
कुचिपुड़ी के दिग्गज कलाकार डॉ. राजा और राधा रेड्डी की बेटी यामिनी रेड्डी का जन्म भले ही भारत के नृत्य जगत के प्रतिष्ठित परिवार में हुआ हो मगर उनका बचपन सामान्य ही रहा. उन्हें याद नहीं कि कभी उन पर अपने माता-पिता की नृत्य विरासत को आगे बढ़ाने का कोई दबाव रहा हो.
वैसे यामिनी बचपन से ही कुचिपुड़ी नृत्यांगना बनने के लिए कृतसंकल्प थीं. महज तीन साल की उम्र में उन्होंने अपने माता-पिता के साथ मंच पर पदार्पण किया था. जब सितार के उस्ताद पंडित रविशंकर ने छोटी उम्र में उनका नृत्य देखा तो वे मंत्रमुग्ध हो गए थे.
यामिनी बदलाव की वाहक के रूप में पहचानी जाती हैं. वे मानती हैं कि कोई कला केवल नए प्रयोगों और खोजों से ही आगे बढ़ सकती है लेकिन ऐसा करते हुए उसे अपनी पारंपरिक संरचना से दूर नहीं होना चाहिए.
आधुनिक कोरियोग्राफी तकनीकों के जरिए पेश की गईं उनकी प्रस्तुतियां कुचिपुड़ी की एक नई भाषा गढ़ती हैं. प्रकाश, ध्वनि प्रभाव, मंच-सज्जा और संगीत से दर्शक मंत्रमुग्ध रह जाते हैं. उनकी अनूठी कथावाचन शैली एक अलग ही संसार में ले जाती है.
पिछले साल हैदराबाद में उनकी एक प्रस्तुति के दौरान ऐसा ही हुआ, जब यामिनी और 25 कलाकारों वाले उनके ट्रूप ने कुचिपुड़ी के जरिए प्रकाश के उद्भव की कथा बताते हुए सूर्य- त्वं सूर्यं प्रणमाम्यहम् पेश किया.
यामिनी 2007 में हैदराबाद में स्थापित नाट्य तरंगिणी की संस्थापक-निदेशक भी हैं. वे कहती हैं कि कुचिपुड़ी के लिए गहन एकाग्रता, मानसिक दृढ़ता और लगन की जरूरत होती है. इस अनुशासन ने ही उनमें धैर्य और आत्म-अनुशासन विकसित किया है.

यामिनी अपने माता-पिता और गुरुओं को अपना आदर्श मानती हैं और महान शास्त्रीय नृत्यांगना यामिनी कृष्णमूर्ति को अपने जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा बताती हैं.

