- अरुण पुरी
भारत के कृषि क्षेत्र में गहरा असंतुलन समस्या पैदा कर रहा है. चावल और गेहूं हमारे पास बहुतायत में है. जनवरी में हमने धान पैदा करने में दुनिया में पहला स्थान हासिल किया. सरकारी गोदाम लक्ष्य से कई गुना ज्यादा भरे पड़े हैं. 80 करोड़ लोगों के लिए खाद्य कल्याण कार्यक्रम चलाने के बाद भी हमारे पास इतना अनाज बचता है कि हम शीर्ष निर्यातकों में शामिल हैं और कुछ हिस्सा एथेनॉल के लिए भी देते हैं. लेकिन इस प्रचुरता का दूसरा पहलू भी है.
दालें, जो भारत के लिए मुख्य प्रोटीन स्रोत हैं और इनकी मांग आपूर्ति से ज्यादा है, हम अपनी जरूरत का 15-20 फीसद आयात करते हैं. खाने के तेल में आयात पर निर्भरता चौंकाने वाले 56 फीसद तक है. उर्वरक के आंकड़े भी उतने ही परेशान करने वाले हैं. हम जरूरत का 21 फीसद यूरिया और दूसरे फसल पोषक तत्वों का 60 फीसद आयात करते हैं.
भारत यूरिया बनाता जरूर है लेकिन दिक्कत यह है कि इसके 85-90 फीसद कच्चे माल और 80 फीसद लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) फीडस्टॉक का आयात होता है. युद्ध से पहले इसका तीन-चौथाई हिस्सा खाड़ी से आता था.
यह संघर्ष भले खत्म हो गया हो या शायद फिर से शुरू हो जाए लेकिन इसने भारत के सामने बुनियादी सवाल खड़े कर दिए हैं. अगर हमारी खेती ऐसी अनिश्चित घटनाओं के रहमोकरम पर हो तो क्या हम खाद्य आत्मनिर्भरता का दावा कर सकते हैं? और ज्यादा ठोस सवाल है कि यह निर्भरता अर्थव्यवस्था पर क्या असर डालती है? हम सचमुच अपनी विदेशी मुद्रा खा रहे हैं.
वित्त वर्ष 2026 में खाद्य तेल, दालों और एलएनजी समेत उर्वरक का कुल आयात बिल 51 अरब डॉलर (4.5 लाख करोड़ रुपए) रहा. यह हमारे आयात बिल का 5.2 फीसद था. वित्त वर्ष 2027 में इसके बढ़कर 56 अरब डॉलर (5.3 लाख करोड़ रुपए) होने की संभावना है. पहली नजर में ये खर्च न टालने वाले लग सकते हैं. लेकिन हमारी कवर स्टोरी दिखाती है कि इस बोझ का बड़ा हिस्सा दशकों में लिए गए नीतिगत फैसलों का नतीजा है.
आम दिनों में नजर न आने वाले संकट को ईरान युद्ध ने उजागर कर दिया. 27 फरवरी को युद्ध से ठीक पहले भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 728.49 अरब डॉलर (69 लाख करोड़ रुपए) के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर था. यह 11 महीने के आयात खर्च के लिए काफी था. फिर संघर्ष ने हिसाब गड़बड़ा दिया. ऊर्जा बिल उछल गया. माल ढुलाई की लागत भी बढ़ी. घबराए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने मार्च से अब तक 30 अरब डॉलर (2.85 लाख करोड़ रुपए) निकाल लिए और रुपया फिसलकर 96 रुपए प्रति डॉलर पर आ गया.
चालू खाते का घाटा, जो संभालने लायक दिख रहा था, दबाव में आ गया. वित्त वर्ष 2026 का अंत 30.8 अरब डॉलर (2.9 लाख करोड़ रुपए) के भुगतान संतुलन घाटे के साथ हुआ. अप्रैल में ही एक और 6.6 अरब डॉलर (62,700 करोड़ रुपए) का घाटा आ गया. हर मोर्चे पर भारत को वे डॉलर भंडार खर्च करने पड़े, जिन्हें उसने वर्षों में जोड़ा था. रुपए के ऐतिहासिक निचले स्तर से दर्द और बढ़ गया. इसने दिखाया कि हमारे कृषि आयात में फिजूलखर्ची किस तरह पहले से बैठी हुई है. पीएम नरेंद्र मोदी ने 10 मई को इस ओर इशारा करते हुए लोगों से मितव्ययिता की अपील की. उन्होंने खाद्य तेल खपत में 10 फीसद कटौती को सोना न खरीदने और विदेश यात्रा छोड़ने की ही श्रेणी में रखा.
एक औसत भारतीय साल में 24 किलो खाने का तेल इस्तेमाल करता है, जो चिकित्सकीय रूप से सुझाई गई सीमा से दोगुना है. उर्वरक की कहानी भी आंखें खोलने वाली है. साल 2018 से यूरिया की एक बोरी 242 रुपए में मिलती है. इसे बनाने में 10 गुना ज्यादा लागत आती है. फसल के दूसरे पोषक तत्वों में भी ऐसी ही असामान्य गड़बड़ी दिखती है. इस 90 फीसद कमी का बोझ सरकारी खजाना उठाता है और एक जटिल व्यवस्था के जरिए कंपनियों को भुगतान करता है.
वित्त वर्ष 2026 में इसकी लागत 2.11 लाख करोड़ रुपए रही. इस बीच, कृत्रिम रूप से सस्ता यूरिया खेती की जमीन को बंजर बना रहा है क्योंकि किसान धान और गेहूं के आदी हो चुके हैं क्योंकि यही वे दो फसलें हैं जिनकी न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर पक्की खरीद होती है. दलहन और तिलहन, जो आयात निर्भरता घटा सकती हैं, जोखिम भरी फसलें बनी रहती हैं और किसान समझदारी से उनसे दूरी बनाए रखते हैं. यह नीति खुद को ही खा रही है.
लेकिन इसके समाधान मौजूद हैं और यह कोई रहस्य नहीं हैं. उर्वरक सुधार की शुरुआत घरेलू उत्पादन बढ़ाकर करें: आवश्यक वस्तु की तरह कोयला आधारित यूरिया को बढ़ावा दें जैसा कि ओडिशा के बेहद देरी से चल रहे तालचेर प्लांट में हो रहा है; गैस आधारित यूरिया प्लांटों के हमारे बेड़े का विस्तार और आधुनिकीकरण करें. आयात में विविधता लाई जाए: तैयार यूरिया के लिए रूस, मोरक्को, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा का रुख किया जाए. एलएनजी के मामले में भू-राजनीति को समझदारी से साधा जाए. सबसे सस्ती एलएनजी ठीक बगल में ईरान में है.
जैविक पोषक तत्वों के लिए पीएम-प्रणाम (पीआरएएनएएम) को सही समय पर दिए गए बढ़ावे से इस खरीफ सीजन में बिक्री 3.5 गुना बढ़कर 11 लाख टन पहुंचने में मदद मिली है. इस रफ्तार को सिर्फ एक अच्छा कार्यक्रम मानकर छोड़ने के बजाए अधिकतम बढ़ाया जाना चाहिए. दालों के मामले में प्रोटीन सुरक्षा को 'हरित क्रांति 2.0' के लिए जरूरी बनाएं. बेहतर बीजों को प्रयोगशाला से बाजार तक लाने की राह की रुकावटें दूर की जाएं.
इंटरक्रॉपिंग के जरिए रकबा बढ़ाया जाए, जिसमें नई जमीन की जरूरत नहीं पड़ती और सही जिला स्तर की निगरानी से लाखों हेक्टेयर जमीन का उपयोग खुल सकता है. उर्वरक सब्सिडी ढांचे में भी सुधार किया जाए ताकि लक्षित सहायता सीधा छोटे, सीमांत और बटाईदार किसानों तक पहुंचे, न कि ऐसी लीकेज वाली व्यवस्था में गायब हो जाए जो सबकी अधूरी सेवा करती है.
उर्वरक सुधार राजनैतिक रूप से जोखिम भरा है. एमएसपी समर्थन को दलहन और तिलहन की ओर मोड़ने पर निहित स्वार्थों का विरोध होगा. ईरान युद्ध ने दिखा दिया है कि भोजन और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े बुनियादी सवालों को अनिश्चित समय तक टालने के भारी-भरकम नुक्सान भरा नतीजा क्या होता है. एक और संकट आएगा. हमेशा आता है. सवाल यह है कि भारत इस संकट का उपयोग वास्तविक मजबूती बनाने में करता है या फिर सवालों के दोहराव के लिए अगले झटके का इंतजार करता है.
साठ साल पहले भारत अपने आखिरी बड़े अकाल से बाहर निकला था. हरित क्रांति ने अपना काम किया. अब उसकी नीतिगत विरासत उसी खाद्य सुरक्षा को कमजोर कर रही है, जिसे उसने खड़ा किया था. मोदी सरकार के लिए सुधार आगे बढ़ाने का इससे बेहतर समय नहीं हो सकता. जमीन तैयार है. अगर ऐसा हुआ तो देश भविष्य में भरपूर समृद्ध फसल काटेगा और उन्हें इसके लिए याद रखा जाएगा.

