
जयपुर के पास गांवों की फील्ड ट्रिप के दौरान एरियाना अग्रवाल, अव्याना मेहता और उनके सहपाठी विवान छावछरिया की तिकड़ी ने देखा कि गांववाले दूषित पानी पी रहे थे.
उन्हें एहसास हुआ कि कुछ अशुद्धियां हटाने के किफायती तरीके तो उपलब्ध हैं लेकिन माइक्रोप्लास्टिक हटाने के लिए कम लागत वाले समाधान लगभग नहीं हैं जबकि यह पर्यावरण और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है.
समय के साथ माइक्रोप्लास्टिक लीवर और खून में जमा होकर कोशिकाओं में सूजन या हाॅर्मोन में गड़बड़ी पैदा कर सकते हैं. उन्हें इमली के बीज के पाउडर के चिपकने वाले गुणों के बारे में पता चला.
उन्होंने माइक्रोप्लास्टिक को अलग करने की उसकी क्षमता पर काम शुरू किया. आइआइटी गुवाहाटी में मेंटर्स के साथ काम करने के मौके ने फोकस और पैना किया.
कई ट्रायल्स के बाद उन्होंने इमली के बीज के पाउडर को आयरन पार्टिकल्स के साथ मिलाकर एक फॉर्मूलेशन विकसित किया.
बीजों से निकाले गए प्राकृतिक पॉलीसैकराइड पानी में तैर रहे माइक्रोप्लास्टिक से बंध जाते हैं, जबकि उनमें मौजूद मैग्नेटाइट नैनोपार्टिकल्स बने हुए फ्लॉक्स यानी पानी में पाए जाने वाले बैक्टीरिया/फंगल फिलामेंट्स के फूले हुए गुच्छों को हैंडहेल्ड मैगनेट से हटाने में मदद करते हैं.

स्कूल हेड गर्ल एरियाना कहती हैं, “प्लास-स्टिक के लिए बड़ा टर्निंग पॉइंट सही डोजेज तय करना था. सही संतुलन खोजने के लिए हमें कई बार बदलाव करने पड़े. ब्रेकथ्रू वह लम्हा था जब हमें एहसास हुआ कि हमारा आइडिया सचमुच लैब से बाहर भी काम कर सकता है.”
एरियाना इससे पहले ग्रैनॉस पर भी काम कर चुकी थीं, जो एक मॉइस्चर सेंसर डिवाइस है और गेहूं के दानों का विश्लेषण करके किसानों के लिए उनके संभावित भविष्य के बाजार मूल्य का अनुमान लगाता है.
अव्याना के लिए निर्णायक क्षण प्लास्टिक2बिल्ड शुरू करना था, जो युवाओं के नेतृत्व वाला उनका नॉन-प्रॉफिट है. वे कहती हैं, “जो शुरुआत प्लास्टिक कचरा संकट से निबटने की कोशिश के रूप में हुई थी, वह धीरे-धीरे कहीं बड़े काम में बदल गई.”

