
गंगटोक से 19 किलोमीटर दूर शांत गांव नंदोक में पलीं-बढ़ीं त्रिवेणी राई ने बहुत जल्दी समझ लिया था कि लड़की होने का मतलब क्या होता है. इससे फर्क नहीं पड़ता था कि वे चार बहनों वाले परिवार से थीं, और उनके स्कूलटीचर माता-पिता ने बेटियों के बीच कभी भेदभाव नहीं किया.
हालांकि आसपास के लोग उन्हें लगातार याद दिलाते रहते थे कि महिलाओं की जगह कहां है. समारोहों में उनसे छोटे कजिन्स को पारंपरिक रस्मों के दौरान उनसे पहले आशीर्वाद दिया जाता, जबकि रिवाज उम्र के घटते क्रम का था.
नसे कहा जाता कि लड़के परिवार की विरासत आगे बढ़ाएंगे, जबकि लड़कियां शादी करके चली जाएंगी. काम से लौटने के बाद उनसे खाना बनाने की उम्मीद की जाती, जबकि लड़के आराम करते. दिखने में ये साधारण पल थे लेकिन उन्होंने असाधारण जख्म छोड़े.
राय ने इन्हें स्वीकार करने के बजाए चुनौती देने का फैसला किया. वे कहती हैं, “एक महिला के रूप में मेरे लिए ऐसा पेशा चुनना जरूरी था, जो मुझे ताकत और अधिकार का एहसास दिलाए.”
पहले उन्होंने पत्रकार बनने का सपना देखा और कुछ समय तक एक स्थानीय अखबार में रिपोर्टर के तौर पर काम किया. फिर उन्हें फिल्ममेकिंग मिली. सिनेमा ने उन्हें यह एहसास कराया कि इसके जरिए वे पूरी दुनिया रच सकती हैं.
यह रास्ता आसान बिल्कुल नहीं था. सिक्किम में सुरक्षित सरकारी नौकरी अब भी सपना मानी जाती थी, जबकि फिल्ममेकिंग, खासकर नेपाली में, न तो आर्थिक भरोसा देती थी और न ही वहां कोई स्थापित इंडस्ट्री थी. राई सत्यजीत रॉय फिल्म ऐंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट से जुड़ीं और फिर दूरदर्शन के साथ काम किया, जहां उन्होंने डॉक्युमेंट्री और टीवी शो बनाए.
कमाए हुए हर रुपए, यहां तक कि मां की रिटायरमेंट सेविंग्स का एक हिस्सा भी, उन्होंने अपनी पहली फीचर फिल्म शेप ऑफ मोमो में लगा दिया. यह ऐसा दांव था जिसे लगाने के लिए बहुत कम निवेशक तैयार थे:

पहाड़ की महिलाओं पर बनी नेपाली भाषा की फिल्म, वह भी एक पहली बार फिल्म बना रही डायरेक्टर की. लेकिन जोखिम सफल रहा. फिल्म दुनिया भर में गई और राई को हिमालय से उभरती सबसे संभावनाशील आवाजों में से एक के रूप में स्थापित कर दिया.

