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डार्क मोड

कोटा में पढ़ाई के अवसाद में बच्चे कर रहे आत्महत्या

कॉम्पीटिशन, मां-बाप की हसरतों का बोझ और किशोर उम्र की नई-नई जरूरतों के त्रिकोण में उलझकर कोचिंग करने वाले बच्चे उठाने लगे हैं आत्महत्या जैसा खतरनाक कदम.

छठी क्लास के बाद ही कोटा की कोचिंग में पढ़ने आ गए बच्चे
छठी क्लास के बाद ही कोटा की कोचिंग में पढ़ने आ गए बच्चे
अपडेटेड 18 नवंबर , 2013

मम्मी-पापा, सॉरी मैं आपका सपना पूरा नहीं कर सका.” इस साल 13 अक्तूबर को मौत को गले लगाने से पहले उसका यही आखिरी बयान था. पुलिस ने इस बयान को एक सुसाइड नोट की शक्ल में एक ऐसे कमरे से बरामद किया जहां एक छात्र की सड़ी हुई लाश पड़ी थी. बिहार के पूर्वी चंपारण से आया 18 साल का संजीत (बदला नाम) राजस्थान के कोटा शहर में इंजीनियरिंग की कोचिंग कर रहा था.

लेकिन पढ़ाई का दबाव झेल नहीं पाया. हर साल एक लाख से ज्यादा लड़के-लड़कियों को अपने अत्याधुनिक कोचिंग सेंटरों की ओर आकर्षित करने वाले कोटा शहर का यह कोई इकलौता मामला नहीं है, यहां हर महीने औसतन एक बच्चा कामयाबी की दौड़ में पिछड़कर मौत को गले लगा लेता है.

यही नहीं, कम से कम 100 बच्चे हर रोज शहर के किसी न किसी मनोचिकित्सक से परामर्श लेने पहुंच जाते हैं. अब तो प्रमुख कोचिंग सेंटरों ने अपने यहां स्थायी रूप से मनोचिकित्सक भर्ती कर लिए हैं, ताकि बच्चों की मानसिक समस्याओं को तत्काल हल किया जा सके.

लेकिन साफ-सुथरी आबोहवा, राजस्थानी शैली के स्थापत्य और नए डिजाइन की इमारतों वाले कोटा में आखिर ऐसी क्या कमी है जो भविष्य संवारने के लिए यहां आए बच्चों को इस हद तक तोड़ देती है कि वे मौत को गले लगाने जैसा भयानक कदम उठा लेते हैं. यह सिर्फ पढ़ाई का दबाव है, या माता-पिता की महत्वाकांक्षाओं का बढ़ता बोझ या फिर अपनी दिलचस्पी से बिल्कुल ही अलग मैदान में उतार दिए जाने की टीस? या फिर ऐसा तो नहीं कि बच्चों से ज्यादा दोषी उनके मां-बाप हैं जो बच्चों पर रेस के घोड़े की तरह मोटे पैसे का दांव लगाते हैं और उन्हें जीत से कम कुछ नहीं चाहिए. शहर की सड़कों पर साइकल से यहां से वहां जाते कोचिंग के बच्चों के झुंड में अगर आप किसी बच्चे को रोककर इस बारे में बात करेंगे तो उनमें से बहुत कम ही मुखर होते हैं. उनमें से ज्यादातर यही कहते हैं कि वे यहां मन लगाकर पढ़ाई कर रहे हैं और उनके माता-पिता उनका भला चाहते हैं.

लेकिन जैसा कि कोटा के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. एम. एल. अग्रवाल कहते हैं, ''आप बाहर से इस बात का अंदाजा नहीं लगा सकते कि आखिर बच्चों के मन में चल क्या रहा है.” अग्रवाल शहर के ऐसे डॉक्टर है जिन्होंने वर्ष 2010 में कोटा शहर में तीन महीने के भीतर आत्महत्या के 35 मामले सामने आने के बाद प्रशासन के सहयोग से 'होप’ नाम से मनोचिकित्सा कॉल सेंटर की स्थापना की थी. इस कॉल सेंटर का मकसद था कि जो छात्र या आम नागरिक डॉक्टर तक आने में संकोच कर रहा है, वह भी किसी भी वक्त फोन लगाकर मनोवैज्ञानिक की सलाह ले सके. मनोविज्ञान में मान्यता है कि आत्महत्या करने के ठीक पहले व्यक्ति एक बार किसी अपने से बात करना चाहता है और अगर ऐसे में आत्महत्या को किसी तरह से कुछ देर के लिए टाल दिया जाए तो आत्महत्या के इरादे को बदला जा सकता है.

उनके कॉल सेंटर में पिछले तीन साल में करीब 4,000 लोग फोन कर चुके हैं और इसमें से आधे से ज्यादा कोचिंग के छात्र हैं. डॉ. अग्रवाल बताते हैं, ''होम सिकनेस या घर की याद आना ज्यादातर बच्चों की सबसे बड़ी समस्या है. इस समस्या के भी दो पहलू हैं.
एक तो बच्चे को खुद ही घर की बहुत याद आती है, दूसरी तरफ अगर वह खुद को नियंत्रित कर भी लेता है तो मां-बाप भी इतनी बार फोन करके उसकी खबर लेते हैं या भावुक बातें करते हैं कि बच्चा इस समस्या से चाहकर भी खुद को निकाल नहीं पाता है.दूसरी बड़ी समस्या यह है कि बच्चे कोचिंग में आने के बाद देर रात तक पढऩे की आदत डाल लेते हैं जो उनकी प्राकृतिक दिनचर्या से मेल नहीं खाती और उन्हें कई तरह की बीमारियों से जूझना पड़ता है.”

बच्चों की मनोदशा को केवल विशेषज्ञ ही भांप सकते हैं. अपने पास आए लड़के का हवाला देते हुए कोटा के तलवंडी इलाके के मनोचिकित्सक डॉ. अखिलेश अग्रवाल ने एक केस स्टडी सुनाई: ''16 साल के लड़के ने आकर मुझ्से कहा कि डॉक्टर साहब ऐसी दवा दे दो कि रात में नींद न आए. मैंने पूछा क्यों? उसने कहा कि बगल के कमरे वाला लड़का रात भर पढ़ता रहता है और मैं नहीं पढ़ पाता, इससे मुझे टेंशन हो जाता है. बाद में जब मैंने पूरे मामले की पड़ताल की तो पता चला कि बगल वाला लड़का ट्यूब लाइट जलाकर सोता था और उससे नाहक ही मेरा पेशेंट परेशानी में था.” दरअसल समस्याएं इतने तरीके से डेवलप होती हैं कि उन्हें बहुत गहराई से समझे बिना उनकी जड़ तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है. गहराई पर जाने पर अकसर पता चलता है कि समस्या थी नहीं बल्कि बनाई गई थी.

कोटा में इस तरह की समस्याएं कितनी गहरी हैं, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि करियर प्वाइंट कोचिंग में परामर्श देने वाले मनोचिकित्सक डॉ. दीपक गुप्ता ने शहर की कोचिंग क्लासों में पढऩे वाले बच्चों की मानसिक समस्याओं पर विधिवत शोध ही कर डाला.'प्रिवेंशन ऑफ साइकोलॉजिकल इलनेस इन कोचिंग स्टूडेंट्स ऑफ कोटा’ (कोटा के कोचिंग छात्रों में मानसिक बीमारियों की रोकथाम) नाम से प्रकाशित शोध में डॉ. गुप्ता ने शहर के 400 बच्चों पर अध्ययन किया. इनमें से 200 बच्चे कोचिंग क्लास के और 200 बच्चे सामान्य स्कूलों के थे. अपने शोध परिणाम में उन्होंने पाया कि कोचिंग में पढऩे वाले 26 फीसदी बच्चे जहां डिप्रेशन और एंग्जाइटी का शिकार हैं वहीं सामान्य पढ़ाई करने वाले 14 फीसदी बच्चे ही इस तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं. इस शोध से यह बात साफ हुई कि बच्चों के तनाव की प्रमुख वजहें थीं—कोचिंग का अतिरिक्त दबाव, कोचिंग के बैच में बदलाव, गलत विषय का चयन, बच्चे को अपनी क्षमता के बारे में सही जानकारी न होना, होम सिकनेस और वंशानुगत बीमारियां.
कोटा की कोचिंग में हजारों बच्चे दिनभर कड़ी मेहनत करते हैं
कोचिंग क्लास के बच्चों की एक बहुत सामान्य लेकिन आम आदमी की नजर से अकसर छिटक जाने वाली दिक्कत को डॉ. गुप्ता कुछ इस तरह बयान करते हैं, ''कोटा टॉपर्स की मंडी है. जो भी बच्चा यहां आता है वह अपने स्कूल का या अपने शहर का टॉपर होता है. इतने सारे टॉपर जब एक क्लास में बैठते हैं तो सब तो टॉप नहीं कर सकते.

ऐसे में पहले टेस्ट में जब बहुत से बच्चों की रैंक अचानक गिर जाती है तो वे यह झटका बर्दाश्त नहीं कर पाते. अगर ऐसे में परिवार वालों ने भी बच्चे के साथ सख्ती की तो कई बार वे आत्महत्या की हद तक चले जाते हैं.”

कोटा की करियर प्वाइंट कोचिंग के सीएमडी और सीईओ प्रमोद माहेश्वरी अपने छात्रों से पहली क्लास में कहते हैं, ''हम एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. ये कोई करो या मरो की लड़ाई नहीं है.” उनका मानना है कि बच्चा आत्महत्या तनाव से नहीं, बल्कि ग्लानि की भावना से करता है. इसीलिए वे अभिभावकों को भी समझते हैं, ''बच्चों से इस तरह की बातें न की जाएं कि देखो बेटा, पूरे परिवार की इज्जत अब तुम्हारे हाथ में है.हम तो पेट काटकर तुम्हें पढ़ा रहे हैं, अगर तुम नाकाम हो गए तो सब बेकार हो जाएगा.” कोटा के प्रमुख कोचिंग संस्थान एलन करियर इंस्टीट्यूट के निदेशक गोविंद माहेश्वरी भी मानते हैं कि बच्चों को मानसिक रूप से सबल बनाने की जरूरत है. वे कहते हैं, ''कोचिंग में हम लोग ओपन सेशन चलाते हैं.
इसमें बच्चे अपनी राय रखते हैं, हंसते- गाते हैं ओर पढ़ाई के इतर भी बहुत सी बातें होती हैं.” इन दोनों ही संस्थान ने अपने यहां स्थायी रूप से मनोचिकित्सक तैनात कर रखे हैं.

लेकिन मनोचिकित्सक ही इस समस्या का एकमात्र इलाज नहीं है. कोटा में कोचिंग इंस्टीट्यूट का यह हाल है कि कई संस्थानों ने अपने स्कूल भी खोल लिए हैं. कई जगह तो ये स्कूल कक्षा छह से शुरू हो जाते हैं. मां-बाप बच्चों को इतनी छोटी उम्र से कोटा भेजते हैं जहां वे बचपन से ही स्कूल और कोचिंग दोनों करते हैं ताकि जब 12वीं के बाद परीक्षा की वेला आए तो वे किसी से कम साबित न हों.
कोटा की एक कोचिंग में पढ़ाई करते बच्चे
कई परिवार तो बच्चों की कोचिंग को लेकर इतने उत्साहित हैं कि पिता अकेले कहीं बाहर नौकरी करते हैं और मां या परिवार का कोई सदस्य बच्चों के साथ कोचिंग के टू-रूम सेट हॉस्टल में स्थायी रूप से रहता है. अपने दो बच्चों के साथ यहां रह रही हिसार की कृष्णा सहारन कहती हैं, ''बेटा अभी 11वीं में आया है और कोचिंग शुरू कर दी है, जबकि बेटी 12वीं के बाद यहां आई है. बेटी कहती है कि अगर पहले यहां आ जाते तो अच्छा रहता.” कृष्णा के पति हिसार में प्रोफेसर हैं और वे बच्चों की पढ़ाई के लिए पूरी तरह समर्पित होकर कोटा में आ बसी हैं. इस तरह की पढ़ाई पर एक-एक परिवार 2 से 3 लाख रु. सालाना तक खर्च कर रहा है. अभिभावक भी जानते हैं कि बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत बनाना जरूरी है और सख्ती करना अप्रासंगिक उपाय से ज्यादा कुछ नहीं है.

इसीलिए कोचिंग संस्थान अब सारा डाटा कंप्यूटराइज कर रहे हैं. इसमें एक बटन दबाकर बच्चे को यह पता चल जाता है कि अब तक पढ़ाई में उसकी परफॉर्मेंस कैसी रही है. हर टेस्ट का प्रदर्शन उसके सामने होता है और उसके पास खुद को किसी खुशफहमी या गलतफहमी में रखने की गुंजाइश नहीं रहती. अगर बच्चे इन नतीजों की अनदेखी न करें तो इस बात को सामान्य तौर पर समझ सकते हैं कि किसी इम्तहान में वे किस हद तक प्रदर्शन करने वाले हैं. कोचिंग संस्थान भी समझते हैं कि सारे बच्चे तो डॉक्टर-इंजीनियर नहीं बन सकते. लिहाजा वे भी बच्चों को उनके एप्टीट्यूट के हिसाब से सलाह देते हैं और कई मामलों में उन्हें विषय बदलने की सलाह देते हैं.
लेकिन जो चीज फिर भी हर बच्चे के साथ हमेशा बनी रहती है वह है उनकी कच्ची उम्र. यही वह उम्र है जब बच्चा पहली बार अपने मन की करने की स्थिति में होता है. यही यौवन की दहलीज पर उसका पहला कदम है जहां विपरीत लिंग के प्रति उसका प्राकृतिक आकर्षण सहज ही उसे अपनी ओर खींचता है.

यहीं से उसे भविष्य का नागरिक बनने के लिए साधना भी करनी पड़ती है. इतने सारे आयामों के बीच संतुलन और विवेक ही उसका साथी है. जब तक इस देश में सीमित क्षेत्रों में करियर बनाने के सीमित अवसर उपलब्ध हैं, तब तक बच्चों को कोचिंग की जरूरत से मुक्त करना नामुमकिन-सा है.

मनोचिकित्सक कहते हैं कि बहुत ज्यादा संवेदनशील बच्चों को भीड़ में झोंक देना, भाड़ में झोंक देने से कम नहीं है. गौरतलब है कि दुनिया को सापेक्षता का सिद्धांत देने वाले भौतिकशास्त्री अलबर्ट आइंस्टीन के माता-पिता उन्हें म्युनिख, जर्मनी के बोर्डिंग स्कूल में छोड़कर इटली चले गए थे.

लेकिन आइंस्टीन को अपने परिवार की इतनी याद आती थी कि उन्होंने अपने डॉक्टर को यह लिखने के लिए राजी कर लिया कि अगर वे अपने परिवार के पास नहीं गए तो अवसाद और तनाव से मानसिक रूप से बीमार हो सकते हैं. वे अंतत: अपने माता-पिता के पास पहुंच गए.

जरा सी चूक से पूर्वी चंपारण का संजीत फांसी पर लटक जाता है और थोड़ी सी संवेदनशीलता से आइंस्टीन जन्म लेते हैं. इस तथ्य को हम यूं ही बातों में नहीं उड़ा सकते.

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