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डार्क मोड

विशेषांकः तैरती उम्मीदें

पारंपरिक शिकारे को जल एंबुलेंस में बदलकर डल झील के बाशिंदों को वक्त पर इलाज मुहैया करने में मदद की जा रही है

तारिक अहमद पतलू, 51 वर्ष, हाउसबोट मालिक, श्रीनगर
तारिक अहमद पतलू, 51 वर्ष, हाउसबोट मालिक, श्रीनगर
अपडेटेड 29 मई , 2021

मोअज्जम मोहम्मद

पिछले साल अगस्त की बात है. श्रीनगर में एक हाउसबोट के मालिक तारिक अहमद पतलू को कोविड हो गया. शहर के एसएमएचएस अस्पताल पहुंचने के लिए उन्हें सवारी की जरूरत थी. मगर उनकी बिरादरी ने उन्हें मायूस किया. झील के उस पार जाने के लिए उन्हें शिकारा तक नहीं मिला. उस बेरुखी की याद उन्हें ठीक होने के बाद भी वायरस से कहीं ज्यादा कचोटती थी. पूरी तरह तंदुरुस्त होने के बाद पतलू के मन में जल एंबुलेंस सेवा शुरू करने का विचार कौंधा ताकि असहाय कोविड मरीजों की मदद कर सकें. मोटर से चलने वाली और तत्काल चिकित्सा सहायता के लिए जीवन-रक्षक साजो-सामान और मशीनों से लैस व्यावसायिक वॉटर एंबुलेंस पर 20 लाख रुपए की लागत आती और ये खर्च उनके वश में नहीं था. लिहाजा उन्होंने एक पारंपरिक शिकारे को कामचलाऊ एंबुलेंस में बदल लिया. सत्य रेखा ट्रस्ट ने इसमें उनकी रुपए-पैसे से मदद की.

डल झील 22 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैली है और यहां हाउसबोट और शिकारे के मालिकों के अलावा करीब 8,000 लोग रहते हैं. उन्हें न पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं हासिल हैं और न सबसे नजदीकी अस्पताल तक जाने के लिए एंबुलेंस.

पतलू ने ठान लिया कि इस स्थिति को बदलना है. वे अपने एक दोस्त के साथ महीने भर से ज्यादा काम में जुटे रहे और आखिरकार उन्होंने 35 फुट लंबी और 5.5 फुट चौड़ी एंबुलेंस तैयार कर ही ली. इसे बनाने में देवदार, लोहे और एल्यूमिनियम सरीखे हल्के सामानों का इस्तेमाल किया. इसमें इंजन भी फिट कर लिया ताकि फटाफट मंजिल तक पहुंचा जा सके. दिसंबर 2020 में शुरू की गई यह एंबुलेंस अब तक कई लोगों को अस्पताल पहुंचाने में मदद कर चुकी है. इससे छह मृतकों के शव भी झील के उस पार पहुंचाए गए हैं.

एंबुलेंस स्ट्रेचर, व्हीलचेयर, मास्क, पीपीई किट, ग्लूकोमीटर, ब्लड प्रेशर नापने के उपकरण, ऑक्सीमीटर और फर्स्ट-एड बॉक्स से लैस है. वायरस की दूसरी लहर ने पतलू को इसमें ऑक्सीजन सिलिंडर भी रखने को मजबूर कर दिया. इसमें जल्द ही एक वेंटिलेटर भी होगा. उन्होंने सरकार से मदद की गुहार की है कि उन्हें इस एंबुलेंस के लिए पूरी तरह डॉक्टर और सहायक चिकित्साकर्मी दिए जाएं ताकि बोट में ही आपात चिकित्सा मुहैया की जा सके.
यह तैरती एंबुलेंस सेवा झील के भीतरी हिस्सों तक पहुंच रही है.

पतलू कहते हैं, ''मरीज को अस्पताल पहुंचाने में देरी की वजह से मौत हो जाती है. नजदीकी पुश्ते तक वक्त पर नहीं पहुंचने से मेरी आंटी चल बसीं.'' वे यह भी कहते हैं, ''छोटी और खुली बोट में मरीजों को पार उतारना, खासकर बारिश और सर्दियों के मौसम में, मुश्किल भरा होता है. इस मुश्किल से निपटने के लिए एंबुलेंस को पूरा ढककर वाटरफ्रुफ बनाया गया है. इसमें 10 लोग आ सकते हैं.''

बोटवालों ने उनका नंबर व्हाट्सऐप ग्रुपों पर डाल दिया है. झील को प्रदूषण से बचाने की गुहार लगाने वाले पोस्टरों पर भी उनका फोन नंबर लिख दिया गया है. उन्हें झील के इलाके में रहने वाले परिवारों के बार-बार फोन आते हैं, जो उनसे (कोविड पॉजिटिव या दूसरी बीमारी से ग्रस्त) अपने मरीजों को अस्पताल ले जाने की गुजारिश करते हैं. पतलू कहते हैं, ''हाल में मैं मृतकों के शव भी पार लेकर गया. मैं कोविड फैलने से रोकने के लिए मरीजों और उनके तीमारदारों को एंबुलेंस से पीपीई किट देता हूं. हर सुबह मैं अपनी बोट निकालता हूं और एंबुलेंस में लगे लाउडस्पीकर से जोर-जोर से कोविड के बुनियादी मानक नियम-कायदे पढ़कर जागरूकता बढ़ाता हूं.

इन चक्करों के लिए मुझे ईंधन पर रोज 300-500 रुपए खर्च करने होते हैं जो मैं अपनी बचत से चुकाता हूं. जो भी बोटमैन मास्क नहीं पहने होते हैं, उन्हें मैं मुफ्त मास्क भी मुहैया कराता हूं.'' पतलू अब अफसरों से मिलकर कोशिश कर रहे हैं कि डल झील इलाके में टीके लगाने की मुहिम में उनकी जल एंबुलेंस को भी शामिल किया जाए. वे कहते हैं, ''मैं पक्का करना चाहता हूं कि वैक्सीन यहां के बाशिंदों के दरवाजे-दरवाजे तक पहुंचे.''

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