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मैन्युफैक्चरिंगः यही है असल इंजन

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर वृद्धि का ताकतवर इंजन हो सकता है, भारत में नियम-कानूनों की भरमार, नीतियों को लेकर अनिश्चितता और गिनती के नवाचारों ने इस क्षेत्र को निचले गियर में अटका रखा है

मॉडर्न टेक्नोलॉजी महाराष्ट्र के चाकन में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा की फैक्ट्री
मॉडर्न टेक्नोलॉजी महाराष्ट्र के चाकन में महिंद्रा ऐंड महिंद्रा की फैक्ट्री
अपडेटेड 3 फ़रवरी , 2021

भारत के औद्योगिक इतिहास को, जिसमें मैन्युफैक्चरिंग अहम है, आप आजादी के बाद तीन चरणों में रख सकते हैं—1970 के अंत तक योजनाबद्ध विकास, 1980 के दशक में सीमित उदारीकरण और 1990 के दशक के शुरुआती वर्षों में सुधार के बाद का दौर.

आजादी के बाद शुरू की सरकारों पर सदियों के ब्रिटिश शासन के बाद भारतीय उद्योगों के पुनर्निर्माण का बड़ा काम था. नियोजित विकास के दौर में राज्य की भूमिका पर जोर देते हुए उत्पादन बढ़ाने और समतापूर्ण वितरण पक्का करने पर ध्यान केंद्रित किया गया. इस दौर में निजी उद्यमियों को ज्यादातर औद्योगिक क्षेत्रों में फैक्ट्रियां लगाने या विस्तार के लिए लाइसेंस की जरूरत होती थी. जिन उद्योगों में लाइसेंस की जरूरत होती थी उनकी एक निर्दिष्ट अनुसूची थी. 1980 के दशक में, और उसके बाद भारत में उद्योगों पर लगाए गए नियंत्रण धीरे-धीरे ढीले किए गए और प्रौद्योगिकी आयात तथा विदेशी पूंजी के माध्यम से विभिन्न क्षेत्रों के आधुनिकीकरण के प्रयास शुरू किए गए.

लेकिन यह 1991 की नई आर्थिक नीति थी जो एक अपूर्व भुगतान संतुलन संकट के बाद भारत के औद्योगिक परिदृश्य में वास्तविक परिवर्तन लाई. इसके तहत मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों के लिए जरूरी मंजूरियों को क्रमश: शिथिल किया गया. प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के प्रयास शुरू हुए और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए आरक्षित रहे क्षेत्रों को निजी क्षेत्र के लिए खोला गया. कुल 34 प्रौद्योगिकी प्रधान क्षेत्रों के समूह के लिए अनुमोदन पाने का एक स्वचालित (किंतु सशर्त) रास्ता बनाया गया था. इसी समय सार्वजनिक उपक्रमों में सरकार की अंशधारिता को 51 प्रतिशत तक सीमित कर दिया गया था.

अटक गए पहिए
अटक गए पहिए

हाल के वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार के 'मेक इन इंडिया' अभियान में भी घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है, पर सफलता काफी हद तक मोबाइल फोन तक ही सीमित है. फिर भी हाल ही अधिक क्षेत्रों तक पहुंचाई गई सरकार की उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं को लेकर कई उम्मीदें हैं. इसके तहत, सरकार को उम्मीद है कि घरेलू इकाइयों से उत्पादों की बिक्री में क्रमिक वृद्धि पर कंपनियों को प्रोत्साहन देकर उत्पादन को बढ़ावा दिया जा सकेगा. अंकटाड (व्यापार और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन) के अनुसार, 2019 में 49 अरब डॉलर (3.5 लाख करोड़ रुपए) के विदेशी निवेश के साथ भारत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश आकर्षित करने के मामले में दक्षिण एशिया के शीर्ष 10 देशों में था. उसे मिले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में पिछले वर्ष की तुलना में 16 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी.

फिर भी, बहुत कुछ किया जाना है. भारतीय मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र अरसे से जीडीपी के करीब 15 प्रतिशत पर अटका हुआ है. यह स्थिति बदलने के लिए, भारतीय फर्मों को ज्यादा प्रयास करने होंगे ताकि वे वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का हिस्सा बन सकें. वाहन और दवा निर्माण के क्षेत्र में कुछ सफलता मिली है, पर इसे दूसरे क्षेत्रों में भी दोहराए जाने की जरूरत है. और केवल विदेशी कंपनियों के लिए कारखाना बनने की बजाए भारतीय निर्माताओं को निर्माण और वितरण के क्षेत्रों में अधिक नवोन्मेषी होने की जरूरत है.

नियमन के स्तर पर भारत के मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों को जिस सरकारी संरक्षण का लाभ मिलता है, उसने उनमें नवाचार की ललक कमजोर कर दी है. भारतीय उद्योग की रीढ़ होने के बावजूद सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) को लंबे समय से नजरअंदाज किया जाता रहा है. भूलभुलैया जैसा विधिक वातावरण भी विकास को हतोत्साहित करता है क्योंकि भारतीय कानून बड़ी कंपनियों के लिए खासी अनुपालन लागतें पैदा करते हैं. मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को सरकार की आकांक्षा के अनुरूप 15 प्रतिशत से बढ़कर जीडीपी के 25 प्रतिशत तक पहुंचना है तो इन कारकों में बदलाव लाना होगा.

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