
महज दो साल की उम्र में ही कृति कारंत ने मशहूर बाघ विशेषज्ञ अपने पिता डॉ. उल्लास कारंत के साथ जंगलों में जाना शुरू कर दिया था. मगर वास्तव में संरक्षण के क्षेत्र में करिअर बनाने का फैसला उन्होंने येल यूनिवर्सिटी में मास्टर्स डिग्री की अपनी पढ़ाई के दौरान लिया.
उस समय उनकी उम्र 22 साल थी और पश्चिमी घाट के कर्नाटक वाले हिस्से में स्थित भद्रा वन्यजीव अभयारण्य के एक शोध प्रोजेक्ट ने उनके उस फैसले को पक्का कर दिया.
साल 2011 में उन्हें एक बड़ा मौका हाथ लगा, जब मानव-वन्यजीव संघर्ष पर शोध के लिए नेशनल ज्योग्राफिक सोसाइटी ने उन्हें अनुदान दिया. कीर्ति बताती हैं, “जब इस तरह का कोई संगठन आपको चुनता है तो इससे आपकी प्रोफाइल मजबूत होती है. आपको बड़े सपने देखने और ज्यादा साहसिक सवाल पूछने का आत्मविश्वास मिलता है. यह आपके करिअर की दिशा बदल देता है.”

वर्तमान में राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीवन अभयारण्य भारत के कुल भू-क्षेत्र के केवल पांच फीसद हिस्से में फैले हैं, जो अमेरिका और चीन सरीखे देशों के 15 फीसद के मुकाबले काफी कम है.
कृति का कहना है कि इसे बढ़ाकर कम से कम 10 फीसद किया जाना चाहिए. वे कहती हैं, “हम 2050 तक यह लक्ष्य हासिल कर सकते हैं. इन आंकड़ों को बढ़ाने के कई रचनात्मक तरीके हैं.”
कृति बेंगलूरू स्थित गैर-लाभकारी संस्था सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज (सीडब्ल्यूएस) की सीईओ हैं, जिसकी स्थापना उनके पिता ने 1984 में की थी. साल 2018 में कृति ने इसका नेतृत्व अपने हाथों में लिया और उसके बाद से इस संस्था ने अपना दायरा काफी बढ़ाया है.
अब यह आठ राज्यों के 100 वन्यजीव पार्कों में बड़े पैमाने पर काम करता है. इसके शिक्षा कार्यक्रम भी वन्यजीव पार्कों के आसपास के गांवों के मिडिल स्कूल के 75,000 बच्चों तक पहुंच चुके हैं.
सीडब्ल्यूएस के प्रशिक्षण कार्यक्रमों का जोर वन विभाग, अग्रिम मोर्चे पर तैनात कर्मचारियों, पशु चिकित्सा सेवाओं, पुलिस और अग्निशमन सेवाओं सरीखे अहम हितधारकों के बीच बुनियादी ज्ञान विकसित करने पर है.

