शहरों में रहने वाले ज्यादातर लोगों के मन में गांव की तस्वीर कच्चे मकानों, कच्ची सड़कों और खेतों में काम करने वाले अशिक्षित लोगों के रूप में ही होती है. लेकिन सच तो यह है कि अब गांव शोले के दिनों वाले गांव नहीं रहे, उनमें जबरदस्त बदलाव आ चुका है. पिछले कुछ साल से शहरी भारत के मुकाबले ग्रामीण भारत ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है और अब ज्यादातर संगठनों के अध्ययन बस उस चीज को ही पकड़ रहे हैं जो जानकारी हमारी कंपनी इंडिकस के साथी बहुत पहले ही जुटा चुके हैं.
नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) के अनुसार, 2004-05 और 2009-10 के बीच ग्रामीण बेरोजगारी में 39 लाख की कमी आई है. गांव के लोगों की आय भी तेजी से बढ़ रही है. 2011 की क्रेडिट सुइस रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण भारत का प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) शहरी भारत के मुकाबले 1.5 फीसदी ज्यादा बढ़ा है. ग्रामीण भारत में जहां यह बढ़त 6.2 फीसदी रही, वहीं शहरी भारत में सिर्फ 4.7 फीसदी हुई है.
एनएसएस के आंकड़ों के आधार पर धमाकृति जोशी द्वारा तैयार क्रिसिल रिपोर्ट के अनुसार, 2009-10 और 2011-12 के बीच ग्रामीण परिवारों का खर्च 3.7 लाख करोड़ (ट्रिलियन) रु. तक बढ़ा है, जबकि इस दौरान शहरी परिवारों का खर्च 3 लाख करोड़ रु. से कम रहा है. इस दौरान ग्रामीण भारत की वृद्धि दर 2 फीसदी ज्यादा रही है. इस बीच, शिक्षा हासिल करने में ग्रामीण भारत शहरों के मुकाबले ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहा है. परिवारों के एसेट्स की बात करें तो ग्रामीण भारत के लोग ज्यादा टू व्हीलर और टीवी का इस्तेमाल कर रहे हैं (ग्राफ देखें).
यह बदलाव सिर्फ कृषि की उत्पादकता में सुधार (मामूली), या नरेगा (ऊंट के मुंह में जीरा से कुछ ज्यादा) या ऊंचे न्यूनतम समर्थन मूल्य (कुछ जिंस ही ग्रामीण अर्थव्यवस्था के छोटे हिस्से को कवर करती हैं) की वजह से ही नहीं हुआ है. ग्रामीण भारत की उत्पादकता में भारी और स्पष्ट सुधार हुआ है (हालांकि इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है) जिसमें मेन्युफैरिंग और सर्विस सेक्टर का सुधार भी शामिल है. आज ग्रामीण अर्थव्यवस्था का करीब तीन-चैथाई (स्पष्ट रूप से 73 फीसदी) हिस्सा सर्विस और मेन्युफैरिंग का है और यह हिस्सा आगे और भी बढऩे की संभावना है.
ग्रामीण भारत की उत्पादकता में सुधार 2000 के दशक में होने वाले तीन तरह के विकास या सुधार से हुआ. पहला, समूचे भारत में टेलीकॉम नेटवर्क का फैलाव. ग्रामीण भारत में टेलीकॉम सेवा की पहुंच 2000 में 0.7 फीसदी परिवारों से बढ़कर 2011 में 33 फीसदी से ज्यादा हो गई है और इसे अभी बढ़ते ही जाना है. इस दौरान ग्रामीण भारत में टेलीकॉम की कुल मिलाकर वृद्धि 19 गुना हो गई, जबकि शहरी भारत में यह 6 गुना बढ़ी.
इस नेटवर्क की वजह से दूसरे देशों के विपरीत भारत में निचले तबके के लोगों को भी किफायती सेवाएं ज्यादा मात्रा में उंचाई जा सकी हैं. इस बात की जानकारी सब को है कि दिहाड़ी मजदूरों को अब रोजगार के बेहतर अवसर मिल रहे हैं, किसानों और मछुआरों को अपने उत्पादों की अच्छी कीमत मिल रही है और युवाओं को शिक्षा के ज्यादा विकल्प मिल रहे हैं.
दूसरा बड़ा सुधार था, ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छी सड़कों का जाल बिछाना. इसकी वजह से सभी गांवों को एक-दूसरे से और बड़े बाजारों से जोड़ा जा सका. 2004 और 2008 के बीच प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रामीण सड़कों की लंबाई तीन गुना बढ़कर 1,61,000 किमी हो गई. 2004 में कुल सड़कों में ग्रामीण सड़कों का हिस्सा सिर्फ 2 फीसदी था, लेकिन 2008 तक यह बढ़कर 5 फीसदी हो गया. असल में यह और भी बढ़ा है, लेकिन इस बारे में नवीनतम जानकारी उपलब्ध नहीं है.
इन सड़कों पर निजी ट्रांसपोर्ट सेवाएं, मोटरसाइकिल हर समय दिखने लगीं और गांवों में सालभर निजी ट्रांसपोर्ट, माल और सेवाओं का परिवहन सस्ते और नियमित दरों पर होने लगा. लेकिन आश्चर्य की बात है कि भारत के शहर केंद्रित एकेडमिक वर्ग ने इस क्रांतिकारी विकास और उत्पादकता पर उनके असर को समझने की कोशिश नहीं की.
तीसरा सबसे बड़ा विकास शायद सबसे महत्वपूर्ण है और यह कम्युनिकेशन और ट्रांसपोर्ट में सुधार का ही नतीजा है. ग्रामीण भारत में ह्यूमन कैपिटल (मानव संसाधन) में काफी तेजी से सुधार हो रहा है. यह सब जानते हैं कि बहुत से सरकारी स्कूल कुछ नहीं करते, लेकिन उनमें जो सुधार आ रहा है उसकी तारीफ करने वाले कम हैं.
आज ग्रामीण भारत में मुश्किल से ही कोई ऐसा बच्चा दिखेगा जो स्कूल न जाता हो. अब टीचर भी देहाती इलाकों में पढ़ाने को तैयार दिखते हैं क्योंकि पास के कस्बों या शहरों से गांवों तक यात्रा करना आसान हो गया है. गांव के युवा शिक्षा के लिए पास के शहरों तक रोज आते-जाते हैं. इसका नतीजा यह है कि एनएसएस के आंकड़ों के मुताबिक, 2004 और 2010 के बीच ग्रामीण भारत की काम करने वाली जनसंख्या में सेकंडरी, हायर सेकंडरी, ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट लोगों की संख्या में क्रमश: 45, 60, 39 और 28 फीसदी की बढ़त हुई है.
जैसे कि हमने इस अंक में कई उदाहरण शामिल किए हैं, बेहतर शिक्षा हासिल करने वाले ग्रामीण लोगों में से कम-से-कम कुछ तो गांवों में ही रुक जाते हैं. कामयाब ग्रामीण लोगों का यह समूह अतीत के लोगों से काफी अलग है. वे न सिर्फ गांवों में बदलाव के जुनून या आदर्श से प्रेरित हैं, बल्कि उन्हें इस बात का भी पूरा भरोसा है कि वे और उनका परिवार गांव में ही खुशहाल, संतोषजनक जीवन जी सकते हैं. वे तरक्की का फायदा उठा रहे हैं और उसमें योगदान भी कर रहे हैं. यह वह भारतीय है जो ग्रामीण भारत को सबसे ज्यादा बदल रहा है-एक आदर्शवादी के रूप में नहीं बल्कि एक यथार्थवादी के रूप में जो अवसर देख रहा है और ग्रामीण भारत में चल रही नई तेज लहर में सक्रियता से भागीदारी कर रहा है.
इसलिए हमें अब एक समृद्धि चक्र का उभार दिखना शुरू होगा. बेहतर शिक्षित लोग जब भारी अवसरों का उपयोग करेंगे तो वे फिर दूसरों के लिए भी जगह बनाएंगे. इसके बदले वे सुनिश्चित करेंगे कि बेहतर शिक्षा और सक्रिय उद्यमियों का कम-से-कम कुछ हिस्सा तो ग्रामीण भारत में काम करने के लिए तैयार हो. इनमें कुछ लोग शहरों में रहते हुए भी ऐसा कर सकते हैं क्योंकि बेहतर ट्रांसपोर्ट व्यवस्था से लंबी दूरी तक यात्रा करना अब आसान हो गया है.
हालांकि, भारतीय नीति-नियंता इस चक्र की दो महत्वपूर्ण विशेषताओं को नहीं समझ पा रहे हैं. ये आम तौर पर कुछ समय ही रहने वाले हैं और फिर खत्म हो जाएंगे, जब तक कि ऐसे इलाकों से बाहरी दुनिया के लोगों के लिए वस्तुओं और सेवाओं की मुक्त रूप से आवाजाही नहीं होती. दूसरी बात यह है कि ग्रामीण भारत तब तक ही तरक्की कर सकता है, जब शहरी भारत सक्षम तरीके से काम करे.
कई निठल्ले विचारकों ने ग्रामीण भारत के उभार के पीछे मुख्य वजह नरेगा और ऊंचे कृषि समर्थन मूल्य को बताया है जबकि इन दावों को साबित करने के लिए आंकड़े नदारद हैं. ग्रामीण भारत में यदि यह बड़ा बदलाव कल्याणकारी योजनाओं की वजह से आया है तो ऐसा लगता है कि भारत ने तरक्की का बिलकुल एक नया मॉडल खोज लिया है!
तरक्की टिकाऊ तब ही रह सकती है जब उत्पादकता में सुधार हो और इस सुधार को टिकाऊ रखने के लिए अर्थव्यवस्था को खोला जाना चाहिए. लेकिन ग्रामीण भारत अब भी आंशिक रूप से खुली हुई अर्थव्यवस्था ही है. कानून, बुनियादी ढांचा, प्रक्रियाएं, व्यवहार और भ्रष्टाचार एक साथ मिलकर ग्रामीण इलाकों को ऊंची दीवारों से घिरे द्वीपों जैसा ही बनाते हैं.
टेक्नोलॉजी कभी-कभी इन दीवारों से रिसकर पहुंचती है और एक सकारात्मक लहर पैदा कर देती है. 2000 के दशक के दूसरे हिस्से में बिलकुल ऐसा ही हुआ है. लेकिन चाहे सिंचाई व्यवस्था हो, मंडी, हाइवे, माल गोदाम, प्रशिक्षण संस्थाएं या अजीब से कानून, गांवों में अब भी काफी कुछ नहीं बदला है. जितनी सक्रियता हम देख रहे हैं, उतना ही यह भी देखेंगे कि ग्रामीण भारत थकान की गिरफ्त में आ रहा है. सुधारों और निवेश का शहरी भारत को कुछ लाभ मिला है और कुछ रिसकर ग्रामीण इलाकों तक गया है. लेकिन जैसे शहरी भारत उम्मीदों से हलकान पड़ता जा रहा है, वही हालत जल्दी ही ग्रामीण भारत की भी होगी.
शहर और गांव कुछ नहीं बल्कि अच्छी तरह से बंद मकान हैं जिनके बीच-बीच में कुछ बाजार बिखरे हुए हैं. लेकिन शहरों में रहने वाले लोगों के विशाल समूह को गांवों में रहने वाले छोटे समूहों को टिकाऊ बनाने और उसे ऊंचाई देने में महती भूमिका निभानी होगी. शहर वास्तव में गांवों को इस बात के लिए सक्षम बना सकते हैं कि वे आर्थिक तरक्की का फायदा उठा सकें. इसलिए अगर ग्रामीण भारत को आगे बढऩा है तो भारतीय शहरों को अच्छा प्रदर्शन करना होगा. आखिर कुछ ऐसी ही तो वजह थी कि कृषि केंद्रित महान सिंधु घाटी सभ्यता में शहरों के पतन होने के बाद पूरी सभ्यता ही कुम्हला गई.
इस समय की सरकार से तो बहुत कम उम्मीद या अपेक्षा की जा सकती है, लेकिन भविष्य के नीति-नियंता कृपया इसे ध्यान में रखें. ग्रामीण भारत तेजी से बढ़ सकता है और उसे बढऩा भी चाहिए, लेकिन इसके लिए हमें उन तमाम दीवारों को हटाना होगा जो हमारे बड़े-बुजुर्गों ने रास्ते में खड़ी कर रखी हैं.
लेखक नई दिल्ली स्थित इकोनॉमिक रिसर्च फर्म इंडिकस एनालिटिक्स के डायरेक्टर हैं.

