
71वें वर्ष गणतंत्र के/ ऊर्जा
मणिपुर के लेइसांग गांव में अप्रैल 2018 में आखिरकार बिजली पहुंच ही गई. यह देश के 5,90,000 गांवों में बिजली पहुंचने वाला आखिरी गांवों में एक था. आखिरी आदमी तक बिजली पहुंचाने में देश को 70 साल लगे, लेकिन एक मील का पत्थर आखिर पार कर ही लिया गया.
देश ने अंग्रेजों से 1,717 मेगावॉट की स्थापित क्षमता प्राप्त की थी, जिसमें ज्यादातर पनबिजली संयंत्रों के जरिए थी. फैक्ट्रियों, शहरी घरों और व्यापारिक केंद्रों को रोशन करना ही मुश्किल से हो पाता था. बिजली जरूरत नहीं बल्कि विलासिता थी और इसे गांवों तक ले जाना संभव नहीं था. आज देश की स्थापित क्षमता 375.3 गीगावॉट है, जो ताप संयंत्रों (कोयला, तेल और गैस), अक्षय स्रोत (पानी, सौर और पवन) और परमाणु ऊर्जा स्रोतों से प्राप्त की जाती है, जबकि क्षमता उपयोग मोटे तौर पर 175 गीगावॉट है.

फिर भी देश में रोज छह से सात घंटे लोड शेडिंग झेलना पड़ता है, क्रॉस सब्सिडी की वजह से व्यावसायिक संस्थाओं के लिए बिजली महंगी बनी हुई है और हम 26 फीसद बिजली गंवा देते हैं (मौजूदा आंकड़ा कोविड की पाबंदियों की वजह से और भी ज्यादा है; पिछले वित्त वर्ष में यह आंकड़ा करीब 18.7 फीसद था). तकरीबन पूरे बिजलीकरण के बावजूद प्रति व्यक्ति खपत अब भी 1,208 यूनिट ही है, जो चीन की प्रति व्यक्ति 5,161 यूनिट और अमेरिका की 12,997 यूनिट से बहुत कम है.
अब देश आत्मनिर्भरता पर जोर दे रहा है और मैन्यूफैक्चरिंग के लिए रास्ता तैयार कर रहा है, ऐसे में इस आंकड़े का बढऩा तय है. अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एंजेसी (आइईए) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 1.6 टन कार्बन डाइऑक्साइड है, जो 4.4 टन के वैश्विक औसत से खासा कम है, जबकि विश्व के कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में इसका हिस्सा करीब 6.4 फीसद है.
भारत की 231.6 गीगावॉट की तापविद्युत क्षमता ही अब भी देश की आधारभूत बिजली की जरूरत को पूरा करती है और इन उत्सर्जनों में सबसे ज्यादा योगदान देती है. अगले पांच साल में देश की सबसे बड़ी चुनौती न केवल इन कार्बन उत्सर्जनों में कटौती करना बल्कि ट्रांसमिशन और अंतिम मील के वितरण नेटवर्क में सुधार लाना होगी.
बिजली के अलावा देश ने बीते कुछ साल में ऊर्जा स्रोतों की गुणवत्ता में सुधार किया है. विश्व बैंक की पिछली रिपोर्ट के मुताबिक, प्रति व्यक्ति ऊर्जा उपयोग 1971 के 267.34 किग्रा से सुधरकर 2014 में 636.57 किग्रा हो गया, और अब तक इसके 900 किग्रा को पार कर चुकने का अनुमान है. देश में खाना पकाने के लिए अब एलपीजी का इस्तेमाल बढ़ा है.
पेट्रोलियम मंत्रालय के पेट्रोलियम नियोजन और विश्लेषण प्रकोष्ठ के आंकड़े बताते हैं कि एलपीजी की खपत 2008-09 में 1.06 करोड़ टन से बढ़कर 2017-18 में 2.04 करोड़ टन पर पहुंच गई. इसी अवधि में एलपीजी कनेक्शन की तादाद 28.7 करोड़ हो गई. यह उन साठ लाख उपभोक्ताओं के अलावा हैं जिन्हें पाइप से प्राकृतिक गैस मिलती है.
देश ज्यादा साफ-सुथरे ऊर्जा स्रोतों की तरफ बढऩे की योजना पर काम कर रहा है. देश में अच्छी-खासी तादाद में पेट्रोल पंप पहले ही भारत स्टैंडर्ड 6 ग्रेड ईंधन के हैं जिसमें सल्फर का स्तर कम है. इलेक्ट्रिक वाहन और हाइब्रिड (एथेनॉल मिला हुआ) ईंधन की दिशा में भी काम चल रहा है. 1,500 सीएनजी स्टेशनों को अगले पांच साल में 10,000 तक बढ़ाना है.
बिजली कानून में संशोधन के साथ राष्ट्रीय शुल्क नीति में बड़े सुधार किए जा रहे हैं. सब्सिडी के बोझ को बिजली खरीद की औसत दर के 20 फीसद तक कम करने पर जोर है. अलबत्ता बीते दो दशकों में ऐसी कोशिशों में सीमित कामयाबी मिली है. कृषि कानूनों को लेकर हाल के विरोध ने जानकारों के मन में नए संदेह पैदा कर दिए हैं.
75 वें वर्ष का एजेंडा
बिजली वितरण कंपनियों के खाते-बही को दुरुस्त करने और इस क्षेत्र में दक्षता बढ़ाने के लिए निजी निवेशकों को लाने पर जोर दें
राज्यों को स्मार्ट और प्री-पेड मीटर लगाने के लिए प्रोत्साहित करें
बिजली शुल्क पर सब्सिडी को खरीद दर के 20 फीसद तक सीमित करें
देश में सीएनजी स्टेशन की संख्या मौजूदा 1,500 से बढ़ाकर 10,000 करें

