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प्रधान संपादक की कलम से

990 के दशक की शुरुआत में न्यायेतर हत्याओं पर खालड़ा के दस्तावेजों को एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर उठाया.

इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन कवर, अंक- 28 जुलाई 2026
इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन कवर, अंक- 28 जुलाई 2026
अपडेटेड 4 अगस्त , 2026

प्रतिबंधों के साथ अक्सर ऐसा होता है कि वे खुद को नाकाम कर देते हैं. किसी फिल्म का सार्वजनिक प्रदर्शन रोकते ही आप उसके लिए वह बड़ा दर्शक वर्ग जुटा देते हैं, जो उसे शायद अपने दम पर कभी नहीं मिलता. इस मामले में फिल्म सतलज को ओटीटी प्लेटफॉर्म जी5 पर आने के दो दिन बाद ही रहस्यमय ढंग से हटा दिया गया.

दिलजीत दोसांझ अभिनीत और हनी त्रेहन के निर्देशन वाली यह फिल्म पंजाब के बेहद हिंसक दौर को दिखाती है. फिल्म में इसे जसवंत सिंह खालड़ा (दोसांझ ने इसे निभाया) की शख्सियत को केंद्र में रखकर दिखाया गया है. मानवाधिकार कार्यकर्ता खालड़ा को 1995 में अगवा कर उनकी हत्या कर दी गई थी.

इस मामले में पंजाब पुलिस के छह अधिकारियों को दोषी ठहराया गया और उम्रकैद की सजा दी गई. 1990 के दशक की शुरुआत में न्यायेतर हत्याओं पर खालड़ा के दस्तावेजों को एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी संस्थाओं ने बड़े पैमाने पर उठाया. यह सिख उग्रवाद के प्रति भारत की प्रतिक्रिया पर बाद की बहसों का एक अहम हिस्सा बना—एक ऐसा रवैया, जो लाचार निष्क्रियता और फिर जरूरत से ज्यादा सुधार के झटकों के बीच झूलता रहा, जिसके चलते ज्यादतियां हुईं.

लेकिन जैसे-जैसे यह फिल्म बड़े पैमाने पर देखी जा रही है और राजनैतिक दल तथा गुरुद्वारे सार्वजनिक स्क्रीनिंग आयोजित कर रहे हैं, यह बहस प्रतिबंध की राजनीति से आगे बढ़ गई है. शुरुआत में इसकी शर्तें इस बात से तय हुईं कि फिल्म ने अपने विषय को कैसे पेश किया:

कुछ लोगों के लिए वर्जित और दूसरों के लिए जरूरी चर्चा. हालांकि विवाद का एक मुख्य बिंदु यह बन गया कि फिल्म ने क्या नहीं दिखाया. यानी वे हालात जिनमें ये हत्याएं हुईं. और वह संदर्भ कोई संयोग नहीं है. ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद भी पंजाब ने जो झेला, उसे ईमानदारी से समझने के लिए वह जरूरी है.

इस हफ्ते हमारी कवर स्टोरी इस मसले का पूरा सच सामने रखने की कोशिश करती है. निर्देशक त्रेहन अपनी कलात्मक स्वतंत्रता का हवाला देकर सही कहते हैं कि उन्होंने वास्तविकता के एक पहलू पर ध्यान केंद्रित किया है. खामोशी में ढके सच को बताया जाना चाहिए. लेकिन कलात्मक स्वतंत्रता और पत्रकारिता की जिम्मेदारी अलग-अलग दायरों में आती हैं.

उन बेहद परेशान करने वाले वर्षों के बाद जन्मी पूरी पीढ़ियां अब फिल्म से तब के पंजाब की जानकारियां पा रही हैं. कवर स्टोरी का हमारा पैकेज उस तस्वीर को पूरा करता है. हम यहां सिर्फ इतिहास को नहीं टटोल रहे, बल्कि जीवित वास्तविकता का अपडेट तलाश रहे हैं. यह इस तथ्य का सम्मान करता है कि पीड़ित हर तरफ थे.

हमारा आलेख भयावह पृष्ठभूमि की रूपरेखा खींचता है. हमारे प्रमुख लेखक असित जॉली, जो उन वर्षों में पंजाब के संवाददाता थे और जिन्होंने इन घटनाओं को रिपोर्ट किया था, लिखते हैं, “1995 में अज्ञात दाह संस्कारों पर खालड़ा के खुलासे से पहले अभूतपूर्व आतंकी हिंसा हो चुकी थी. वह 1991 में चरम पर पहुंची, जब 5,265 पंजाबी—नागरिक, सुरक्षाकर्मी और आतंकवादी—मारे गए.”

वे जोड़ते हैं कि 1990 के दशक की शुरुआत तक तरन तारन को व्यापक रूप से ‘मुक्त’ क्षेत्र और खालिस्तान की अघोषित ‘राजधानी’ माना जाने लगा था. हर कोई निशाने पर था: अकाली नेता, वे संपादक जो उनके फरमान नहीं मानते थे, अदालत में बैठा एक जज, पुलिसकर्मियों के परिवार, सतलज-यमुना नहर पर काम कर रहे इंजीनियर, बसों और ट्रेनों में यात्रा कर रहे आम हिंदू.

सिविल एडमिनिस्ट्रेशन, निचली अदालतें और मीडिया खालिस्तानी संगठनों के फरमान के आगे ढह गए थे. पाकिस्तान से सटे जिलों में उन्हें लगभग कोई चुनौती नहीं थी. पाकिस्तान इन घटनाओं का मूकदर्शक नहीं, बल्कि अस्थिरता का सक्रिय संरक्षक था. खालड़ा पर यह फिल्म इस तथ्य को छोड़ देती है कि वे खालिस्तान का समर्थन करते थे.

तब के पुलिस महानिदेशक के.पी.एस. गिल भी काफी विवादित शख्स रहे. कुछ लोग उन्हें बड़े पैमाने पर हत्याओं का सूत्रधार मानते हैं, तो कुछ उन्हें “सुपरकॉप” कहते हैं, जिसने पंजाब का बेड़ा गर्क होने से बचाया. दोनों बातें सही हैं. फिल्म अपनी रचनात्मक स्वतंत्रताओं के भीतर एक पक्ष पेश करती है. हमारी कवर स्टोरी वह सब बताती है, जिसे इस फिल्म ने न दिखाने का फैसला किया.

इस पैकेज के केंद्र में वह भी है, जो सीनियर डिप्टी एडिटर अनिलेश एस. महाजन और ग्रुप फोटो एडिटर बंदीप सिंह पूरे पंजाब की यात्रा के बाद लेकर लौटे: मानवीय कहानियों का एक संग्रह. आतंकी हिंसा से उजड़े परिवार. पुलिस ज्यादती से तबाह परिवार. हर तरफ के पीड़ित. डिप्टी एडिटर सुहानी सिंह इसमें त्रेहन का एक खास इंटरव्यू जोड़ती हैं, जिसमें वे बताते हैं कि सेंसरशिप ने सच कहने की उनकी कोशिश के खिलाफ कैसे काम किया.

इससे यह पैकेज पूरा होता है, जो फिल्म का खंडन नहीं है. एक तरह से यह फिल्म का जरूरी पक्ष है. सिनेमा ने जो शुरू किया, उसका पत्रकारिता के जरिए विस्तार. दोनों ही सच तक पहुंचने की कोशिशें हैं. दोनों में से किसी के पास पूरा सच नहीं है. शायद यही इस पूरे प्रसंग से सामने आने वाला सबसे अहम सच है.

फिल्म को दबाए जाने से ऐसे सवाल भी उठते हैं, जो पंजाब से आगे जाते हैं. मोदी सरकार ने आंतरिक सुरक्षा के आधार पर इसे मंजूरी नहीं दी. कांग्रेस, जो उस दौर में सत्ता में थी, उन वर्षों का हिसाब-किताब सामने आने से असहज होने की अपनी वजहें रखती है. दोनों ही रुख इस इतिहास की उठ सकने वाली हलचल को लेकर चिंता दिखाते हैं.

यह चिंता बेबुनियाद भी नहीं है. पंजाब में कट्टरपंथ अब भी है. जिन पीड़ितों के परिजनों से हमने बात की, उनमें से कुछ ने काफी हद तक इसे भुला दिया है. ले‌‌किन कुछ अब भी इतने आहत और डरे हुए हैं कि खुलकर बोलने को तैयार नहीं. घाव पुराने हैं, लेकिन पूरी तरह भरे नहीं.

वह दौर आजाद भारत के इतिहास के सबसे अंधेरे वर्षों में से था. उसने असली नायक के साथ ही निंदनीय दैत्य भी दिए. उन वर्षों पर खामोशी ने घायल पंजाब को आगे बढ़ने में मदद की. लेकिन खामोशी कोई इलाज नहीं होती और जिस चीज की जांच नहीं होती, वह लौटने का रास्ता खोज लेती है. इस कहानी के दोनों तरफ सबक मौजूद हैं.

जैसा कि हमने इस देश में कई बार देखा-सीखा हैः त्रासदी कोई पक्षपात नहीं करती.

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