
इस ट्रेन में केबिन छोटा-सा और उसकी विंडस्क्रीन बहुत बड़ी होती है. 130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चलती वंदे भारत एक्सप्रेस के केबिन से सिग्नल कुछ सेकंड के भीतर दिखते और गायब हो जाते हैं. प्रतिक्रिया में जरा-सी भी देर से कुछ का कुछ हो सकता है.
इसीलिए आज भी कई लोग इसे ‘मर्दों का काम’ मानते हैं. मगर दक्षिणी रेलवे के चेन्नै डिविजन में यह जिम्मेदारी अक्सर ऐश्वर्या एस. मेनन संभालती हैं. यह सीनियर असिस्टेंट लोको पायलट कहती है, “बात सिर्फ ट्रेन चलाने की नहीं. बात सैकड़ों लोगों को सुरक्षित और समय पर उनकी मंजिल पर पहुंचाने की है.”
केरल में अलुवा के नजदीक बसे मूझिकुलम की रहने वाली ऐश्वर्या 2019 में इत्तेफाक से ही भारतीय रेलवे से जुड़ीं. उन्होंने इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और शुरुआत में वायु सेना की परीक्षा में बैठीं लेकिन फिर रेलवे की इस नौकरी की परीक्षा उन्होंने पास कर ली.
वे याद करती हैं, “तभी यह एहसास होने लगा कि मैं ट्रेन चलाने जा रही हूं, और यह कितना गैरपारंपरिक और रोमांचक होगा.”
छुटपन में ही सिर से पिता का साया उठने के बाद मां ने उन्हें पाला-पोसा, जो शुरुआत में नाइट शिफ्ट और सुरक्षा को लेकर परेशान रहती थीं. ऐश्वर्या बताती हैं, “समय के साथ वे इसकी अभ्यस्त हो गईं.” उनके पति का सहारा भी बेहद अहम रहा.
वे कहती हैं, “लोको पायलट पुरुष हो या महिला, कोई भी परिवार के सहारे और समझ के बिना यह काम नहीं कर सकता.”
लोको पायलट के काम का समय बारी-बारी से बदलता रहता है, सप्ताह के अंत की छुट्टियां भी तय नहीं होतीं, पूरी यात्रा में लगातार अलर्ट रहना पड़ता है. सिग्नलिंग के प्रति उनके अनुशासित रवैये और अच्छे प्रदर्शन ने वरिष्ठ अधिकारियों का ध्यान खींचा.
जब 2022 में दक्षिणी रेलवे में वंदे भारत सेवाओं की शुरुआत हुई, वे उन पायलटों में थीं जिन्हें यह प्रतिष्ठित ट्रेन चलाने की जिम्मेदारी सौंपी गई. तभी से वे चेन्नै-कोयंबत्तूर और चेन्नै-विजयवाड़ा वंदे भारत ट्रेन चलाती आ रही हैं.

ऐश्वर्या के रिकॉर्ड में आज 2,000 घंटे से ज्यादा की फुटप्लेटिंग—लोकोमोटिव में काम करने के लिए प्रयुक्त रेलवे की पारंपरिक शब्दावली—दर्ज है. वे उन 10 लोको पायलट में थीं जिन्हें जून 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में आमंत्रित किया गया था.
वे याद करती हैं, “मुझे लगा, मैं क्यों? मैंने ऐसा खास क्या किया है?” उनकी आंखों से ऐसी युवती का मद्धम अविश्वास झलक रहा था जो अब भी अपने को बदलाव का प्रतीक कम और अपना काम कर रही लोको पायलट ज्यादा मानती है.

