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डार्क मोड

विशेषांकः लाजवाब दीवानगी

भले मुगल-ए-आजम में शहंशाह अकबर का किरदार हमारी यादों बसा है, मगर पृथ्वीराज कपूर वाकई रंगमंच के सरताज थे, जिन्होंने प्रेम, राष्ट्रीयता और भाईचारे का संदेश दिया

पृथ्वीराज कपूर (1906-1972)
पृथ्वीराज कपूर (1906-1972)
अपडेटेड 1 सितंबर , 2021

जब भी मैं आधुनिक भारतीय रंगमंच के बारे में सोचती हूं, मेरे जेहन में एक ही कद्दावर शख्सियत पृथ्वीराज कपूर की उभरती है. मेरे लिए सबसे खास रंगमंच को लेकर उनकी दीवानगी है, जो उनके सामाजिक दायित्व के गहरे बोध से गुंथी हुई थी.

बहुआयामी प्रतिभा के धनी उस प्रकांड किस्म के व्यक्ति ने निर्देशन और अभिनय, स्क्रीन, स्टेज, लेखन हर मामले में समान सहजता से अपनी जगह बनाई लेकिन उनका दिल थिएटर में बसता था.

वरना, और कौन हो सकता है जो अपने निर्देशन और अमूमन लेखन के 2,662 शो में सभी में खुद भी अभिनय करे? उन दिनों वे अपने नाटकों को पूरे भारत भर में ले गए, और अपनी फिल्मों की कमाई से अपने स्टेज प्रोडक्शन के खर्चे भरते रहे.

पृथ्वीराज कपूर इंडियन पीपल्स थिएटर एसोसिएशन (इप्टा) के संस्थापक सदस्य थे और बाद में उन्होंने अपनी खुद की कंपनी पृथ्वी थिएटर स्थापित की. इसमें वे सामाजिक और राजनैतिक प्रासंगिकता वाले नाटक पेश किया करते थे.

उनके विषय विविध होते थे—भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर राष्ट्रवादी आंदोलनों तक. मसलन पठान में हिंदू-मुस्लिम एकता दिखाई गई थी. आज के वातावरण में, यह संदेश खास तौर पर प्रासंगिक है.

पृथ्वी थिएटर देश की रंगमंच बिरादरी के लिए मकबूल है क्योंकि इसमें उसके संस्थापक की भावना की शुद्धता जुड़ी है. चाहे आप परफॉर्मर हों या दर्शक, पृथ्वी मंच हमें शानदार मानवीय अनुभव देता है.

लिलेट दुबे रंगमंच और फिल्मों की अभिनेत्री और रंगमंचीय निर्देशक भी हैं

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