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बदलाव की अर्थशास्त्री | रूपा पुरुषोत्तमन, 48 वर्ष | चीफ इकॉनोमिस्ट और पॉलिसी एडवोकेसी हेड, टाटा ग्रुप; संस्थापक अवसर एकेडमी, मुंबई

क्या है जो बनाता है उन्हें सिरमौर : लड़कियों के लिए लीडरिशप स्कूल बनाने से लेकर टाटा ग्रुप में मैक्रोइकोनॉमिक रिसर्च का नेतृत्व करने तक उन्होंने आर्थिक समझ को सामाजिक प्रभावों से जोड़ा

रूपा पुरुषोत्तमन (बंदीप सिंह)
अपडेटेड 25 अगस्त , 2026

केरल से अमेरिका जा बसे माता-पिता के घर जन्मी रूपा पुरुषोत्तमन का करिअर उस सवाल ने गढ़ा जिसका सामना उन्हें किशोरवय में स्कूल के एक प्रोजेक्ट के लिए भारत में जनस्वास्थ्य के मुद्दे का अध्ययन करते हुए करना पड़ा था.

सवाल यह था: कुछ देश अमीर क्यों हो जाते हैं जबकि दूसरे देश गरीब ही रहते हैं? यह सवाल उनके जेहन में घर कर गया, जिसके चलते उन्होंने येल से अर्थशास्त्र, नीतिशास्त्र, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मामलों की और उसके बाद लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स से डेवलपमेंट स्टडीज की पढ़ाई की.

महज 25 की उम्र में रूपा ने गोल्डमैन सैक्स की 2003 की असरदार रिपोर्ट ‘ड्रीमिंग विद ब्रिक्स: द पाथ टू 2050’ की सहलेखिका के तौर पर वैश्विक मान्यता हासिल की. रिपोर्ट में कहा गया था कि ब्राजील, रूस, भारत और चीन बड़ी आर्थिक शक्ति बनकर उभर सकते हैं.

उनका कहना है कि इस अनुभव ने उन्हें “गहराई से विश्लेषण करना और असरदार ढंग से लिखना” सिखाया. भारत आने और निवेश अनुसंधान में काम करने के बाद रूपा को एहसास हुआ कि रुपए-पैसे की कमी के कारण कई होनहार भारतीय लड़कियों को नेतृत्व का प्रशिक्षण नहीं मिल पाता.

इस कमी को पूरा करने के लिए उन्होंने 2015 में पुणे में गैर सरकारी संस्था अवसर एकेडमी की स्थापना की.

रूपा कहती हैं, “हम न केवल महिला नेतृत्व की अगली पीढ़ी विकसित करना चाहते हैं बल्कि ऐसा मॉडल स्कूल भी बनाना चाहते हैं जहां दुनिया भर की और भारत की बेहतरीन शिक्षा पद्धतियों का मेल भी हो.” इस आवासीय माध्यमिक स्कूल में अब 410 बच्चे हैं. यहां से ग्रेजुएट होकर निकले छात्र भारत में अशोका और क्रिया और अमेरिका में माउंट होलिओक, सिराक्यूज और इथाका सरीखी संस्थाओं तक गए.

रूपा 2017 में चीफ इकॉनोमिस्ट और पॉलिसी एडवोकेसी की प्रमुख के तौर पर टाटा ग्रुप से जुड़ीं. तभी से उन्होंने भारत के सबसे विशालकाय कारोबारी समूहों में से एक में मैक्रोइकॉनोमिक रिसर्च और पॉलिसी एडवोकेसी की अगुआई की.

अब वे मुंबई में रहती हैं, और उनके इस सफर से कई अर्थों में टाटा समूह की उस परंपरा की गूंज सुनाई देती है जिसमें उद्यम को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा जाता है.

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