
जब जुलाई की शुरुआत में लाखों लोग रतजगा करके 2026 फीफा वर्ल्ड कप में मौजूदा चैंपियन अर्जेंटीना के खिलाफ काबो वर्दे का जुझारू प्रदर्शन देख रहे थे, भारत के फुटबॉल प्रशंसक सोच रहे थे कि अफ्रीका का एक छोटा-सा द्वीप देश, जो गोवा से थोड़ा बड़ा है, फुटबॉल दिग्गजों से कैसे भिड़ रहा है, जबकि भारत के लिए क्वालिफाइ करना अब भी दूर की कौड़ी है.
भारतीय फुटबॉल की दुर्दशा तो देखिए, भारत 2026 एशियाई खेलों से बाहर हो गया क्योंकि पुरुष टीम केंद्रीय खेल मंत्रालय की योग्यता शर्त को पूरा नहीं कर सकी, जिसमें एशिया की शीर्ष आठ टीमों में होना जरूरी था. एशियन फुटबॉल कन्फेडरेशन (एएफसी) के 46 सदस्यों में भारत 24वें स्थान पर है और टीम महाद्वीप की सबसे बड़ी प्रतियोगिता एएफसी एशियन कप 2027 के लिए भी क्वालिफाइ नहीं कर सकी.
इतिहास रचने की भारत की कोशिश 2024 में ही एएफसी क्वालिफायर के दूसरे दौर में ढह गई थी. ग्रुप ए में कतर, कुवैत और अफगानिस्तान के साथ खेलते हुए टीम वर्ल्ड कप क्वालिफायर में आगे बढ़ने के लिए जरूरी शीर्ष दो स्थान हासिल नहीं कर सकी. ब्लू टाइगर्स को सिर्फ एक जीत मिली—कुवैत के खिलाफ—जो 22 साल में देश के बाहर पहली जीत थी.
विश्व फुटबॉल रैंकिंग में तो दुर्दशा और भयावह है. भारत लगातार नीचे फिसला है—2023 में 102वें स्थान से 2026 में 139वें स्थान पहुंच गया है. भारत की सर्वोच्च फीफा रैंकिंग अब भी 94 है, जो 1996 में बाइचुंग भूटिया की कप्तानी में हासिल हुई थी, जबकि 96 की दूसरी सर्वश्रेष्ठ रैंकिंग वर्ष 2017 में आई थी, जब भारत ने फीफा अंडर-17 वर्ल्ड कप की मेजबानी की थी.
भारत ने जब अपने सबसे बड़े फीफा आयोजन की मेजबानी की थी, तो इसे फुटबॉल पुनर्जागरण की शुरुआत बताया गया था. स्टेडियमों को आधुनिक बनाया गया, दर्शक अभूतपूर्व संख्या में पहुंचे और ऑल इंडिया फुटबॉल फेडरेशन (एआइएफएफ) ने स्थायी विरासत बनाने की बात कही. उस टूर्नामेंट में हिस्सा लेने वाले 10 देशों के कम से कम 18 खिलाड़ी 2026 फीफा वर्ल्ड कप में खेले.
भारत उस भव्य मौके के सहारे नए दौर में जाने की उम्मीद कर रहा था पर अब और दूर खिसकता दिखता है. लेकिन कैरिबियाई द्वीप कुरासाओ जैसे छोटे देश, जिसकी आबादी 1,58,000 है, और सिर्फ पांच लाख आबादी वाले छोटे काबो वर्दे ने 2026 वर्ल्ड कप के विस्तारित 48 टीमों वाले प्रारूप का फायदा उठाया और क्वालिफाइ किया.
दोनों ने अपने देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर सुधारा है और यूरोप की अलग-अलग लीगों में खेलने वाले अपने फुटबॉल प्रवासी समुदाय पर काफी भरोसा किया है. लेकिन भारत में न सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर में सुधार नहीं हो रहा है, बल्कि जज्बा भी गायब है.
आधा-अधूरा ढांचा
भारतीय फुटबॉल का संचालन एआइएफएफ करता है, जो फीफा और एएफसी से संबद्ध शीर्ष संस्था है. एआइएफएफ राष्ट्रीय टीमों, युवा विकास और घरेलू प्रतियोगिताओं की देखरेख करता है, लेकिन भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) की तरह खेल पर उसका पूरा नियंत्रण नहीं है.
फुटबॉल क्लब स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जो खिलाड़ियों के कॉन्ट्रैक्ट अपने पास रखती हैं और तय करती हैं कि उन्हें राष्ट्रीय टीम के लिए कब छोड़ा जाए. राष्ट्रीय फुटबॉल कोचों को अक्सर स्थिर टीम बनाने और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट से पहले पर्याप्त तैयारी का समय हासिल करने में मुश्किल होती है.
घरेलू फुटबॉल पिरामिड के शीर्ष पर इंडियन सुपर लीग (आइएसएल) है. उसके बाद आइ-लीग, आइ-लीग 2 और आइ-लीग 3 आते हैं, जबकि राज्य लीग उसकी बुनियाद बनाती हैं. आइएसएल के कुछ शीर्ष सितारे एक सीजन में दो करोड़ रुपए से आठ करोड़ रुपए तक कमा सकते हैं, लेकिन ज्यादातर भारतीय फुटबॉलर सालाना आठ लाख से 60 लाख रुपए के बीच कमाते हैं.
आइ-लीग के खिलाड़ी अक्सर साल में तीन लाख से 15 लाख रुपए तक कमाते हैं. इसके उलट, इंडियन प्रीमियर लीग में बिना अंतरराष्ट्रीय मैच खेले खिलाड़ी भी 30 लाख रुपए की बेस ऑक्शन कीमत पा सकता है, जबकि कई स्थापित क्रिकेटर करोड़ों में कमाते हैं.
यूरोप की शीर्ष प्रतियोगिताओं—प्रीमियर लीग (इंग्लैंड), ला लीगा (स्पेन), बुंडेसलीगा (जर्मनी) और सेरीआ (इटली)—की तुलना में भारतीय फुटबॉल अभी विकास के चरण में है. यूरोपीय लीगों को समृद्ध क्लबों, विश्वस्तरीय अकादमियों और स्काउटिंग सिस्टम, अरबों डॉलर के प्रसारण सौदों और व्यापक प्रतिभा भंडार का सहारा मिलता है. इसी वजह से वे दुनिया के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों और कोचों को आकर्षित कर पाती हैं. उसके मुकाबले भारतीय फुटबॉल अब भी अपना जमीनी इकोसिस्टम और इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर रहा है.
कम उम्र में साधें
भारतीय फुटबॉल से जुड़े लोग मानते हैं कि देश की सबसे बड़ी नाकामी खिलाड़ियों के नीली जर्सी पहनने से बहुत पहले कम उम्र में ही शुरू हो जाती है. शिलांग लाजोंग एफसी के पूर्व मुख्य कोच तथा डेम्पो एफसी के पूर्व सीईओ प्रद्युम रेड्डी कहते हैं, ''बच्चों के खेलने के लिए फुटबॉल मैदानों की कमी है. सिर्फ अकादमियों में ट्रेनिंग नहीं, युवाओं के लिए साल भर चलने वाली लीग भी होनी चाहिए.’’
भारत देशव्यापी स्काउटिंग नेटवर्क बनाने के बजाए इस पर आश्रित है कि युवा खुद चयन ट्रायल में पहुंचें. असल में देश में फुटबॉल बड़े पैमाने पर निम्न कामकाजी वर्ग का खेल है. विशेषज्ञ कहते हैं कि ग्रामीण इलाके के गरीब लोगों से यह उम्मीद करना अव्यावहारिक है कि वे अपने बच्चे को किसी महानगर में भेजें, इस उम्मीद में कि उसे कोई पहचान लेगा.

पश्चिम बंगाल की शीर्ष फुटबॉल संस्था इंडियन फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव अनिर्बान दत्ता कहते हैं, ''तैयारी जिलों और गांवों तक फैलाई जानी चाहिए, जहां युवाओं का लगातार आकलन और निगरानी हो.’’
दरअसल, कम उम्र में यह तय हो पाता है कि फुटबॉलर आधुनिक खेल के लिए जरूरी तकनीकी क्षमता, रणनीतिक समझ और फिटनेस हासिल कर पाता है या नहीं. भारत में कुछ अच्छी आवासीय फुटबॉल अकादमियां हैं, जहां ऐसे कौशल बेहतर तरीके से निखारे जा सकते हैं जैसे चंडीगढ़ में मिनर्वा. स्पेन और ब्रिटेन जैसे देशों में प्रतिभाशाली खिलाड़ी ऐसी अकादमियों में बड़े होते हैं, जहां प्रशिक्षण को स्पोर्ट्स साइंस, मनोविज्ञान, रिकवरी और खेल पोजिशन कोचिंग के साथ जोड़ा जाता है.
अगर भारत अगले दशक में वर्ल्ड कप में पहुंचने की आकांक्षा रखता है, तो उसे युवा विकास पर खास ध्यान देना होगा. कई लोगों का मानना है कि विदेशी विशेषज्ञता का सबसे अच्छा लाभ युवा स्तर पर मिलेगा, जहां कोच मसल मेमरी और रणनीतिक समझ को आकार दे सकते हैं. बंगाल फुटबॉल टीम के कोच संजय सेन कहते हैं, ''हमारे युवाओं की व्यापकता ही हमारी बुनियाद है, और हम उसी को सींचने में नाकाम रहे हैं.’’
सबसे अच्छी कोचिंग भी प्रतिस्पर्धी फुटबॉल की कमी की भरपाई नहीं कर सकती. भारतीय पेशेवर खिलाड़ी आमतौर पर एक सीजन में सिर्फ करीब 30 प्रतिस्पर्धी मैच खेलते हैं, और विदेशी मैच बहुत कम होते हैं. इसके उलट ज्यादातर विदेशी खिलाड़ी घरेलू लीग और अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में 50 से ज्यादा मैच खेलते हैं.
जो देश आज भारत से आगे निकल रहे हैं, उन्होंने दशकों तक इन्हीं ढांचागत कमजोरियों को सुधारने पर काम किया है. जापान ने तीन दशक पहले जे-लीग के जरिए अपने आधुनिक फुटबॉल इकोसिस्टम की नींव रखी, जिसमें हर पेशेवर क्लब को मजबूत अकादमी सिस्टम से जोड़ा गया. उज्बेकिस्तान ने भी स्कूली फुटबॉल में व्यवस्थित निवेश किया.
घिसीपिटी व्यवस्था
भारत में प्रतिभाओं के आने के रास्ते धुंधले हैं, तो फुटबॉल की शीर्ष संस्थाएं भी कम लुंजपुंज नहीं हैं. एआइएफएफ के पिछले कुछ साल कानूनी विवादों और खेल से जुड़े पक्षों के साथ मतभेदों में बीते. 2025-26 में इंडियन सुपर लीग (आइएसएल) को लेकर लंबे समय तक बनी रही अनिश्चितता इस गड़बड़ी का पराकाष्ठा थी.
देश की इस प्रमुख प्रतिस्पर्धा पर लागू होने वाला व्यावसायिक समझौता जब खत्म हो रहा था और कोई समाधान दिखाई नहीं दे रहा था, खिलाड़ियों को इस लीग को जारी रखने की सार्वजनिक अपील करनी पड़ी.
भारत के सबसे अव्वल टूर्नामेंट के नहीं होने की संभावना से यह बात खुल गई कि घरेलू प्रतिस्पर्धाओं के वार्षिक कार्यक्रम कितने लाचार थे. भारत में एक पेशेवर फुटबॉल क्लब को चलाने पर सालाना करीब 60 करोड़ रुपए खर्च होते हैं. प्रतिस्पर्धा का आयोजन पक्का न हो, तो क्लबों के लिए स्पॉन्सरों को बनाए रखना मुश्किल हो जाता है और टिकट से होने वाली कमाई के लाले पड़ जाते हैं.
एआइएफएफ और कुछ राज्यों के फुटबॉल एसोसिएशन के बीच दरकते रिश्तों का प्रतिकूल असर भी फुटबॉल के विकास पर पड़ा. यह सबसे ज्यादा तब सामने आया जब मोहन बागान क्लब ने यूनिटी कप में भेजे जाने वाली राष्ट्रीय टीम के लिए अपने सात खिलाड़ियों को इसलिए छोड़ने से इनकार कर दिया, क्योंकि जमैका, नाइजीरिया, जिम्बाब्वे और भारत के बीच लंदन में होने वाला यह टूर्नामेंट फीफा के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों के लिए खुलने वाली अवधि का हिस्सा नहीं था और घायल होने के नाम पर भी क्योंकि एआइएफएफ चोटिल खिलाड़ियों का वित्तीय भार वहन नहीं करता.
प्रशासनिक अनिश्चितता का असर मैदान में किए गए प्रदर्शन पर पड़ना ही था. भारत के हेड कोच के रूप में क्रोएशियाई इगोर स्टिमैक के पांच साल के कार्यकाल (2019-2024) ने मिले-जुले नतीजे दिए. उनकी रहनुमाई ने भारत को 2023 में तीन खिताब—एसएएफएफ चैंपियनशिप, ट्राइ-नेशन सीरीज और इंटरकॉन्टिनेंटल कप—जिताए और भारत की रैंकिंग को भी कुछ समय के लिए फीफा टॉप 100 में बहाल किया.
मगर भारत के एक भी अंक हासिल किए बिना 2023 के एएफसी एशियन कप से बाहर हो जाने और 2026 के फीफा विश्व कप क्वालिफायर मैचों में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद जून 2024 में स्टिमैक को हटा दिया गया. अगस्त 2025 में जब खालिद जमील ने जिम्मेदारी संभाली, तब एआइएफएफ के भीतर ही कुछ लोगों का मानना था कि शुरुआत में उन्हें कुछ वक्त के लिए नियुक्त किया जाना चाहिए था.
उनके साथ दो साल के करार के बाद यह बहस फिर शुरू हो गई कि क्या नियुक्तियां लंबे वक्त की सुसंगत रणनीति के आधार पर की जा रही हैं.
एआइएफएफ के पूर्व अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल इससे इनकार करते हैं कि भारतीय फुटबॉल दिशाहीन है. वे अपने कार्यकाल (2009-2022) की कमियों को स्वीकार करते हैं, लेकिन जोर देकर कहते हैं कि तब लंबे वक्त का विजन था. वे कहते हैं, ''हमारा प्लान 2030 तक विश्व कप के लिए क्वालिफाइ करने का था. हम एक वक्त में एक कदम उठा रहे थे. चीजें बेहतर हो रही थीं.’’
भारत प्रतिभाओं को पहचानने और प्रबंधन को चुस्त-दुरुस्त करने में कामयाब हो जाता है, तब भी यह सवाल तो रहेगा ही: क्या फुटबॉल युवाओं के लिए आकर्षक है? ज्यादातर के लिए जवाब है—नहीं.
क्रिकेट की तरह फुटबॉल में पैसे न फौरन मिलते हैं और न कोई गारंटी होती है. फुटबॉल खिलाड़ियों को दशकों तक स्पोर्ट्स कोटे के तहत सरकारी नौकरी मिलती थी. अब ये मौके भी कम होते गए हैं और कई होनहार खिलाड़ियों के लिए फुटबॉल करियर का विकल्प नहीं है.
एक चिंताजनक पहलू फुटबॉल में ऐसे नए महान खिलाड़ी नहीं हैं जो पूरी पीढ़ी को लुभा सकें और लोगों में दिलचस्पी पैदा कर सकें.
तकरीबन दो दशकों से फुटबॉल बाईचुंग भूटिया और बाद में सुनील छेत्री के कंधों पर सवार रहा है. उनके करिश्मे ने मुरीदों की दिलचस्पी बनाए रखी और प्रायोजकों को भरोसा दिलाया कि भारत में फुटबॉल का बाजार है. मगर उनके बाद आए खिलाड़ियों से वह उम्मीद नहीं बनी. इसी कमी ने छेत्री को 40 की उम्र में अंतरराष्ट्रीय फुटबॉल से संन्यास लेने के अपने फैसले को उलटने के लिए मजबूर कर दिया ताकि एएफसी एशियन कप 2027 के क्वालिफायर मैचों में भारत को मजबूती मिले.
आइएसएल टीम जमशेदपुर एफसी के टीम डॉक्टर तथा भारत के फीफा एंबेसडर प्रद्युम्न टेंभेलकर कहते हैं, ''एक कनाडाई एंबेसडर ने मुझसे कहा कि विश्व कप में 128 टीमें हों, तब भी भारत नहीं होगा.’’
फुटबॉल में हमारा गहरा भरोसा
यह भले विडंबना लगे, लेकिन देश के कई हिस्सों में फुटबॉल के लिए जुनून चरम पर है. फुटबॉल मैच में कोलकाता में स्टेडियम खचाखच भर जाते हैं, केरल के गांव-गांव में धूम मची रहती है, गोवा में शाम तो इसी के नाम होती है और पूर्वोत्तर, खासकर मिजोरम और मणिपुर में खेल संस्कृति गहरे जुड़ी है. हर साल हजारों लड़के राष्ट्रीय जर्सी पहनने का सपना पाले रहते हैं.
अलबत्ता, भारतीय फुटबॉल में कुछ अच्छे बदलाव किए जा रहे हैं. जमशेदपुर की टाटा फुटबॉल एकेडमी, चंडीगढ़ की मिनर्वा, जेएसडब्ल्यू समर्थित बेंगलूरू एफसी सॉकर स्कूल और नवी मुंबई की रिलायंस फाउंडेशन यंग चैंप्स सरीखी रेजिडेंशियल एकेडमियां अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को तकनीकी ज्ञान, समुचित पोषण, दमखम और शिक्षा मुहैया कराने में लगी हैं. इन एकेडमियों के होनहार युवा खिलाड़ियों को आइएसएल की टीमों में लिया जा रहा है.
एआइएफएफ काबो वर्दे के डायस्पोरा मॉडल से प्रेरणा ले रहा है और क्लबों को अपनी टीमों में एक ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया (ओसीआइ) खिलाड़ी को उतारने की इजाजत दे रहा है. लेकिन रेड्डी कहते हैं, ''हमारे यहां डायस्पोरा में उतने खिलाड़ी ही नहीं हैं.’’ वे यह भी कहते हैं कि राष्ट्रीय टीम में प्रतिनिधित्व को लेकर फीफा के नियम बहुत सख्त हैं.
भारतीय फुटबॉल का हाल बदलने के लिए इसे नए सिरे से खड़ा करना होगा. साल भर खिलाड़ियों की खोज की जाए, एक दूसरे से जुड़े फुटबॉल स्कूल हों, मुकाबलों का साल भर का कार्यक्रम पहले से घोषित हो, और लंबे समय के रोडमैप पर टिके रहें. भारतीय फुटबॉल लंबे अरसे से कामयाबी के छोटे रास्ते खोजता रहा है. आगे निकल रहे देशों का सबक है: फुटबॉल में शॉर्टकट नहीं होते.

