटी भी हासिल होगी. सुब्रह्मण्यम कहते हैं, ''कर्ज को रीस्ट्रक्चर करना अच्छी चीज है, लेकिन यह अधूरा कदम ही है. एसईबी इतने भारी कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं कि वे बेकार हो चुके उपकरणों की जगह नए उपकरण लाने के लिए नया इन्वेस्टमेंट नहीं कर पाते.
31 जुलाई को जो ग्रिड ठप पड़ गए थे, उसके पीछे मुख्य वजह यही थी. '' वे कहते हैं, ''इससे कुछ वित्तीय बोझ् पड़ सकता है, लेकिन राज्य इसे वहन कर सकते हैं. बिजली दरों को तर्कसंगत बनाने जैसी संरचनात्मक समस्याओं का समाधान करना चाहिए.'' भारत में बिजली की खुदरा दरें विकसित देशों के मुकाबले प्रति यूनिट 4.16 रु. से 5.20 रु. तक कम हैं और इसी प्रकार अन्य विकासशील देशों के मुकाबले प्रति यूनिट 2.08 रु. से 4.16 रु. तक कम हैं.
बजट प्रस्तावों की रीपैकेजिंग
फोकस में लौटा आम आदमी
अपने को 'आम आदमी' और 'गरीब समर्थक' दिखाने के उद्देश्य से सयाना कदम उठाते हुए सरकार ने एकीकृत बाल विकास सेवाओं (आइसीडीएस) जैसी अपनी पुरानी योजनाओं की नए सिरे से पैकेजिंग की है और एक सुधरा हुआ राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन लाने और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा बिल को लागू करने की प्रतिबद्धता जाहिर की है. तर्क दिया जा रहा है कि वित्तीय सुधारों की वजह से सरकार कल्याणकारी योजनाओं (सिर्फ केंद्र सरकार की ऐसी योजनाओं की संख्या 225 तक पहुंच चुकी है) पर अपना ध्यान केंद्रित कर सकेगी. सरकार ने बुद्धिमत्ता दिखाते हुए ऐसी योजनाओं का चुनाव किया है जिस पर खर्च का बोझ कम से कम पड़े या जिनके लिए भविष्य में खर्च करना पड़े.
आइसीडीएस को इस साल शुरू होने वाली 12वीं पंचवर्षीय योजना में नए सिरे से पेश किया गया है और इसके लिए केंद्र के मौजूदा 1,23,580 करोड़ रु. के बजटीय आवंटन से ही खर्च होगा. माताओं और शिशुओं के कुपोषण से निपटने के लिए पहले चरण में यह 200 जिलों में लागू होगा. करीब 22,500 करोड़ रु. के बजटीय आवंटन वाले राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन को राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन के साथ मिलाया गया है. स्वास्थ्य मंत्रालय इस विस्तारित स्वास्थ्य योजना का खाका अब भी तैयार कर रहा है. जहां तक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की चेयरपर्सन सोनिया गांधी के पसंदीदा फूड सिक्यूरिटी बिल का सवाल है, यह फिलहाल खाद्य मामलों की संसद की स्थायी समिति के पास है. इस पर 12वीं योजना में 1,02,000 करोड़ रु. खर्च होने का अनुमान है.
सरकार के प्रबंधक इस पर अपना मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं कि आखिर राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, सबके लिए भोजन कार्यक्रम या प्रस्तावित ग्रामीण विकास फ्लेक्सी फंड, जो 40,000 करोड़ रु. की राशि से शुरू होगा, के लिए पैसा कहां से आएगा. वित्त मंत्रालय के एक अधिकारी का तर्क है, ''सरकार के पास ईंधन सब्सिडी को कम करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है. '' इसका मतलब यह होगा कि पेट्रोल, केरोसिन और एलपीजी की कीमतों में फिर से बढ़ोतरी की जाए. सरकार के लिए ऐसा करना मुश्किल है.
आखिर दिसंबर में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में और अगले साल मई में कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसके बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली में विधानसभा चुनाव होंगे. जानकारों के मुताबिक सरकार के पास एक और रास्ता यह है कि वह सार्वजनिक कंपनियों की अपनी हिस्सेदारी बेचे, कर्ज ले या अपने एसेट बेचे, लेकिन यह सब सरकार के लिए अरुचिकर विकल्प हैं. प्राइवेट सेक्टर के बैंक में कार्यरत एक अर्थशास्त्री ने बताया, ''भारतीय रिजर्व बैंक उधार देना नहीं चाहेगा. यही नहीं, इस कदम को क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां भी तिरछी नजर से देखेंगी. इसकी जगह सरकार अपने एसेट जैसे जमीन आदि बेच सकती है. लेकिन इससे यह आशंका और मजबूत हो जाएगी कि सरकारी खजाने की हालत बेहद खस्ता है. ''
फील गुड की गोली
करामाती टैक्स सब्सिडी, महंगाई भत्ता
विनिवेश अभियान को फिर से पटरी पर लाया गया है. आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने 14 सितंबर की अपनी बैठक में चार पीएसयू—हिंदुस्तान कॉपर, ऑयल इंडिया, एमएमटीसी और नाल्को—में सरकार की मामूली हिस्सेदारी बेचकर 15,000 करोड़ रु. जुटाने को मंजूरी दे दी है. इसके बाद 21 सितंबर को घोषित की गई राजीव गांधी इक्विटी योजना के मुताबिक शेयरों, इक्विटी म्युचुअल फंडों और एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों में पहली बार निवेश करने वाले निवेशकों को एकमुश्त 2,500 करोड़ रु. की टैक्स सब्सिडी दी जाएगी. अलग-अलग लक्षित समूह तक पहुंचने के प्रयास के तहत सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में 7 फीसदी बढ़ोतरी की घोषणा की और रक्षा कर्मियों की लंबे समय से लंबित मांग 'एक रैंक, एक पेंशन' को मंजूर कर लिया (देखें बॉक्स).
इससे साफतौर पर कांग्रेस जोश में दिख रही है. पार्टी के प्रवक्ïता मनीष तिवारी ने कहा, ''हमने कभी भी, यहां तक कि अस्थायी तौर पर भी, सुधारों की दूसरी लहर का विरोध नहीं किया है. 2008 की ग्लोबल आर्थिक मंदी को देखते हुए कुछ चौकसी की जरूरत आ पड़ी थी. मौजूदा प्रक्रिया को वास्तव में जारी रखने के तौर पर देखना चाहिए. '' लेकिन योजना आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, सरकार के सामने असली चुनौती इन योजनाओं के लिए धन जुटाने और गुड्स एवं सर्विसेज टैक्स (जीएसटी), डायरेक्ट टैक्स कोड (डीटीसी) और पेंशन एवं बीमा बिल वाजिब सुधारों पर आगे बढऩे की है. वह स्वीकार करते हैं, ''जब तक सरकार एक व्यापक राजनैतिक सहमति नहीं बनाती, इनको लागू नहीं किया जा सकता. ''
सरकार का साथ देने में अनिच्छुक अफसरशाही और पर्यावरण की मंजूरी न मिलने जैसी पुरानी समस्याएं अब भी बनी हुई हैं. अर्थशास्त्री बिबेक देबरॉय के मुताबिक असल समस्या जमीन अधिग्रहण की है. क्या प्रस्तावित राष्ट्रीय निवेश बोर्ड इन समस्याओं को दूर कर पाएगा? या इसमें भी मामले-दर-मामले के आधार पर मंजूरी की व्यवस्था ही आ जाएगी? दूसरा कदम उसी की झ्लक दिखाएगा, जिस तरह से सुधारों की घोषणा हुई है—ढेर सारा शोर और थोड़ा-बहुत काम.
—साथ में प्रिया सहगल

