उत्तराखंड के पौड़ी जिले में स्थित एक गांव कुनाऊ में रहने वाले 125 परिवारों के लिए इस बार दीपावली का त्योहार बहुत खास था. आजादी के 66 साल में इस गांव के लोगों के लिए यह पहली दीपावली थी, जब उनका गांव बिजली से रोशन था. लेकिन इस गांव में बिजली आने की कहानी की सबसे रोचक बात यह है कि इन लोगों ने रोशनी की यह लड़ाई खुद लड़कर जीती है, जिसमें भूख हड़ताल तक शामिल है. देहरादून और पौड़ी की सीमा पर स्थित यह गांव अब आधुनिक युग में प्रवेश कर गया है.
कुनाऊ गांव के अधिकांश लोग पशुपालन का काम करते हैं और सदियों से वे गांव के आसपास के इलाके का चरागाह के तौर पर इस्तेमाल करते आ रहे हैं. ब्रिटिश काल में अंग्रेज फीस लेकर गांव वालों को जानवर चराने और लकडिय़ां बीनने की अनुमति देते थे. यहां तक कि स्थानीय लोगों को अपने छप्पर तक के लिए पैसे देने पड़ते थे. 1983 में राजाजी नेशनल पार्क का निर्माण हुआ और कुनाऊ गांव उस पार्क की सीमा में आ गया. यहीं से उनके संघर्ष की शुरुआत हुई.
77 वर्ष के बूढ़े दौलत सिंह असवाल कहते हैं, ''जब मैं कुनाऊ आया था तो पांच साल का बच्चा था. अब हमारी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. इतने सालों तक बिजली के बगैर रहने के कारण हमने सारी उम्मीद ही खो दी थी. मुझे खुशी है कि अब बिजली आने के साथ हमारी अंधेरी जिंदगियों में रोशनी आ गई है. बिजली से नई पीढ़ी के बच्चों को बहुत फायदा होगा और अब वे गांव में कुटीर उद्योग भी लगा सकेंगे.” अब तक बिजली न होने के कारण गांव वालों को रोशनी के लिए सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ता था. लेकिन सौर ऊर्जा बिजली की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं थी. बहुत से लोग अपना मोबाइल रीचार्ज करवाने गांव से 5 किलोमीटर दूर ऋषिकेश जाते थे.
वन विभाग ने यह कहकर इस गांव को बिजली के हक से वंचित कर रखा था कि बिजली के कारण वन्य पशुओं को परेशानी होगी.
14 सितंबर को कुनाऊ वासियों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला आया. उत्तराखंड सरकार ने एक नोटिस जारी करते हुए कहा कि कुनाऊ गांव को वन क्षेत्र से हटाया जाए. बिजली के लिए हुए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले चंद्रमोहन नेगी कहते हैं, ''हमने भूख हड़ताल के जरिए राज्य सरकार के ऊपर दबाव बनाने की कोशिश की. पिछले 7 सितंबर में भूख हड़ताल की शुरुआत हुई, जो लगातार 16 दिनों तक चली. अपने आंदोलन के साथ-साथ हमने वन्य अधिकार अधिनियम के तहत अपने अधिकार हासिल करने के लिए भी आवेदन किया और इस तरह हम वन्य अधिकार कानून के अंतर्गत आने वाला उत्तराखंड का पहला गांव बन गए.”
अब कुनाऊ में क्रिकेट के दीवानों और घरेलू औरतों की खुशी का ठिकाना नहीं है. उत्साह से भरी हुई कुनाऊ निवासी संतोष देवी कहती हैं, ''अब मैं बैटरी बैकअप की चिंता किए बगैर आराम से जब तक चाहूं, अपना मनपसंद सीरियल देख सकती हूं.” 12 साल का लड़का प्रियांशु कहता है, ''अब मैं पढ़ सकता हूं और अपनी मनपसंद कार्टून फिल्म देख सकता हूं.”
इसे अपनी बहुत बड़ी जीत बताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सी.पी. लखेड़ा कहते हैं, ''कुनाऊ के लोगों ने यह साबित कर दिया कि एकता के साथ कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है. मैं आंदोलन के दौरान गांववालों की एकता को देखकर चकित था. मैं उनकी कोशिशों के लिए उन्हें सलाम करता हूं.”
—राजू गुसाईं
बिजली से रोशन गांव कुनाऊ
समाचार सार
बुरे फंसे गए मंत्रीजी
उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ी जातियों के नेता और अखिलेश यादव सरकार में खनिजकर्म राज्यमंत्री गायत्री प्रजापति आरक्षण के सवाल पर खुद ही घिर गए. 6 नवंबर को लखनऊ में सपा मुख्यालय पर बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जाटों के आरक्षण का जमकर विरोध किया. वे बोले, ''जाट संपन्न वर्ग के हैं और कांग्रेस ने मुजफ्फरनगर दंगों में हुई अपनी किरकिरी को देखकर जाट आरक्षण को हवा दी है. दरअसल उसे पता नहीं था कि प्रदेश में जाट आरक्षण पहले से लागू है.” प्रजापति से जब यह पूछा गया कि यूपी में तो उन्हीं की सरकार है, ऐसे में क्या वे सूबे में पहले से ही लागू जाट आरक्षण का भी विरोध करेंगे तो इस पर वे बगलें झांकने लगे.
उत्तराखंड की वित्त मंत्री 71 वर्षीया इंदिरा हृदयेश का अब वैसा रुतबा नहीं है, जैसा एन.डी. तिवारी के मुख्यमंत्रित्व वाली कांग्रेस की सरकार में हुआ करता था. उनके घटते रुतबे को बढ़ाने के लिए अब उनके बेटे सुमित हृदयेश आगे आए हैं. कृषि उपज मंडी समिति, हल्द्वानी के अध्यक्ष 35 वर्षीय सुमित मंडी समिति के कार्यक्रमों में अपनी मां को बुलाकर उनका मान बढ़ा रहे हैं. मंडी समिति कृषि विभाग के अधीन आती है, लेकिन समिति के कार्यक्रमों में कृषि मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत कहीं दिखाई नहीं देते. अब विपक्षी चुटकी ले रहे हैं कि मां ने जितना जोर बेटे को मंडी समिति का अध्यक्ष बनाने में लगाया, अब बेटा उतना ही जोर मां की खोई हुई ताकत वापस लाने में लगा रहा है.
कुनाऊ गांव के अधिकांश लोग पशुपालन का काम करते हैं और सदियों से वे गांव के आसपास के इलाके का चरागाह के तौर पर इस्तेमाल करते आ रहे हैं. ब्रिटिश काल में अंग्रेज फीस लेकर गांव वालों को जानवर चराने और लकडिय़ां बीनने की अनुमति देते थे. यहां तक कि स्थानीय लोगों को अपने छप्पर तक के लिए पैसे देने पड़ते थे. 1983 में राजाजी नेशनल पार्क का निर्माण हुआ और कुनाऊ गांव उस पार्क की सीमा में आ गया. यहीं से उनके संघर्ष की शुरुआत हुई.
77 वर्ष के बूढ़े दौलत सिंह असवाल कहते हैं, ''जब मैं कुनाऊ आया था तो पांच साल का बच्चा था. अब हमारी चौथी पीढ़ी यहां रह रही है. इतने सालों तक बिजली के बगैर रहने के कारण हमने सारी उम्मीद ही खो दी थी. मुझे खुशी है कि अब बिजली आने के साथ हमारी अंधेरी जिंदगियों में रोशनी आ गई है. बिजली से नई पीढ़ी के बच्चों को बहुत फायदा होगा और अब वे गांव में कुटीर उद्योग भी लगा सकेंगे.” अब तक बिजली न होने के कारण गांव वालों को रोशनी के लिए सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना पड़ता था. लेकिन सौर ऊर्जा बिजली की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं थी. बहुत से लोग अपना मोबाइल रीचार्ज करवाने गांव से 5 किलोमीटर दूर ऋषिकेश जाते थे.
वन विभाग ने यह कहकर इस गांव को बिजली के हक से वंचित कर रखा था कि बिजली के कारण वन्य पशुओं को परेशानी होगी.
14 सितंबर को कुनाऊ वासियों के पक्ष में एक महत्वपूर्ण फैसला आया. उत्तराखंड सरकार ने एक नोटिस जारी करते हुए कहा कि कुनाऊ गांव को वन क्षेत्र से हटाया जाए. बिजली के लिए हुए आंदोलन का नेतृत्व करने वाले चंद्रमोहन नेगी कहते हैं, ''हमने भूख हड़ताल के जरिए राज्य सरकार के ऊपर दबाव बनाने की कोशिश की. पिछले 7 सितंबर में भूख हड़ताल की शुरुआत हुई, जो लगातार 16 दिनों तक चली. अपने आंदोलन के साथ-साथ हमने वन्य अधिकार अधिनियम के तहत अपने अधिकार हासिल करने के लिए भी आवेदन किया और इस तरह हम वन्य अधिकार कानून के अंतर्गत आने वाला उत्तराखंड का पहला गांव बन गए.”
अब कुनाऊ में क्रिकेट के दीवानों और घरेलू औरतों की खुशी का ठिकाना नहीं है. उत्साह से भरी हुई कुनाऊ निवासी संतोष देवी कहती हैं, ''अब मैं बैटरी बैकअप की चिंता किए बगैर आराम से जब तक चाहूं, अपना मनपसंद सीरियल देख सकती हूं.” 12 साल का लड़का प्रियांशु कहता है, ''अब मैं पढ़ सकता हूं और अपनी मनपसंद कार्टून फिल्म देख सकता हूं.”
इसे अपनी बहुत बड़ी जीत बताते हुए सामाजिक कार्यकर्ता सी.पी. लखेड़ा कहते हैं, ''कुनाऊ के लोगों ने यह साबित कर दिया कि एकता के साथ कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है. मैं आंदोलन के दौरान गांववालों की एकता को देखकर चकित था. मैं उनकी कोशिशों के लिए उन्हें सलाम करता हूं.”
—राजू गुसाईं
बिजली से रोशन गांव कुनाऊ
समाचार सार
बुरे फंसे गए मंत्रीजी
उत्तर प्रदेश में अति पिछड़ी जातियों के नेता और अखिलेश यादव सरकार में खनिजकर्म राज्यमंत्री गायत्री प्रजापति आरक्षण के सवाल पर खुद ही घिर गए. 6 नवंबर को लखनऊ में सपा मुख्यालय पर बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने जाटों के आरक्षण का जमकर विरोध किया. वे बोले, ''जाट संपन्न वर्ग के हैं और कांग्रेस ने मुजफ्फरनगर दंगों में हुई अपनी किरकिरी को देखकर जाट आरक्षण को हवा दी है. दरअसल उसे पता नहीं था कि प्रदेश में जाट आरक्षण पहले से लागू है.” प्रजापति से जब यह पूछा गया कि यूपी में तो उन्हीं की सरकार है, ऐसे में क्या वे सूबे में पहले से ही लागू जाट आरक्षण का भी विरोध करेंगे तो इस पर वे बगलें झांकने लगे.
उत्तराखंड की वित्त मंत्री 71 वर्षीया इंदिरा हृदयेश का अब वैसा रुतबा नहीं है, जैसा एन.डी. तिवारी के मुख्यमंत्रित्व वाली कांग्रेस की सरकार में हुआ करता था. उनके घटते रुतबे को बढ़ाने के लिए अब उनके बेटे सुमित हृदयेश आगे आए हैं. कृषि उपज मंडी समिति, हल्द्वानी के अध्यक्ष 35 वर्षीय सुमित मंडी समिति के कार्यक्रमों में अपनी मां को बुलाकर उनका मान बढ़ा रहे हैं. मंडी समिति कृषि विभाग के अधीन आती है, लेकिन समिति के कार्यक्रमों में कृषि मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत कहीं दिखाई नहीं देते. अब विपक्षी चुटकी ले रहे हैं कि मां ने जितना जोर बेटे को मंडी समिति का अध्यक्ष बनाने में लगाया, अब बेटा उतना ही जोर मां की खोई हुई ताकत वापस लाने में लगा रहा है.

