scorecardresearch
डार्क मोड

इंडिया टुडे बेस्ट कॉलेज सर्वे 2026: निर्विवाद रूप से शीर्ष पर

चिकित्सा में एआइ और डिजिटल तकनीक के बढ़ते दखल के बीच नई दिल्ली के एम्स ने आविष्कारों के साथ इलाज की गुणवत्ता का मेल बनाया ताकि डॉक्टर बनाने का कड़ा पैमाना रहे बरकरार

(एम्स) नई दिल्ली में डॉक्टरों के साथ निदेशक, डॉ. निखिल टंडन
अपडेटेड 6 जुलाई , 2026

डॉक्टर बनने का सपना देखने वाली पीढ़ियों के लिए नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स-ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज) भारत में चिकित्सा शिक्षा के शिखर पर रहा है. लेकिन इसकी असली और स्थायी ताकत सिर्फ इसके नाम में नहीं, बल्कि खुद को समय के साथ बदलने की इसकी क्षमता में है. आज जब एआइ, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल तकनीकें स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल रही हैं, एम्स भी नए तौर-तरीकों को अपना रहा है. लेकिन वह अपने बुनियादी सिद्धांतों से डिगा नहीं, जो इसकी पहचान हैं: बेहतरीन क्लिनिकल अनुभव और मरीजों की देखभाल को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखना.

एम्स के किसी भी पूर्व छात्र से पूछें कि इस संस्थान को क्या अलग बनाता है, तो अमूमन एक ही जवाब मिलता है: यहां आने वाले मरीज. देश में सबसे ज्यादा मरीजों का इलाज करने वाले संस्थानों में से एक होने के कारण यहां छात्रों और रेजिडेंट डॉक्टरों को बीमारियों, क्लिनिकल स्थितियों और इलाज के तरीकों का असाधारण अनुभव मिलता है. यहां न सिर्फ बड़ी संख्या में मरीज आते हैं बल्कि कई तरह के जटिल चिकित्सा मामलों का क्लिनिकल अनुभव मिलता है. इस तरह का अनुभव शायद ही कोई दूसरा संस्थान दे पाए. सीखने का सफर बेहद कठिन होता है और दबाव भी बहुत ज्यादा रहता है, हालांकि यही वह वजह भी है जिसके कारण एम्स के पासआउट डॉक्टरों की दुनियाभर में सबसे ज्यादा मांग होती है.

सबसे बड़ी बात, यह संस्थान स्वास्थ्य सेवा के बदलते दौर के साथ खुद को ढाल रहा है, और अब बदलती तकनीक के साथ पूरी तरह कदमताल करता दिखता है. एआइ-आधारित जांच, अनुमान के लिए एनालिटिक्स और डिजिटल फैसले लेने में मददगार उपकरण आज के दौर की चिकित्सा पद्धति का हिस्सा बनते जा रहे हैं. और एम्स यह पक्का कर रहा है कि छात्र इन उभरती तकनीकों के साथ काम करने के लिए पूरी तरह तैयार हों.

हालांकि, संस्थान के निदेशक और जाने-माने एंडोक्राइनोलॉजिस्ट डॉ. निखिल टंडन कहते हैं कि तकनीक का इस्तेमाल क्लिनिकल समझ मजबूत करने पर केंद्रित है, न कि उसकी जगह लेने पर. वे कहते हैं, ''एआइ निस्संदेह डॉक्टरों के लिए महत्वपूर्ण उपकरण बन जाएगा लेकिन इलाज करना आखिरकार एक मानवीय पेशा ही रहेगा. सबसे अच्छे डॉक्टर वही होंगे जो एआइ पर निर्भरता के बिना इसका सूझबूझ से इस्तेमाल करना जानते होंगे.''

रिसर्च एम्स में हासिल अनुभव का एक और मजबूत स्तंभ है. इस वर्ष के शुरू में यह क्यूएस ग्लोबल रैंकिंग में ऊपर चढ़ा है, जो न केवल इसकी क्लिनिकल उत्कृष्टता दर्शाता है, बल्कि इसके वैज्ञानिक योगदान और रिसर्च के प्रभाव को मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान का भी प्रमाण है. छात्रों को शुरुआती दौर से ही रिसर्च में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है—चाहे फिर क्लिनिकल स्टडीज हो, ट्रांसलेशनल मेडिसिन हो या पब्लिक हेल्थ और बायोमेडिकल इनोवेशन. इससे वैज्ञानिक खोजों और मरीजों की देखभाल के बीच की दूरी पाटने में मदद मिलती है.

यही नहीं, संस्थान का ध्यान सामुदायिक चिकित्सा पर भी उतना ही बना हुआ है. छात्रों को न केवल जटिल और उन्नत स्वास्थ्य सेवाओं (टर्शरी हेल्थकेयर) की चुनौतियों का पता चलता है, बल्कि वे उन सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय कारकों को भी समझ पाते हैं जो सेहत पर खासा असर डालते हैं. डॉ. टंडन कहते हैं, ''भारत की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों को केवल अस्पताल की दीवारों के भीतर रहकर नहीं समझा जा सकता. सामुदायिक चिकित्सा भविष्य के डॉक्टरों को उन हालात से रूबरू कराती है जिनमें मरीज रहते हैं.''

आगे चलकर डॉक्टर बनने वाले छात्रों को डॉ. टंडन एक महत्वपूर्ण संदेश देते हैं. उनका कहना है, ''चिकित्सा क्षेत्र को कभी भी सिर्फ इसलिए नहीं चुना जाना चाहिए क्योंकि यह एक प्रतिष्ठित पेशा है या सुरक्षित है. यह एक बेहद कठिन पेशा है जिसमें समर्पण, विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता और सही मायने में रुचि होना आवश्यक है. अगर इसके प्रति जुनून नहीं है, तो काम का दबाव आपको परेशान कर सकता है. और जो लोग वास्तव में सेवा करना चाहते हैं, उनके लिए इससे ज्यादा संतुष्टि देने वाला कोई और काम हो ही नहीं सकता है.'' यही वह सोच है जो देश के सबसे होनहार युवाओं को एम्स की ओर खींचती है.

गुरु वाणी

''एम्स, नई दिल्ली में कम्युनिटी मेडिसिन, रिसर्च और मरीजों की देखभाल को एक साथ जोड़ा गया है. इस तरह हम ऐसे संवेदनशील डॉक्टर तैयार कर रहे हैं जो मरीजों के बेहतर इलाज के लिए विज्ञान, सामाजिक समझ और उभरती तकनीकों का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करते हैं.''
डॉ. निखिल टंडन, निदेशक, एम्स, नई दिल्ली

छात्र की राय

''एम्स में कई तरह के दुर्लभ और जटिल मामलों को देखने से मिला गहरा अनुभव न केवल क्लिनिकल सोच को धार देता है, बल्कि दबाव में सही फैसला लेना भी सिखाता है. इससे मिला आत्मविश्वास छात्रों को इलाज से जुड़ी असल चुनौतियों का सामना करने में सक्षम डॉक्टर    बनाता है.''
ध्रुव आडवाणी, एमबीबीएस, थर्ड ईयर

ADVERTISEMENT
Advertisement