
इस नृत्य में कुछ भी सरल नहीं. कुडियाट्टम 2,000 साल पुरानी रंग-बिरंगी, मंदिरों से जुड़ी कला है जिसमें संस्कृत नाटक और केरल की लोक परंपराएं मिलती हैं. यह नाट्य कला ज्यादातर बैठकर प्रस्तुत की जाती है.
लेकिन इसमें नेत्र अभिनय और हस्त अभिनय का बेहद गहन इस्तेमाल होता है. कई बार इसकी प्रस्तुति बहुत विस्तृत होती है. नांगियार यानी महिला कलाकार और चक्यार यानी पुरुष अभिनेता इसे निभाते हैं. ये प्रस्तुतियां मंदिर के कूथंबलम यानी आंतरिक मंच पर कई रातों तक चलती हैं. कभी-कभार महीने से भी ज्यादा.
कपिला वेणु इसी परंपरा में पैदा हुईं. वे मोहिनीअट्टम गुरु निर्मला पणिक्कर और मशहूर कुडियाट्टम कलाकार जी. वेणु की बेटी हैं. उनका बचपन दो जगहों पर बीता: लॉरेंस स्कूल, लवडेल, जहां उनकी मां पढ़ाती थीं और त्रिशूर के इरिंजलकुडा स्थित ‘नटनकैराली’ जिसे वेणु ने 1975 में पारंपरिक मंचीय कला केंद्र के रूप में शुरू किया था.
कपिला का कुडियाट्टम का सफर सात साल की उम्र में शुरू हुआ. उन्होंने गुरुकुल परंपरा में महान अम्मन्नूर माधव चाक्यार के सान्निध्य में 10 साल तक ट्रेनिंग ली लेकिन वे कहती हैं कि पिता वेणु की सलाह और निगरानी ने ही उन्हें वह कलाकार बनाया जो वे आज हैं.
इस सफर में उन्होंने मोहिनीअट्टम, केरल की मार्शल आर्ट कलरीपयट्टू और नांगियारकुतू की भी ट्रेनिंग ली. नांगियारकुतू कुडियाट्टम का महिला एकल रूप है.
तीन दशक लंबे करिअर में कपिला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रशंसित कई डांसर-कलाकारों के साथ ट्रेनिंग और सहयोग किया है, जिनमें मिन तनाका और अकरम खान शामिल हैं. उन्होंने यूरोप और अमेरिका में भी परफॉर्म किया जिसकी शुरूआत सिर्फ 17 साल की उम्र में हुई थी.
जब उन्होंने स्वीडन में फुल लेंथ कुडियाट्टम की प्रस्तुति दी थी. कपिला की नारीवादी राजनीति उनकी कला में घुली हुई है फिर चाहे वे गांधारी, वसंतसेना या कण्णगी जैसी शास्त्रीय नायिकाओं को ही क्यों न निभा रही हों.

कुमार गंधर्व सम्मान और केरल संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड सहित कई सम्मानों की विजेता कपिला पर संजू सुरेंद्रन ने उन्हीं के नाम से एक डॉक्युमेंट्री भी बनाई है, जिसे नेशनल अवॉर्ड मिल चुका है.

