
बहुत कम उद्यमी ही अपने चुने हुए क्षेत्र में बदलाव की शुरुआत करने का श्रेय ले सकते हैं. ॠचा कर उनमें से एक हैं. साल 2011 में जब उन्होंने महिलाओं के अंतर्वस्त्रों के ई-कॉमर्स कारोबार जिवामे की शुरुआत की.
तब वह न केवल बिल्कुल नया विचार था, बल्कि अंतर्वस्त्रों पर बातचीत भी दबे-छिपे ढंग से की जाती थी. वे याद करती हैं कि ग्राहकों से रिव्यू जुटाना भी मुश्किल था. वे बताती हैं, “कोई नहीं चाहती थी, दूसरों को पता चले कि उसने क्या खरीदा है? यह इतनी बड़ी वर्जना थी.”
जमशेदपुर में पलीं-बढ़ीं ॠचा कर ने बिट्स पिलानी से सिविल इंजीनियरिंग में बीई किया और 2007 में नरसी मोंजी इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज से एमबीए पूरा किया था. उनके सामने कई अड़चनें थीं. उन्होंने शुरुआत की थी, तब बाजार में उत्पादों की रेंज बहुत सीमित थी.
इसके अलावा, पॉलीएमाइड से बने और बेहतरीन कारीगरी वाले गुणवत्तापूर्ण उत्पाद केवल पश्चिमी ब्रांडों के आयातित माल के रूप में ही उपलब्ध थे. वे कहती हैं, “अब यह सब भारत में बनता है. बीते 10 साल में मैन्युफैक्चिरंग क्षमता काफी बढ़ी है. अभी पहले से कहीं ज्यादा विकल्प उपलब्ध हैं.”
वास्तव में ॠचा ने अंतर्वस्त्रों को झिझक और पर्दे की बात से बाहर निकालकर फैशन की एक श्रेणी बना दिया. वे कहती हैं, “अब यह कोई वर्जना नहीं रह गई है. महिलाओं ने इसे अपनी पसंद और अपनी अभिव्यक्ति का जरिया बना लिया है.
सोशल मीडिया पर जाकर अपनी खरीदी चीजों के बारे में रील बनाना अपने आप में बहुत बड़ा बदलाव है.” उनका मानना है, “कारोबार को एक तरफ रख दें, तो जिवामे ने सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर यह बदलाव किया कि इस विषय पर बात करना अब आम हो गया है. यह कोई वर्जना नहीं है, न ही ऐसी चीज जिस पर ‘छी-छी’ या इस तरह की बात की जाए. यह बड़ा बदलाव है. मैं चाहे जो भी करूं, वह कभी इसके बराबर नहीं आ पाएगा. यही मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि है.”
साल 2020 में रिलायंस रिटेल ने जिवामे का अधिग्रहण कर लिया तो ॠचा ने कंपनी से विदाई ले ली. उसके बाद उन्होंने न्यूट्रास्यूटिकल्स के क्षेत्र में एक उद्यम शुरू किया, फिर उससे भी अलग हो गईं.
उनकी कहानी आज भी नए उद्यमियों के लिए प्रेरणा है. ब्रांड मार्केटिंग और रिटेल कंसल्टेंसी में काम करने के बाद महज 30 साल की उम्र में उद्यमी बनीं ॠचा बताती हैं, “कई महिला उद्यमी मुझसे संपर्क करती हैं और पूछती हैं कि जब हालात थोड़े चुनौतीपूर्ण हों तो उनसे कैसे निबटें?

जब आप कारोबार खड़ा कर लेती हैं तो चीजों को देखने का नजरिया अलग हो जाता है और कुछ लोग उसे अहमियत देते हैं. मुझे किसी तरह का योगदान देने में खुशी होती है.” वे यह भी कहती हैं कि स्टार्टअप का ईकोसिस्टम भले बदल गया हो मगर आज के उद्यमी भी काफी समझदार और व्यावहारिक हैं.

