
जब शिवानी घोष को 2024 में पता चला कि असम के जोरहाट से एक हाथी को दिल्ली के ग्रेटर कैलाश लाया जाना है तो उनके मन में तुरंत एक सवाल उठा: उस जानवर को रखा कहां जाएगा? जवाब था सैनिक फार्म्स, एक घनी बसावट वाला, पानी की कमी से जूझता इलाका.
धार्मिक उद्देश्यों के लिए हाथियों के ट्रांसफर के खिलाफ दिल्ली हाइकोर्ट में पहले से केस लड़ रहीं शिवानी और उनके सहयोगियों ने एक पशु कल्याण संगठन की तरफ से तत्काल दखल की मांग की. अदालत ने निरीक्षण का आदेश दिया और फिलहाल उसके स्थानांतरण पर रोक लगा दी.
वे उस नतीजे के बारे में कहती हैं, “एक समय में एक हाथी”—और यही बात अब भी पर्यावरण कानून को लेकर उनके नजरिए को परिभाषित करती है.
आर्किटेक्ट माता-पिता के घर 1983 में जन्मीं शिवानी ने कक्षा आठ में ही तय कर लिया था कि वे जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करना चाहती हैं. उनके परिवार ने उनकी उस शुरुआती महत्वाकांक्षा का साथ दिया, और वही मदद उन्हें आज अपने वकील पति और सात साल की बेटी से भी मिलती है.
कोलकाता की द वेस्ट बंगाल नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ जुरिडिकल साइंसेज से ग्रेजुएशन के बाद उन्हें ऑक्सफोर्ड के लिए रोड्स स्कॉलरशिप मिली, जहां उन्होंने कानून और पर्यावरण परिवर्तन की पढ़ाई की.
सन् 2008 में तत्कालीन केंद्रीय सूचना आयुक्त शैलेश गांधी के साथ काम करने के अनुभव ने उन्हें यह सलाहियत दी कि सार्वजनिक संस्थाएं भीतर से कैसे काम करती हैं और वे अक्सर कहां चूक जाती हैं. सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के साथ 13 वर्षों के जुड़ाव ने उन्हें शोधकर्ता और मुकदमे लड़ने वाली वकील, दोनों रूपों में गढ़ा.
उन्होंने 2019 में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाले ओपन-एक्सेस संकलन इंडियन एनवायरनमेंटल लॉ: की कॉन्सेप्ट्स ऐंड प्रिंसिपल्स का संपादन किया, जिसे अब विश्वविद्यालयों में पढ़ाया जाता है.

सुप्रीम कोर्ट की एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड शिवानी उन तीन एमिकस क्यूरी में से एक हैं, जो दशकों पुराने एम.सी. मेहता केस में शीर्ष अदालत की सहायता कर रही हैं. यह केस राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण नियंत्रण उपायों को अब भी आकार देता है.
शिवानी के लिए आज पर्यावरण की केंद्रीय लड़ाई सिर्फ मौजूदा कानूनी सुरक्षा उपायों को लागू कराने की नहीं, बल्कि छूट, कमजोर परिभाषाओं और औपचारिक-सी सार्वजनिक सलाह-मशविरा प्रक्रिया के जरिए उनके चुपचाप क्षरण को रोकने की भी है.

