
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के इस दौर में बेंगलूरू की क्राइस्ट (डीम्ड टु बी यूनिवर्सिटी) के बीसीए कोर्स ने समय के साथ तेजी से बदलते जाने को ही अपना मूल मंत्र बना लिया है. आज सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कंप्यूटर के बुनियादी सिद्धांत भी सिखाए जाएं और साथ ही नई टेक्नोलॉजी से भी अपडेट रखा जाए.
पहले सिलेबस हर तीन वर्ष में बदलता था लेकिन अब जैसा कि स्कूल ऑफ साइंसेज की एसोसिएट डीन दीप्ति दास कहती हैं, ''हम हर साल सिलेबस में बदलाव करेंगे, खासकर फाइनल ईयर की पढ़ाई के दौरान.’’

अब एआइ की मदद से बिना कोड लिखे भी ऐप बनाए जा सकते हैं, लेकिन दीप्ति का मानना है कि लॉजिकल और क्रिटिकल थिंकिंग को विकसित करने के लिए कोडिंग सीखना आज भी बेहद जरूरी है. यही वजह है कि यहां लैब में छात्रों का टेस्ट तीन चरणों में होता है. पहले चरण में छात्रों को बिना इंटरनेट के कुछ प्रोग्राम बनाने होते हैं.
दूसरे चरण में वे इंटरनेट इस्तेमाल तो कर सकते हैं लेकिन जेनरेटिव एआइ का प्रयोग बिल्कुल नहीं. तीसरे चरण में उन्हें हर तरह की तकनीक इस्तेमाल करने की पूरी छूट होती है. कंप्यूटर साइंस विभाग की प्रमुख रूपाली सुनील वाघ बताती हैं कि इसका मकसद टेस्ट को थोड़ा चुनौतीपूर्ण बनाना और साथ ही विद्यार्थियों को जिम्मेदारी के साथ तकनीक का इस्तेमाल करना सिखाना है.
संस्थान अपने पूर्व छात्रों के नेटवर्क का भी पूरा फायदा उठा रहा है, ताकि छात्र इंडस्ट्री के मौजूदा माहौल के बारे में जान सकें. पिछले वर्ष बीसीए के पूर्व छात्रों ने हर सेमेस्टर के पांचों कोर्स का कुछ हिस्सा खुद भी पढ़ाया. क्राइस्ट यूनिवर्सिटी के यशवंतपुर कैंपस में बीसीए के विभागाध्यक्ष डॉ. विनय एम. बताते हैं कि संस्थान कंपनियों के साथ मिलकर काम कर रहा है ताकि उनके कर्मचारियों को एआइ वर्कक्रलो की ट्रेनिंग दी जा सके.
नए अकादमिक सत्र में छात्रों की रिसर्च स्किल को मजबूत करने पर पूरा फोकस रहेगा. क्राइस्ट यूनिवर्सिटी में ग्रेजुएशन के छात्रों के लिए रिसर्च पेपर पेश करना अनिवार्य है. अब कोशिश यह है कि छात्र अपनी रिसर्च के आधार पर असल प्रोडक्ट या उनके प्रोटोटाइप तैयार करें.
वाघ कहती हैं, ''हम प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही विभिन्न इंडस्ट्री एक्सपर्ट को मेंटॉर के तौर पर जोड़ने की योजना बना रहे हैं. उनका मार्गदर्शन छात्रों को सही दिशा दिखाएगा जिससे उनका प्रोजेक्ट आगे चलकर एक कारगर प्रोडक्ट बन सकेगा.’’ स्कूल ऑफ साइंसेज के डीन डॉ. टी.वी. जोसेफ बताते हैं कि यूनिवर्सिटी ने रिसर्च को बढ़ावा देने और छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिए 19 करोड़ रुपए का बजट तय किया है.
जून से बीसीए में एक डुअल-डिग्री का विकल्प भी शुरू हो रहा है, जो जर्मनी की टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ अप्लाइड साइंसेज वुर्जबर्ग-श्वैनफर्ट (टीएचडब्ल्यूएस) के सहयोग से चलाया जाएगा. इसके तहत छात्र चौथे साल में जर्मनी जाकर पढ़ सकते हैं. इससे उन्हें क्राइस्ट यूनिवर्सिटी की बीसीए डिग्री के साथ जर्मनी की यूनिवर्सिटी से सॉफ्टवेयर इंजीनिंयरिंग में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (बीई) की डिग्री भी मिलेगी.
वाघ के मुताबिक, 2025-26 के बैच में सभी 125 छात्रों ने इंटर्नशिप की, जिनमें से 90’ पेड इंटर्नशिप थीं. बैच के 70’ से ज्यादा छात्रों को कंपनियों ने नौकरी पर रख लिया और अधिकतम पैकेज 20 लाख रुपए सालाना तक गया. बाकी छात्रों ने एक वर्षीय बीसीए ऑनर्स कोर्स को चुना है, जो इसी जून से शुरू हुआ है.
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