
सावित्रीबाई फुले पुणे विद्यापीठ के मीडिया और संचार अध्ययन विभाग (डीएमसीएस) की स्थापना भविष्य देखने वाली सूझबूझ के साथ की गई थी. 1990 में जब टेलीविजन भारत में बड़ी ताकत के तौर पर अभी उभर ही रहा था, इसरो की स्थापना में मदद करने वाले अंतरिक्ष वैज्ञानिक और प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे प्रो. ई.वी. चिटणिस ने अमेरिका की एक यात्रा के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की क्षमता और संभावना को पहचाना.
उस वक्त विद्यापीठ का जाना-माना रानाडे इंस्टीट्यूट पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए अपने इलाके का सबसे अव्वल ठिकाना था. चिटनिस ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उभरती दुनिया पर केंद्रित अलग विभाग बनाने पर जोर दिया और बाद में डीएमसीएस के रूप में विकसित होने वाले विभाग की आधारशिला रखी.
तीन दशक बाद यह विभाग उस उद्योग के साथ लगातार विकसित हो रहा है जिसकी खातिर यह बनाया गया था. इसके मीडिया और संचार अध्ययन के एमएससी प्रोग्राम में हर साल 50 छात्र दाखिला लेते हैं, और यह मीडिया रिसर्च और मीडिया प्रोडक्शन में स्पेशलाइजेशन की पेशकश करता है. रिसर्च की धारा में कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन, ब्रांड मैनेजमेंट और पब्लिक रिलेशंस सरीखे क्षेत्र आते हैं. विभाग भारतीय फिल्म अध्ययन में पोस्टग्रेजुएट डिप्लोमा का प्रोग्राम भी चलाता है और इसमें करीब 14 डॉक्टरल स्कॉलर हैं.
विभाग प्रमुख डॉ. माधवी रेड्डी के मुताबिक, इसकी कक्षाओं में अंतरराष्ट्रीय छात्रों समेत अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए छात्र एक साथ बैठते हैं. इसके बढ़ते कद की झलक रैंकिंग से भी मिलती है, जिसमें यह 2022 की नंबर चार की रैंकिंग से बढ़कर 2026 में नंबर दो पर आ गया और अपनी श्रेणी में सबसे ज्यादा सुधार करने वाला कॉलेज बन गया.

विभाग को यह ताजा बढ़त उद्योग के लिए खुद को प्रासंगिक बनाने पर जोर देने से मिली. रेड्डी का कहना है कि मीडिया और मनोरंजन क्षेत्रों में काम कर रहे पूर्व छात्रों से मिले सुझावों के बाद स्क्रिप्टराइटिंग और इंस्ट्रक्शनल डिजाइन सरीखे क्षेत्रों पर ज्यादा जोर दिया गया. ओटीटी प्लेटफॉर्म की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए स्क्रिप्टराइटिंग के अंक बढ़ाए गए, जबकि वेब पेज विकसित करने का तकनीकी और रचनात्मक पहलू वाला इंस्ट्रक्शनल डिजाइन विद्यार्थियों को डिजिटल कंटेंट प्रोजेक्ट में अवसर खोजने में मदद कर रहा है.
बुनियादी ढांचे को भी बहुत मजबूत किया जा रहा है. अत्याधुनिक स्टूडियो बनाने के लिए विभाग को राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान के तहत तीन करोड़ रुपए मिले हैं. छुट्टियों के दौरान यह स्टूडियो मराठी फिल्म उद्योग को किराए पर दिया जाएगा, जो विभाग के लिए राजस्व जुटाने का नया माध्यम भी बनेगा. रेड्डी का कहना है कि इन फिल्म परियोजनाओं में इंटर्नशिप के जरिए छात्रों को बेशकीमती अनुभव भी मिलेगा. विभाग नई टेक्नोलॉजी भी अपना रहा है.
एक डॉक्टरल शोधकर्ता ने ऐसा एआइ-समर्थ टूल विकसित किया है जो भर्ती व्यवस्थाओं के अनुरूप अपने सीवी को अच्छे से अच्छा बनाने में छात्रों की मदद करेगा. इसके साथ ही इंटरव्यू में उनकी कामयाबी के अवसर बढ़ाने के लिए वॉइस मॉड्युलेशन पर अपनी तरह की पहली कार्यशालाएं भी आयोजित की जा रही हैं.
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