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प्रधान संपादक की कलम से

राम मंदिर जनता की असाधारण आस्था के जुटान से बना था. इसने संस्था और उन लाखों लोगों के बीच एक मौन करार बनाया, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई दी. इसका उल्लंघन सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि उस प्रतीक का अपमान है जिसका मंदिर प्रतिनिधित्व करता है

इंडिया टुडे हिंदी 15 जुलाई 2026 अंक
इंडिया टुडे हिंदी 15 जुलाई 2026 अंक
अपडेटेड 13 जुलाई , 2026

- अरुण पुरी

एक खास किस्म का विश्वासघात होता है, जो सामान्य भ्रष्टाचार से कहीं ज्यादा गहरी चोट करता है. वह आस्था को ही आहत करता है. अयोध्या में दान की रकम गबन किए जाने की खबर ने देश को झकझोर दिया है. भारत में पवित्र स्थलों की कमी नहीं है, जिनमें कुछ तो हमारी सभ्यता जितने पुराने हैं. लेकिन अयोध्या का राम मंदिर अलग है.

वह ऐसे आंदोलन से जन्मा, जिसने समकालीन भारत को परिभाषित किया और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राजनैतिक परिदृश्य के हाशिए से उठाकर आज की निर्णायक ऊंचाई तक पहुंचाया. इसकी एक और अलग पहचान है—यह किसी राजसी दान या संस्थागत संरक्षण से नहीं बना. 70 एकड़ में फैले भव्य मंदिर परिसर के निर्माण पर खर्च हुए 2,000 करोड़ रुपए पूरी तरह भक्तों के दान से आए.

जिस मुद्रा ने एक राजनीतिक-सांस्कृतिक परियोजना को वास्तविक रूप दिया, वह आस्था थी. हर ईंट, हर स्थापत्य आकृति पर उसकी छाप है. इसके साथ शहरी कायाकल्प भी हुआ, जिसने मध्यकालीन विरासत वाले एक साधारण मंदिर नगर को आधुनिक शहर और प्राइम रियल एस्टेट में बदल दिया. लेकिन यह मंदिर ही है जो उसे तीर्थयात्रियों का बड़ा आकर्षण बनाता है, जिसे खूब सराहे गए अंदाज में 'हिंदुओं का मक्का और वेटिकन' कहा गया.

यह महत्वाकांक्षा 22 जनवरी, 2024 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्राण प्रतिष्ठा करने के तुरंत बाद फल देने लगी. रोजाना औसतन 1,00,000 से 1,50,000 श्रद्धालु आने लगे, जो तिरुपति, स्वर्ण मंदिर और दुनिया के ज्यादातर बड़े तीर्थ स्थलों के बराबर या उनसे ज्यादा है. 2024 में अयोध्या में 16.4 करोड़ लोग आए, जो 2025 में प्रयागराज महाकुंभ के असर से लगभग दोगुना होकर 30 करोड़ तक पहुंच गए. वित्त वर्ष 2025 में मंदिर की हुंडियों में सीधे दान 153 करोड़ रुपए तक पहुंच गया. भारत का जनसांख्यिकीय लाभांश, आस्था में बदलकर एक ही पूजा स्थल में बहता हुआ, सचमुच बेमिसाल है. फिर वही बेहद परिचित भारतीय आदत सामने आई, जैसी अक्सर पूजास्थलों पर दिखती है. कुछ लोग प्रार्थना करने आते हैं, और कुछ शिकार करने.

पहली फुसफुसाहट भीतर से उठी. एक टोली के सदस्य अचानक समृद्धि के संकेत दिखाने लगे. शानदार अपार्टमेंट, महंगी रियल एस्टेट डील, महंगी कारें, प्रीमियम फोन—ऐसी मामूली तनख्वाह पर, जिससे इनमें से किसी की व्याख्या नहीं हो सकती थी. गुटबाजी और अविश्वास से भरे धुंधले माहौल में अंदरूनी व्हिसलब्लोअर खामोशी की दीवार से टकराए.

आखिरकार मामला समाजवादी पार्टी तक पहुंचा और अखिलेश यादव ने बड़े पैमाने पर हेराफेरी के आरोप सार्वजनिक कर दिए. जैसे-जैसे यह पूरा घोटाला उभरा, इसकी रकम के अनुमान बेतहाशा अलग-अलग रहे—7.5 करोड़ रुपए से 200 करोड़ रुपए तक. आखिर में एक स्थानीय भाजपा नेता के पत्र पर कार्रवाई करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय ने विस्तृत रिपोर्ट मांगी. योगी आदित्यनाथ सरकार की ओर से गठित एसआइटी ने जांच शुरू की, और जो तस्वीर सामने आई, वह ब्योरे में गंदी और संकेतों में गंभीर थी.

दान की रकम गिनने के लिए लगाए गए अधीनस्थ कर्मचारी तरह-तरह की हाथ की सफाई का इस्तेमाल करते हुए मनमर्जी से नोटों की गड्डियां चुरा रहे थे. पूरी व्यवस्था समझौते में थी. हुंडियों की चाबियां अनधिकृत हाथों में थीं. सीसीटीवी में ब्लाइंड स्पॉट थे और उनकी फीड 45 दिन बाद अपने आप डिलीट होने के लिए प्रोग्राम की गई थी. यहां तक कि नकदी की मशीन से गिनती और ट्रांसफर के लिए लगाए गए बैंक कर्मचारी भी इसमें शामिल थे. इसके बाद आठ गिरफ्तारियां हुईं.

कुछ ठेके के कर्मचारियों की गिरफ्तारी समाधान नहीं है. यह जवाबदेही की उस प्रक्रिया की शुरुआत भर हो सकती है, जिसे अभी की तुलना में कहीं आगे जाना होगा. असली मुद्दा श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की कार्य संस्कृति से जुड़ा है, जो मंदिर के संचालन के लिए 2020 में बनाया गया सार्वजनिक ट्रस्ट है. कागज पर इसके 15 सदस्य संतुलित प्रतिनिधित्व दिखाते हैं. व्यवहार में इसे एक सामंत जैसे ताकतवर व्यक्ति की जागीर की तरह चलाया गया—विश्व हिंदू परिषद के 80 वर्षीय महासचिव चंपत राय, जो 1990 के दशक से अयोध्या में अहम भूमिका निभाते रहे.

ट्रस्टी अनिल मिश्र और आमंत्रित सदस्य गोपाल राव भी काबिलेगौर हैं, दोनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े हैं. बाकी ज्यादातर ट्रस्टी रोजमर्रा के प्रशासन से दूर हैं, खासकर अयोध्या आंदोलन के चरम दौर के बुजुर्ग चेहरे और देश भर में अपनी-अपनी संस्थाओं में व्यस्त अलग-अलग मठाधिपति. कहा जाता है कि सभी आरोपी इस शक्तिशाली तिकड़ी में से किसी न किसी के करीबी हैं. भले ही दोष की कड़ी ऊपर तक न जाती हो, यह एक बेहद व्यक्ति-केंद्रित व्यवस्था की ओर इशारा करता है, जिसमें विवेकाधिकार की बहुत जगह थी और निगरानी शायद न्यूनतम.

भारत में ऐसे मंदिर हैं, जो बराबर या उससे बड़े पैमाने के कामकाज को अनुकरणीय अनुशासन से संभालते हैं. तिरुपति दान के लिए पूरी तरह सुरक्षित एसओपी के साथ मानक तय करता है. शिरडी और सिद्धिविनायक बड़े पैमाने पर संचालन अनुशासन दिखाते हैं. पुरी का जगन्नाथ मंदिर संपत्ति की पारदर्शिता पर जोर देता है—उसके रत्न भंडार की राजनैतिक रूप से विवादित गिनती में भी सब कुछ सुरक्षित पाया गया.

सोमनाथ की व्यवस्था में ट्रस्टियों को रोज रिपोर्टिंग और अगले दिन सुबह बैंक में जमा करना शामिल है. साझा सूत्र यह है कि हर चरण पर अधिकारियों का समूह निगरानी रखता है, ताकि किसी व्यक्ति की चूक की गुंजाइश खत्म हो. अयोध्या कम से कम वही पाने की हकदार है, जो इन संस्थानों ने बनाया है. ट्रस्ट के पदेन सदस्य नृपेंद्र मिश्र साफ कहते हैं, ''हमें आमूलचूल बदलाव की जरूरत है, जिसमें रोजमर्रा का कामकाज संभालने के लिए पूर्णकालिक सीईओ भी शामिल हो.''

राम मंदिर जनता की असाधारण आस्था के जुटान से बना था. इसने संस्था और उन लाखों लोगों के बीच एक मौन करार बनाया, जिन्होंने अपनी मेहनत की कमाई दी. इसका उल्लंघन सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि उस प्रतीक का अपमान है जिसका मंदिर प्रतिनिधित्व करता है. इसका दूसरा नुक्सान संघ परिवार की प्रतिष्ठा को है, जो ईमानदारी और जनसेवा पर गर्व करता है.

इस हफ्ते अयोध्या से हमारी ग्राउंड रिपोर्ट इस धुंधले घटनाक्रम पर रोशनी डालती है, यह जांचती है कि क्या गलत हुआ, उसे गलत कैसे होने दिया गया और किस सुधार की जरूरत है. संस्था को खुद उस भरोसे के योग्य नींव पर फिर से खड़ा करने की जरूरत है, जो उसे सौंपा गया था.

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