
अदिति जब कक्षा नौ में पढ़ रही थीं, उनकी विज्ञान शिक्षिका हर दूसरे विषय को तो सहज और मजेदार बना देतीं, लेकिन माहवारी या मासिक धर्म को पूरी तरह छोड़ देती थीं. झारखंड के गढ़वा में अपने छोटे-से स्कूल के बारे में वे कहती हैं, “वर्जित विषय के बारे में एक छिपी हुई संहिता होती है कि यह तो सबको पता ही है.”
यह 1990 के दशक की बात है. घर पर भी नियम इतने ही साफ थे. अदिति याद करती हैं, “मैं अपने को गंदा और अशुद्ध मानते हुए बड़ी हुई. पूजा घर में मत जाना. रसोई में किसी चीज को छूना मत.”
दुनिया के बारे में उनका नजरिया राष्ट्रीय डिजाइन संस्थान में बदला, जहां वे अपने प्रोजेक्ट पार्टनर और अब पति तुहिन पॉल से मिलीं. कक्षा में शुरू हुआ अभ्यास पहले उनका डिप्लोमा प्रोजेक्ट बना और फिर फंडेड रिसर्च प्रोजेक्ट. इस जोड़ी ने जानबूझकर कॉमिक बुक फॉर्मेट चुना.
अदिति कहती हैं, “माध्यम ही संदेश है. इसलिए अपनी बात पहुंचाने का जरिया गंभीर नहीं हो सकता.” दोस्ताना चरित्र संदेश देते हैं, यहां तक कि महिला के शारीरिक अंगों का चित्रण भी सीधे-सादे ढंग से किया जाता है.
अदिति और तुहिन ने 2024 में मेंस्ट्रुपीडिया के लिए ज्यादातर अपने एनआइडी नेटवर्क के जरिए बहुत सारे लोगों से धन जुटाया. उन्होंने इसे एनजीओ के बजाए कारोबार के तौर पर खड़ा किया क्योंकि लंबे समय तक गांव-गांव जाकर काम करना आसान नहीं था.

मेंस्ट्रुपीडिया कॉमिक्स आज 37,500 स्कूलों में इस्तेमाल किए जाते हैं, हर भारतीय भाषा में उनका अनुवाद हुआ है. अदिति के पास लड़कों के वास्ते भी कुछ है: गुलू पुरुषों में किशोर उम्र में होने वाले बदलावों पर रोशनी डालता है, जिनमें स्वप्नदोष, हस्तमैथुन, सहमति और लत भी शामिल हैं. अदिति का कहना है कि अपने लड़कों की सही परवरिश करना हमारा दायित्व है.

