
जब अर्थव्यवस्था की बात आती है, मौजूदा चुनौतियों की थाह लेने के लिए अतीत के अनुभव आईने का काम करते हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था ने बीते दशक में बड़ी उथल-पुथल मचाने वाले कुछ झंझावात झेले हैं. मसलन, जुलाई 1969 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से किया 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण और फिर 1970 के दशक के आखिरी वर्षों में मोरारजी देसाई सरकार की तरफ से लाया गया विदेशी मुद्रा विनिमय कानून, जिसने विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय उद्यमों में 40 फीसद से ज्यादा मिल्कियत हासिल करने पर पाबंदी लगाई और इस वजह से आइबीएम और कोका-कोला सरीखी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारतीय बाजार से रुखसत होना पड़ा था.
1991 के भुगतान संतुलन के संकट के बाद नरसिंह राव सरकार ने कई क्षेत्रों में ढांचागत अड़चनों को दूर करने के लिए कई सुधारों को अंजाम दिया था. तब वित्त मंत्री मनमोहन सिंह के मातहत औद्योगिक लाइसेंस देने की प्रणाली यानी लाइसेंस राज समाप्त किया गया, वित्तीय क्षेत्र के सुधार लागू किए गए और व्यापार को उदार बनाया गया था.

इस सबका मकसद घरेलू उद्योगों की प्रतिस्पर्धा की क्षमता बढ़ाना, विदेशी व्यापार को बढ़ावा देना और निजी निवेश को प्रोत्साहित करना था. तब लाए गए सुधारों में औद्योगिक नियम-कायदों में ढील, वित्तीय और कर सुधार तथा विदेशी मुद्रा विनिमय और विदेशी व्यापार नीतियों में सुधार शामिल थे. इन सबकी बदौलत देश की सालाना जीडीपी वृद्धि 1990 के दशक में 6.1 फीसद पर पहुंच गई और देश ने 30 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां इकट्ठा कर लीं तथा इस बीच बाहरी कर्ज भी कम किया.
हाल में 2014-19 के बीच नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में देश दो जबरदस्त आर्थिक उथल-पुथल का गवाह बना—नवंबर 2016 में 500 रुपए और 1,000 रुपए के नोटों का बंद किया जाना और जुलाई 2017 में जीएसटी (माल और सेवा कर) लागू करना. मोदी सरकार 2016 में ऋण शोधन अक्षमता और दिवालिया संहिता भी लाई, जिसकी बदौलत कर्जदाताओं के लिए नाकाम कारोबारों से अपने निवेश का कम से कम कुछ हिस्सा वसूल कर पाना मुमकिन हुआ.
2019 से शुरू अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी सरकार को कोविड-19 महामारी से जूझना पड़ा, जब दुनिया का एक सबसे कठोर लॉकडाउन लगा और लोगों तथा फर्मों को संकट से पार पाने में मदद करने के लिए 20 लाख करोड़ रुपए के आत्मनिर्भर भारत अभियान का ऐलान किया गया. अर्थव्यवस्था, जो महामारी से पहले ही चरमरा रही थी और उससे पूर्व की कई तिमाहियों में कई क्षेत्रों में वृद्धि 5 फीसद से नीचे आ गई थी, फिलहाल आजादी के बाद अपनी पांचवीं मंदी के दौर में है, जब 2020-21 में जीडीपी ग्रोथ करीब -7.7 पर आ जाने की आशंका है.

ऐसे में सरकार के लिए क्या करना बेहद जरूरी है? ज्यादातर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भारत को बुनियादी ढांचा और स्वास्थ्य सेवा सरीखे क्षेत्रों में खुलकर अच्छा-खासा खर्च करना चाहिए. बुनियादी ढांचे पर खर्च से नौकरियों का सृजन होगा और स्वास्थ्य सेवा को मजबूत करने से महामारी से लडऩे में मदद मिलेगी. मैन्युफैन्न्चङ्क्षरग क्षेत्र को भी सहारे की जरूरत है. आगे की संभावनाओं पर विचार करते हुए विशेषज्ञों ने सबसे बड़ी एनबीएफसी (गैर-बैंङ्क्षकग वित्तीय कंपनियां) की परिसंपत्ति गुणवत्ता समीक्षा की भी मांग की है, ताकि पूंजी की कमी से कराह रही फर्म की पहचान और सहायता की जा सके.
साथ ही, वे बुनियादी ढांचे की ठप पड़ी परियोजनाओं को दोबारा शुरू करने की कोशिश करने की जरूरत भी बताते हैं. भारत को नई ऊर्जा से ओतप्रोत सुधार कार्यक्रम की भी जररूत है जिसका जोर पूंजी, जमीन और श्रम बाजारों को उदार बनाने पर हो. आरबीआइ के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि सरकार को खासकर सबसे गरीब राज्यों में जमीनों की पैमाइश और मिल्कियत तय करने का काम तेज करना चाहिए.
केंद्र को बेहतरीन प्रथाओं के आधार पर जमीन अधिग्रहण कानून को नया रूप देना चाहिए जिसमें विक्रेता के हितों की रक्षा के साथ अधिग्रहण की प्रक्रिया ज्यादा आसान हो सके. भारत को वैश्विक तौर पर प्रतिस्पर्धी बनने के लिए ज्यादा बड़े आकार की फर्मों की जरूरत भी है. विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि भारत की कर और नियामकीय व्यवस्थाओं में ऐसे बदलाव ऐसा नहीं किए जाने चाहिए जो अप्रत्याशित हों. ठ्ठ
भारत को नई ऊर्जा से भरे सुधार कार्यक्रम की जरूरत है जिससे भूमि, पूंजी और श्रम बाजार उदार हो सके
75 वें वर्ष का एजेंडा
भारत को बुनियादी ढांचे और स्वास्थ्य पर खर्च करने की जरूरत है-पहले खर्च से रोजगार पैदा हो सकेंगे और दूसरे से महामारी से निपटने में मदद मिलेगी
भूमि, श्रम और पूंजी बाजार को उदार बनाने के साथ भविष्य के संकट से बचने के लिए एनबीएफसी की परिसंपत्तियों की गुणवत्ता समीक्षा की मांग विशेषज्ञ उठा रहे हैं
अल्पकाल में उत्पादन को मदद की ज्यादा जरूरत है, साथ ही जानकार कह रहे हैं कि अटकी हुई बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को पुनर्जीवित करने के प्रयास होने चाहिए
दीर्घकाल में इंफ्रास्ट्रन्न्चर परियोजनाओं की राह में भूमि अधिग्रहण बाधा बनता है, कुछ जानकार कहते हैं कि बेचने वाले के हित संरक्षित करते हुए बेहतर कानून बनाकर इसे आसान बनाया जा सकता है
करों और नियमों को सहज व अनुमान के दायरे में रखने की मांग उद्योग जगत करता है

