
एक निराशाजनक तथ्य पर नजर डालें: 15 अगस्त 2020 को जब भारत ने 74वां स्वतंत्रता दिवस मनाया तब देश के 19.1 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से केवल 16.8 प्रतिशत यानी प्रत्येक छह परिवार में से बस 1 परिवार को ही टोंटी से स्वच्छ पानी की आपूर्ति हो रही थी जिसका इस्तेमाल वे पीने और अन्य घरेलू उपयोगों के लिए कर सकते थे. अधिकांश को या तो पास के किसी हैंडपंप पर निर्भर रहना पड़ता था या फिर पानी के लिए कुएं तक जाना पड़ता था. पानी इकट्ठा करने का बोझ आमतौर पर घर की महिलाओं और बालिकाओं पर आता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों का नुकसान होता है. इसके अलावा, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि एकत्र किया पानी पीने योग्य ही रहा हो. दूषित पानी से जल-जनित बीमारियां पैदा होती हैं जो भारत के अधिकांश हिस्से में फैलती रहती हैं.
ऐसा नहीं है कि आजादी के बाद से लगातार सरकारों ने इस महत्वपूर्ण आवश्यकता की उपेक्षा ही की है. 1950 और 60 के दशक में घरों को पानी उपलब्ध कराने के लिए नए कुओं के निर्माण और पुराने कुओं के नवीकरण पर ध्यान केंद्रित किया गया था. 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने त्वरित ग्रामीण जल आपूर्ति कार्यक्रम के शुभारंभ के साथ, कुओं की जगह बोरवेल बनाने और हैंडपंप प्रदान करने पर जोर दिया जाने लगा. 1986 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे, उन्होंने राष्ट्रीय पेयजल मिशन की शुरुआत की जिसमें नए मानदंड निर्धारित किए गए.

अब तक किसी भी परिवार को उसके घर से 1.6 किलोमीटर के भीतर पेयजल आपूर्ति का स्रोत उपलब्ध कराने का मानदंड था जिसे सुधारकर आधा किलोमीटर किया गया और प्रत्येक घर के लिए रोजाना 40 लीटर जल उपलब्ध कराने के प्रचलित मानदंड को बदलकर 70 लीटर प्रतिदिन किया गया. इस मिशन के तहत बड़े पैमाने पर नवीनतम तकनीक का उपयोग करने वाले बोरवेल लगाए गए. सदी के अंत तक, देश ने लक्ष्य हासिल कर लिया था और धीरे-धीरे घरों में पाइप से सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने पर ध्यान केंद्रित किया गया.
जब नरेंद्र मोदी 2019 में दोबारा प्रधानमंत्री बने तो स्वतंत्रता दिवस के संबोधन में उन्होंने 2024 तक हर घर में नल से सुरक्षित पानी की आपूर्ति सुनिश्चित कराने के लिए जल जीवन मिशन शुरू करने की घोषणा की. पीएम ने एक और महत्वपूर्ण बदलाव की रूपरेखा तैयार की जब उन्होंने पानी की चिंताओं, चाहे वह पीने का पानी, सिंचाई या फिर जल संरक्षण हों, का समाधान निकालने में प्रयासरत विभिन्न मंत्रालयों को समेकित किया और बेहतर समन्वय और तेजी से कार्य के लिए जल शक्ति नामक एक सुपर मंत्रालय बनाया.
पाइप से पेयजल आपूर्ति अभियान को हर घर जल मिशन नाम से जाना जाता है, सरकार ने इस मिशन के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए और यह सुनिश्चित किया कि राज्य 30 से 50 प्रतिशत के बीच खर्च उठाएं. पेयजल और स्वच्छता विभाग के अतिरिक्त सचिव भरत लाल कहते हैं, ''हर ग्रामीण के घर तक नल का पानी पहुंचाने में, गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति सुनिश्चित कराने पर ध्यान केंद्रित किया जाता है. इसका उद्देश्य न केवल लोगों के जीवन को आसान बनाना है बल्कि जीवन की गुणवत्ता को भी बढ़ाना है, विशेषकर घर की महिला सदस्यों के लिए.''
अपने पहले कार्यकाल में, मोदी ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि प्रत्येक गांव, शहर या नगर खुले में शौचमुक्त (ओडीएफ) बने, स्वच्छ भारत मिशन को लागू किया था. इसके लिए हर घर को एक शौचालय के अलावा ठोस कचरा प्रबंधन सुविधा से भी युक्त किया गया. 2019 तक, सरकार ने 10 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण किया था और 2 अक्तूबर को देश ने खुद को ओडीएफ घोषित कर दिया था. अब, वे उसी जोश से अपना ध्यान जलापूर्ति पर केंद्रित करेंगे. हर घर जल कार्यक्रम में पहले ही 3.3 करोड़ परिवारों को पाइप के जरिए पानी मुहैया कराया जा चुका है और इससे लाल का विश्वास बढ़ा है कि 2022 तक शेष 12.7 करोड़ घरों को कवर कर लिया जाएगा. कार्यक्रम के हर पहलू पर नजर रखने के लिए प्रौद्योगिकी का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा रहा है. महत्वपूर्ण रूप से, सभी ग्रामीण स्कूलों को कार्यक्रम के तहत कवर किया जाता है ताकि बच्चों को सुरक्षित पानी मिले.
इस बीच, जल शक्ति मंत्रालय देश के दुर्लभ जल संसाधनों के संरक्षण पर काम कर रहा है. भारत जहां दुनिया की कुल आबादी का 18 प्रतिशत निवास करती है, वहां वैश्चिक जल संसाधनों का केवल 4 प्रतिशत मौजूद है. कृषि में पानी का सबसे ज्यादा उपयोग होता है उसके बाद उद्योग और घरेलू उपयोगकर्ताओं का नंबर आता है. 14.0 करोड़ हेक्टेयर के कुल फसली क्षेत्र में से, केवल 44 प्रतिशत सिंचाई के पुक्चता इंतजाम है और इसे बढ़ाने की बड़ी जरूरत है. पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक सहित कई राज्यों के किसानों को मुफ्त बिजली प्रदान करने से भूजल का बहुत अधिक दोहन हुआ है और जलस्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया है. मोदी सरकार ने वर्षा जल संचयन परियोजनाओं के अलावा पानी के अधिक कुशल उपयोग के लिए कम पानी में सिंचाई को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं शुरू की हैं. धान और गन्ने जैसी, ज्यादा पानी से होने वाली फसलों में पानी का बहुत ज्यादा उपयोग होता है, को सरकार कृषि विविधता को अपनाने और अन्य फसलों की ओर जाने को प्रोत्साहित कर रही है. यह एक कठिन कार्य है, लेकिन अगर भारत को जल संकट को कम करना है तो यह जरूरी भी है.

