
वे ओलंपिक में पहुंचने वाली भारत की सबसे कम उम्र की महिला पहलवान थीं. लेकिन उनकी ऊंची उम्मीदें चकनाचूर हो गईं जब 2024 के पेरिस ओलंपिक के पहले ही दौर में चौंकाने वाली हार के बाद वे बाहर हो गईं.
फिर भी उस वक्त 21 की वय भी पूरी न करने वाली अंतिम पंघाल पहले ही लगातार दो साल दो यू-20 विश्व चैंपियनशिप जीत चुकी थीं और तीन वैश्विक मुकाबलों—एशियाई खेल, एशियाई चैंपियनशिप और विश्व चैंपियनशिप—में कांस्य पदक उठा चुकी थीं. उन्हें यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग का 2023 का राइजिंग स्टार या उभरता सितारा करार दिया गया था. ऐसा लगता था कि उनसे कोई गलती हो ही नहीं सकती.
वे कहती हैं, “पहले तो मुझे सेहत ठीक करनी थी.” सिर्फ शारीरिक रूप से ही नहीं. ओलंपिक के उस मुकाबले ने दिलो-दिमाग पर भी असर छोड़ा था. लिहाजा हार को लेकर स्वस्थ रवैया भी विकसित करने की जरूरत थी.
अब दो साल बाद एशियाई खेलों में जगह बनाने और महिलाओं के 53 किलो वर्ग में विश्व नंबर वन (2025) बनने के बाद अंतिम कहीं ज्यादा फुर्तीली और चौकन्नी हैं. और उनके इरादे भी मजबूत हैं. महत्वाकांक्षा तो पुरानी दोस्त है ही, लेकिन अब धुन और लगन भी साथ आ जुड़ी है.
उन्हीं के शब्दों में, “हर मुकाबला कुछ नया सिखाता है, कैसे हमला करें, किस पर ध्यान दें. कोई भी दो प्रतिद्वंद्वी एक-से नहीं होते. जब हम प्रशिक्षण लेते हैं, तो यह भी सीखते हैं कि जीतने पर बहुत ज्यादा आत्मविश्वास न रखें और हारने पर दिल छोटा न करें.”

उनकी दिनचर्या बहुत कुछ वही है जो 10 साल की उम्र में सीखना शुरू करने के वक्त थी. सुबह छह बजे उठना, तीन से चार घंटे प्रशिक्षण लेना, शाम को भी दोहराना. वे उस सफर को याद करती हैं जो रोज अभ्यास के लिए 20 किमी दूर जाने के साथ शुरू हुआ था और अपनी नाकामियों को भी सम्मान के तमगे की तरह पहनती हैं.
युवाओं को उनकी सलाह है, “अपना सब कुछ झोंक दो, वह सब जो तुम्हारे पास है. मुझे सबसे अच्छी सलाह यही मिली थी कि अपने लक्ष्य से नजर मत हटने दो, चाहे जो हो, एक दिन भी पीछे मत हटो.”

