
हृजॉय दास कानूनगो
पांच महीने तक पूरी तरह बेड रेस्ट पर रहने से मीराबाई चानू का वेटलिफ्टिंग करिअर एक तरह से खत्म ही हो गया था. 2018 के राष्ट्रमंडल खेलों के बाद पीठ की गंभीर चोट ने उन्हें बिस्तर से उठने तक में असमर्थ कर दिया था.
वे कहती हैं, “बिस्तर पर पड़े-पड़े मैं अक्सर सोचती थी कि क्या मैं फिर कभी वजन उठा पाऊंगी? उस समय तो यही लगा था कि मुझे वेटलिफ्टिंग छोड़नी पड़ेगी.”
उसके बाद हुई वापसी ने तो जैसे चानू की एक मजबूत विरासत खड़ी कर दी. 2020 के तोक्यो ओलंपिक में भारोत्तोलन में उन्होंने भारत का पहला ओलंपिक रजत पदक हासिल किया, फिर विश्व चैंपियनशिप के स्वर्ण और राष्ट्रमंडल खेलों की सफलता से उनका करिअर और समृद्ध हुआ.
इस वर्ष, उन्होंने एक और राष्ट्रमंडल स्वर्ण पदक जीतकर और राष्ट्रीय भारोत्तोलन चैंपियनशिप में तीन राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाकर देश के सदाबहार एथलीटों में स्थान फिर से पक्का कर लिया.
चानू का हमेशा से यही मानना रहा है कि सफलता दृढ़ विश्वास से मिलती है और इसमें मां उनकी ताकत का सबसे बड़ा स्रोत रहीं. वे कहती हैं, “उन्होंने शुरू से ही हमेशा मेरा साथ दिया. चोटों से लेकर तमाम संघर्षों तक मैं जिन स्थितियों से गुजरी, वे वह सब जानती हैं.”

भारत के सबसे चर्चित खेल दिग्गजों में से एक के रूप में पूर्वोत्तर का प्रतिनिधित्व करना व्यक्तिगत रूप से उनके लिए बेहद मायने रखता है. वे कहती हैं, “मैं लोगों को दिखाना चाहती थी कि मेरी पहचान क्या है. मैं मणिपुर और पूर्वोत्तर से ताल्लुक रखती हूं.”
युवा महिलाओं के लिए उनका संदेश उनके अनुभवों का सार है. वे कहती हैं, “ऐसा कुछ नहीं है जिसे हम हासिल नहीं कर सकते. लेकिन हम विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करना चाहती हैं, तो तीन चीजें आवश्यक हैं—कड़ी मेहनत, त्याग और अनुशासन.”

