वे 'वोक’ या जागृत पीढ़ी हैं. राजनैतिक और सांस्कृतिक रूप से अपने पूर्ववर्तियों से अधिक जागरूक लेकिन संक्षेप में अपनी बात कहने वाले. वे इसे 'सोशल’ होना कहते हैं—ट्विटर और व्हाट्सऐप किस्म का सोशल होना. उनमें से कइयों ने एक दशक से भी कम वक्त में जैसी दौलत बनाई है, वह इकट्ठा करने में उनके माता-पिता को एक जिंदगी या उससे भी ज्यादा लगा होता.
उनकी कामयाबी में अब समय कोई कारक नहीं रहा. न ही भूगोल या इतिहास. आइंस्टीन अगर जीवित होते तो अपना मशहूर समीकरण बदलने को मजबूर हो जाते, क्योंकि इस पीढ़ी ने बिल्कुल शून्य से अपनी ऊर्जा के बल पर कहीं अधिक द्रव्यमान उत्पन्न किया है और समकोण प्रकाश की गति से कहीं ज्यादा तेजी से किया है.
समाजशास्त्री 20 से 40 के बीच की इस पीढ़ी को 'मिलेनियल्स’ या सहस्त्राब्दि की पीढ़ी कहते हैं. उन्होंने उस 'लॉस्ट जेनरेशन’ (दूसरे विश्व युद्ध के तत्काल बाद जन्मे 'बेबी बूमर’ से अलग) या ओझल पीढ़ी की जगह ली है, जिसका 15 दिसंबर 1975 को इंडिया टुडे पत्रिका का प्रकाशन शुरू होते समय देश में दबदबा था.
उन्हें जेनरेशन एक्स भी कहा जाता था और उन्होंने आपातकाल की छाया में होश संभाला. नौकरी के अवसर तब मोटे तौर पर सार्वजनिक क्षेत्र में ही थे और केंद्र सरकार का दमनकारी हाथ हर जगह देखा जा सकता था. आप टेलीफोन कनेक्शन लेना चाहें या कार खरीदना, वाकई हर चीज के लिए कतारें और प्रतीक्षा सूचियां थीं.
दूसरी तरफ सहस्त्राब्दि की पीढ़ी सुधारों और कुछ अधिक समृद्ध के युग में पली-बढ़ी. उनमें सबसे बड़े तब 10 साल के थे जब भारतीय अर्थव्यवस्था लाइसेंस राज की बेड़ियों से मुक्त हुई. भारत ने तीन फीसद की हिंदू वृद्धि दर को तिलांजलि दे दी और बहुत तेज रफ्तार से बढ़ा. मध्य वर्ग खिलने और फलने-फूले लगा और निजी उद्यमशीलता अपने पैरों पर खड़ी हुई.
क्रमिक विकास (इवोलूशन) पर हार्वर्ड के फिजीशियन हार्वे वी. फाइनबर्ग ने कभी कहा था कि अगली पीढ़ी को जीनोम सौंपना और पीढ़ी दर पीढ़ी अपने को ढालना और जीवित रहना ही क्रमिक विकास है. उन्होंने लिखा था, ''विकासवादी नजरिये से आप और मैं बूस्टर रॉकेट की तरह हैं, जिन्हें जेनेटिक पेलोड अगली कक्षा में भेजने और फिर समुद्र में गिर जाने के लिए रचा गया है.’’
हमने जिस अगली पीढ़ी को जन्म दिया, उसने न केवल अपने को तराशा और जीवित रही बल्कि फली-फूली. इन दिनों भारत की क्रिकेट विश्व कप की पहली जीत पर बनी बायोपिक ’83 खासी चर्चा में है. ऐसे में उस जांबाज टीम के कप्तान कपिल देव को उद्धृत करना उचित होगा, ''अगली पीढ़ी हमेशा पिछली से बेहतर होती है और होगी.
ऐसा नहीं होता, तो दुनिया आगे नहीं बढ़ेगी.’’ तो दुनिया आगे बढ़ रही है बल्कि हरियाणा के इस धुरंधर ने अपने पूरे करियर में जिस रफ्तार से गेंदें फेंकी होंगी, उसके कहीं ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ रही है.
उनके माता-पिता ने अगर फैक्ट्रियों में काम करना सिखाया था तो लॉस्ट या ओझल पीढ़ी ने तय किया कि उनके बच्चे को अपनी रचनात्मक खोजने और निखारने की पूरी छूट होगी. मिलेनियल्स की प्रगति के आरपीएम को जिस चीज ने बहुत तेज कर दिया, वह था इंटरनेट का विस्फोट और खासकर लोगों के संवाद और बातचीत के मामले में टेक्नोलॉजी की तेज रफ्तार तरक्की.
इसने सोशल मीडिया को जन्म दिया, जिसने किसी भी वक्त कहीं भी मनोरंजन के साथ लगातार कनेक्टिविटी में समर्थ बनाया. यह ऐसी तोप थी जिससे सहस्त्राब्दि की पीढ़ी ने एक धमाके में इतिहास की हिचकिचाहटों की धज्जियां उड़ा दीं और बेमिसाल कामयाबी का रास्ता तराशा. जैसा कि जूम वीडियो कम्यूनिकेशंस के सीईओ और संस्थापक एरिक युआन कहते हैं, ''मिलेनियल्स इस अहसास के साथ बड़े हुए कि वे दफ्तर जाए बगैर भी काम करवा सकते हैं.’’
फिर भी ऐसा नहीं है कि सहस्त्राब्दि की पीढ़ी के लिए सब कुछ बिल्कुल आसान ही रहा हो. 9/11 ने जब दुनिया को झकझोर दिया, वे कच्ची उम्र में थे. भारत में वे तीन युद्धों—करगिल का टकराव, अफगानिस्तान और उसके बाद इराक की जंग—की छाया में जिए. उन्होंने 2008 के मुंबई आतंकी हमलों, वैश्विक आर्थिक संकट और उसके बाद की मंदी का डर महसूस किया.
वे भी उतनी ही उथल-पुथल और मुश्किलों भरे वक्त में रहे, जितना उनसे पहले की पीढ़ियां रही थीं. मगर उनमें ऐसी अनुकरणीय मिसालें भी थीं जिन्होंने दिखाया कि इस सबकी जकड़न से कैसे मुक्त हों. उनके रोल मॉडलों में इंफोसिस के एन.आर. नारायणमूर्ति, स्पेस एक्स के इलॉन मस्क और अमेजन के जैफ बेजोस थे, जिन्होंने दिखाया कि विरासत में हासिल किए बगैर भी तेजी से दौलत कैसे बनाई और कायम रखी जा सकती है.
संचार प्रौद्योगिकियों का मिलन भारत के लिए भाग्यशाली रहा. देश की एक-तिहाई आबादी के 20 से 44 के बीच होने के साथ युवा देश होने के जनसांख्यिकी लाभांश का जबरदस्त फायदा मिला. राजनीति हो या कारोबार, विज्ञान, खेल या कलाएं, सहस्त्राब्दि की पीढ़ी ने अपनी बलबलाती ऊर्जा और कर-सकते-हैं के जज्बे के साथ खासा फर्क पैदा किया है.
उद्योग जगत में यह खास तौर पर देखा जा सकता है, जहां युवा उद्यमियों ने अपनी कंपनियों को यूनिकॉर्न या अरब डॉलर से ज्यादा मूल्य वाली कंपनियों में विकसित किया और न केवल भारत में ही जमे रहकर बल्कि सारी दुनिया में अपना डंका बजाते हुए ऐसा किया. 2021 में कोविड के प्रकोप के बीच भी 42 जितनी बड़ी तादाद में स्टार्टअप कुल 82 अरब डॉलर के मूल्य निर्धारण के साथ यूनिकॉर्न में बदल गए.
भारत दुनिया भर में स्टार्टअप के तीसरे सबसे बड़े पारितंत्र के रूप में उभरा, जहां 59,000 से ज्यादा ऐसी कंपनियां बीते पांच सालों में जन्मीं और फली-फूलीं. केवल अमेरिका और चीन हमसे आगे हैं.
फिर आश्चर्य क्या कि जब इंडिया टुडे ने अपनी 46वीं वर्षगांठ के विशेषांक के लिए आने वाले कल के भारत की तस्वीर बयां करने वाले 20 से 40 के बीच की उम्र के 'नई नस्ल: 100’ की पहचान का फैसला किया, तो इस फेहरिस्त में युवा उद्यमियों का बोलबाला था. युवा राजनीतिज्ञ भी भला कैसे पीछे रहते, तो अनेक पार्टियों में ऐसे युवा हैं, जो राजनैतिक फलक पर अपनी मौजूदगी महसूस करवा रहे हैं.
उनके साथ मनोरंजन की दुनिया के युवा भी हैं, जिनके फॉलोवर्स की संख्या से बीते कल के सुपरस्टार भी ईर्ष्या करेंगे. विज्ञान से लेकर कला और खेल तक दूसरे कई क्षेत्रों में भी मिलेनियल्स अपनी चमक बिखेर रहे हैं. अगले पन्नों में हम ऐसे लोगों का एक चयन प्रस्तुत कर रहे हैं, जो हमारी राय में अगले 100 में जगह पाने के हकदार हैं. यह किसी भी रूप में समग्र सूची नहीं है, लेकिन यह इस पीढ़ी की पुरअसर प्रतिभाओं की एक बानगी जरूर है. ऐसी बानगी जो हमें यह उम्मीद करने का भरोसा दिलाती है कि भारत का भविष्य समर्थ हाथों में है.
इंटरनेट वह तोप रही है जिसने मिलेनियल्स को इतिहास के संकोच ध्वस्त करने और अभूतपूर्व सफलता का रास्ता तैयार करने की गुंजाइश दी.

