scorecardresearch
डार्क मोड

ज्यादा जोर लगाने की जरूरत

हमारे निर्यात में कौन अड़चनें डालता है? बुनियादी ढांचे की बाधाएं, हमारी फर्मों की बड़े स्तर पर उत्पादन की असमर्थता, आयात पर भारी शुल्क जिससे तैयार वस्तुओं पर मुनाफा बहुत कम हो जाता है, यह एक अंतहीन सूची है

बड़ी छलांग 1991 की उदारीकरण की नीति के चलते खुले बाजार से बहुत फायदा हुआ
बड़ी छलांग 1991 की उदारीकरण की नीति के चलते खुले बाजार से बहुत फायदा हुआ
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2021

भारत की विदेश व्यापार नीति को तीन चरणों में विभाजित किया जा सकता है: 1950-75 की अवधि जिसमें सख्त नियंत्रण देखा गया, 1976-91 में कुछ उदारीकरण दिखा-विशेष रूप से आखिरी 5-7 वर्षों में और 1992 के बाद का समय जिसने उदारीकरण की पूर्ण शुरुआत देखी. हालांकि सरकार ने मई 1940 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान विदेशी मुद्रा के संरक्षण के लिए मात्रात्मक आयात नियंत्रण की शुरुआत की थी, लेकिन 1947 से सरकार ने विदेशी मुद्रा के विनिमय दरों पर बहुत प्रतिबंध लगा दिए. 2004 में ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूट के शोध पत्र में अर्थशास्त्री अरविंद पनगढिय़ा ने बताया कि उन दिनों नीतियां उदारीकरण और कठोर नियंत्रण का मिश्रण थीं.

1956-57 में भुगतान संतुलन संकट के बाद, भारत व्यापक आयात नियंत्रणों में वापस चला गया. स्वदेशी उपलब्धता के सिद्धांत पर बड़ा जोर था इसलिए यदि किसी उत्पाद के घरेलू विकल्प उपलब्ध थे तो उसके आयात के लिए विदेशी मुद्रा देने से मना कर दिया जाता था. 1966 में एक प्रमुख नीतिगत बदलाव आया, जब भारत ने रुपये का अवमूल्यन किया और यह डॉलर के मुकाबले 4.7 से 7.5 हो गया. साथ ही आयात लाइसेंसिंग, आयात शुल्क और निर्यात सब्सिडी को उदार बनाया. 1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक की शुरुआत में यह प्रक्रिया कुछ समय के लिए फिर से उलट दी गई लेकिन 1970 के दशक के अंत में उदारीकरण वापस आ गया था. नए चरण की शुरुआत 1976 में ओपन जनरल लाइसेंसिंग (ओजीएल) सूची को फिर से जारी करने से हुई. बाद में सैकड़ों वस्तुओं को आयात के लिए ओजीएल में जोड़ा गया. 1990 तक, 31 क्षेत्रों को औद्योगिक लाइसेंस से मुक्त कर दिया गया था.जुलाई 1991 के बजट के साथ, भारत में खुली और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था के लिए स्पष्ट बदलाव दिखा.

जुलाई 1991 में हुए सुधारों में कुछ मध्यवर्ती वस्तुओं और पूंजीगत सामानों को छोड़कर सभी पर से आयात लाइसेंस को खत्म कर दिया. सरकार ने भी रुपए का 22.2 प्रतिशत अवमूल्यन किया और एक डॉलर की कीमत 21.2 रुपये से घटाकर 25.8 रुपये कर दी गई. उदारीकरण के साथ, व्यापार को बड़ा प्रोत्साहन मिला. माल और सेवाओं के विश्व निर्यात में भारत की हिस्सेदारी जो कि आजादी के समय के 2 प्रतिशत से घटकर 1980 के मध्य तक मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई थी, 2002 तक कुछ सुधरकर 0.8 प्रतिशत पर आ गई. विश्व में सेवाओं के व्यापार में भारत ने चौगुना से अधिक वृद्धि की और यह 1995 के 0.5 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 3.5 प्रतिशत हो गई; देश बिजनेस सेवाओं का प्रमुख निर्यातक बन गया है, विशेष रूप से सूचना, संचार और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में. हालांकि, फरवरी 2020 में एक ओईसीडी (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) की रिपोर्ट के अनुसार माल के निर्यात में भारत ने मिश्रित परिणाम देखे हैं. भारत ने फार्मास्यूटिकल्स और रिफाइंड तेल जैसे कुछ कौशल और पूंजी गहन वस्तुओं के बाजार में अपना रुतबा बढ़ाया है. हालांकि, कपड़ा, चमड़ा और कृषि उत्पादों के निर्यात के प्रदर्शन ने निराश किया है.

ज्यादा जोर लगाने की जरूरत
ज्यादा जोर लगाने की जरूरत

कौन सी चीजें हमारे निर्यात को बाधित करती हैं? ओईसीडी का कहना है कि सख्त श्रम कानूनों के कारण भारत के फर्म आकार में छोटे रहने में भी फायदा देखते हैं जिससे बड़े पैमाने पर उत्पादन से लागत में कटौती के अवसर हाथ से निकल जाते हैं. महंगी बिजली और परिवहन के बुनियादी ढांचे की दिक्कतें विनिर्माण वस्तुओं की लागत को प्रतिस्पर्धी नहीं रहने देती. वित्तपोषण की अपेक्षाकृत उच्च लागत के साथ भूमि अधिग्रहण से जुड़े मुद्दे भी भारत की प्रतिस्पर्धी क्षमता को प्रभावित करते हैं. इस बीच, 2017 के बाद से उच्च आयात शुल्क अक्सर मध्यवर्ती उत्पादों के महंगे आयात का कारण बनते हैं. अगर इस अतिरिक्त लागत की पूरी भरपाई नहीं की जाती, तो इससे निर्यातकों को बहुत नुकसान होता है जो उन मध्यवर्ती वस्तुओं से तैयार माल बनाते हैं.

आज जरूरत है कि भूमि और श्रम कानूनों को आधुनिक बनाया जाए, बुनियादी ढांचे की अड़चनों को दूर किया जाए और सेवा क्षेत्र को व्यापार और निवेश के लिए खोला जाए. विदेश व्यापार नीति 2015-20 की मध्यावधि समीक्षा में, वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने प्रोत्साहन देकर भारत से वाणिज्यिक निर्यात योजना (एमईआईएस) और भारत से सेवा निर्यात योजना (एसईआईएस) का दायरा बढ़ाया है. सरकार 2021-26 के लिए एक नई विदेश व्यापार नीति तैयार कर रही है, और उसने उद्योग से इस पर सुझाव मांगे हैं.


उद्योगों की तरफ से एक विचार 'लगाओ और चलाओ' (प्लग एंड प्ले) इंफ्रास्ट्रक्चर का आया है जिससे वैश्विक कारोबारों को भारत में इकाइयां लगाने के लिए मंजूरी पाने का लंबा इंतजार न करना पड़े. एक और विचार ट्रेड में उद्योग-सरकार के अधिकारसंपन्न कार्यबल बनाने का है. इस सबसे अलग भारत को पूंजी की लागत घटाने और इसे निर्यातकों को आसानी से उपलब्ध कराने की जरूरत है.

ADVERTISEMENT
Advertisement