36वीं वर्षगांठः दिग्गज कारोबारी
पंकज पटेल, 69 वर्ष,
अहमदाबाद, गुजरात
कंपनीः जायडस लाइफसाइंसेज
कुल संपत्तिः 34,900 करोड़ रु.
सैर करने और पढ़ने का शौक
पंकज को कुदरती सौंदर्य वाली जगहों पर समय बिताना पसंद है. उन्हें पढ़ने का शौक है. पहले वे फिक्शन ज्यादा पढ़ते थे पर अब ज्यादातर कारोबार से जुड़ी किताबें और साहित्य पढ़ते हैं
कोरोना महामारी के समय पूरी दुनिया में एकाएक हाइड्राक्लोरोक्विन टैबलेट की मांग बढ़ गई. उस वक्त केंद्र सरकार ने जायडस से संपर्क किया और प्रोडक्शन तेज करने का आग्रह किया. कंपनी के चेयरमैन पंकज पटेल ने सरकार से कहा कि वे प्रति टैबलेट 5 रुपए के मौजूदा रेट से भी कम, 3 रुपए की दर से दवा उपलब्ध कराएंगे. जबकि उस समय स्थिति यह थी कि जायडस जो भी दाम मांगता, दुनिया भर में लोग उसे खरीदने को तैयार थे.
दाम इतना कम क्यों कर दिया? पंकज पटेल बताते हैं, ''इस कंपनी को मेरे पिता जी ने अपने बिजनेस पार्टनर के साथ मिलकर 1952 में शुरू किया था. वे कम से कम कीमत पर लोगों को दवा उपलब्ध कराना चाहते थे ताकि लोगों को इलाज में कम तकलीफ हो.
कोरोना के वक्त हमें लगा कि यह पैसे कमाने का नहीं बल्कि मानवता की सेवा करने का अवसर है. सिर्फ यही दवा नहीं बल्कि रेमडेसिविर इंजेक्शन हमने सिर्फ 899 रुपए में उपलब्ध कराया.’’ जबकि दूसरी कंपनियां 3,800 से लेकर 5,800 रुपए में यह इंजेक्शन बेच रही थीं.
शुरुआत के समय यानी 1952 में कंपनी का नाम कैडिला लैबोरेटरीज था. लेकिन 1995 में कंपनी में बंटवारा हुआ और पटेल परिवार ने इसे कैडिला हेल्थकेयर के नाम से चलाया. 2022 में इसका नाम जायडस लाइफसाइंसेज लिमिटेड रखा गया. 1995 में जब कंपनी का बंटवारा हुआ तो पंकज पटेल ने नई कंपनी में अपने सभी सहयोगियों को स्पष्ट कर दिया कि इनोवेशन पर ही काम करना है. लक्ष्य यह था: ''हमें वैसी दवाएं बनानी हैं, जो दुनिया में पहले से नहीं हैं.’’
इसका असर भी दिखा. फैटी लीवर के लिए दुनिया की पहली दवा सारोग्लिटाजार, जायडस ने बनाई. किडनी की पुरानी बीमारी से ग्रस्त एनीमिक लोगों के लिए भारत में पहली मॉडर्न दवा देसीदुस्टैट भी इसी कंपनी ने बनाई. अलग—अलग बीमारियों के लिए पांच और ऐसी दवाएं हैं जिन्हें जायडस ने दुनिया में पहली बार बनाने का कारनामा कर दिखाया है.
कोराना वायरस के खिलाफ पहली डीएनए आधारित वैक्सीन बनाने का श्रेय भी जायडस को ही जाता है. पंकज पटेल बताते हैं कि वे अभी ऐसी और कई दवाओं पर काम कर रहे हैं जो दुनिया में पहली बार सामने आएंगी.
इनोवेशन पर कंपनी का इतना जोर क्यों? पंकज पटेल इसका जवाब देते हैं, ''सब मानते थे कि भारत में इनोवेशन मुमकिन नहीं है. मेरा मानना था कि संसाधन और विश्वास से सब मुमकिन है. कंपनी के विभाजन के बाद हमने अहमदाबाद में एक इनोवेशन को ही समर्पित सेंटर बनाया. देश भर से चुनिंदा साइंटिस्ट लेकर आए.
व्यक्तिगत तौर पर मैंने रिसर्च पर ध्यान दिया. प्रोजेक्ट चुनते समय हमने देखा कि जिस बीमारी के लिए कोई दवा या सुविधा उपलब्ध नहीं है, उस पर काम हो. मेडिसिन रिसर्च में 10 में से एक ही प्रोजेक्ट सफल होता है. मैं नाकामी को स्वीकार करता हूं. इससे आगे का रास्ता खुलता है.’’
जायडस ने जब डीएनए आधारित कोरोना वैक्सीन पर काम करना शुरू किया तो इसे लेकर तरह-तरह की शंकाएं जाहिर की गईं. इस बारे में पंकज कहते हैं, ''हमने वैक्सीन बनाने की सोची. सब सवाल उठा रहे थे कि इसमें काफी खर्च है और जोखिम बहुत है.
हमें लगा कि पैसे तो हमने कमाए ही हैं लेकिन वैक्सीन अभी हमारे देश की जरूरत है. भारत की जरूरतों को पूरा करने की जिम्मेदारी भारत की कंपनी नहीं लेगी तो और कौन लेगा? इसलिए हमने जनवरी, 2020 में ही डीएनए आधारित वैक्सीन बनाने का निर्णय लिया.
हमारी सोच यह थी कि कोरोना से पहले सार्स और मर्स वाइरस के लिए डीएनए वैक्सीन ही बनी थी, इसलिए हमने डीएनए आधारित वैक्सीन पर शोध करने का निर्णय लिया. डीएनए आधारित वैक्सीन में साइड इफेक्ट वाला खतरा भी नहीं रहता. हमने रिकॉर्ड समय में यह वैक्सीन तैयार की.’’
इनोवेशन के बारे में वे कहते हैं, ''इससे भारत के फार्मा सेक्टर में एक आत्मविश्वास आया कि हम नई चीजों पर काम कर सकते हैं. हमें हर समस्या के लिए पश्चिम पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं.’’
जायडस की कुछ दवाओं के नामकरण की भी अपनी एक रोचक कहानी है. पंकज बताते हैं, ''हमने दवाओं के नामकरण में भी भारतीयता का पुट रखा. सारोग्लिटाजार को ही लें. इसमें गुजराती शब्द सारो है, जिसका मतलब है अच्छा. इसी तरह से देसोदुस्टैट में हमने देस शब्द का इस्तेमाल किया है. देसी होना शर्म की नहीं, गर्व की बात है.’’
जायडस आज देश में नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी काफी दवाओं का निर्यात कर रही है. अमेरिका में जेनरिक दवा बेचने के मामले में जायडस चौथे स्थान पर है और कंपनी की 300 से ज्यादा दवाएं इस बाजार में हैं.

