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विशेषांकः जीत की जंग

दुश्मन दरवाजे पर खड़ा है और सशस्त्र बल अपनी सैन्य मशीन को आधुनिक बनाने की जबरदस्त चुनौती से दो-चार

शक्तिशाली हथियार सितंबर 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना का टैंक
शक्तिशाली हथियार सितंबर 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारतीय सेना का टैंक
अपडेटेड 5 फ़रवरी , 2021

71वें वर्ष गणतंत्र के/प्रतिरक्षा

जंग की घड़ी में ही लोग एकजुट होकर काम कर पाते हैं. शांतिकाल में वे अपनी संकीर्णताओं में बिखर जाते हैं. हमें अपने क्षुद्र हितों से ऊपर उठकर देश की बेहतरी के लिए काम करना चाहिए.’’

एयर चीफ मार्शल पी.सी. लाल के 36 साल पहले अपने संस्मरणों में लिखे ये शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने उस वक्त थे. एयर चीफ मार्शल लाल 1971 के पाकिस्तान युद्ध के दौरान वायु सेना प्रमुख थे. वह आखिरी लड़ाई थी जो सेना के तीन अंगों ने मिलकर लड़ी थी. पिछले साल सरकार ने सशस्त्र बलों में आजादी के बाद अब तक के सबसे व्यापक और विस्तृत सुधारों को अंजाम दिया.

यह चीन के साथ 1962 की सरहदी लड़ाई के बाद भारतीय सशस्त्र बलों का सबसे अहम पुनर्गठन है. जो देश कभी अपने लोगों का पेट भरने के लिए अनाज के आयात पर निर्भर था, उसे अपने सैन्य खर्चों में इजाफा करना पड़ा और युद्धपोत, टैंक और लड़ाकू विमानों का निर्माण करने के लिए फैक्टरियां और शिपयार्ड बनाने का मुश्किल विकल्प चुनना पड़ा.

इस बार खुशकिस्मती से सरकार को जागने के लिए युद्ध की जरूरत नहीं पड़ी. दिसंबर 2019 में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति के बाद 17 एकल सैन्य कमान को महज पांच संयुक्त कमान में बदलने के उस काम को हाथ में लिया गया, जिसे सशस्त्र बलों का ऐतिहासिक पुनर्गठन कहा जा सकता है.

यह उस वक्त किया जा रहा है जब दुनिया का छठा परमाणु हथियार संपन्न देश सुरक्षा की जबरदस्त चुनौतियों से घिरा है. आजादी के बाद से भारत ने खुद को दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना, चौथी सबसे बड़ी वायु सेना और सातवीं सबसे बड़ी नौसेना के तौर पर विकसित और निर्मित किया है. साथ ही, उसके पास आयुध कारखानों, रक्षा युद्धपोत कारखानों और एयरक्राफ्ट एसेंबली लाइनों के साथ विशालकाय सैन्य औद्योगिक प्रतिष्ठान है.

जीत की जंग
जीत की जंग

भू-रणनीतिक दुश्मन
आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा परिदृश्य के मोटे तौर पर चार व्यापक दौर बताए जा सकते हैं. पहला 1947-48 में आजादी और कश्मीर की लड़ाई के साथ शुरू हुआ और 1962 तक चला. चीन के साथ युद्ध में भारतीय सेना की हार के नतीजतन रक्षा खर्च बढ़ाया गया और सैन्य बलों को आधुनिक बनाने की शुरुआत हुई. इस नए जोशो-खरोश से भरी सैन्य मशीन ने फिर 1965 में पाकिस्तान के हमले को भोथरा कर दिया और आखिरकार 1971 में पूरब में हुए ताबड़तोड़ युद्ध में उसे चारों खाने चित करके बांग्लादेश के निर्माण का रास्ता साफ कर दिया.

तीसरा दौर तब शुरू हुआ जब पाकिस्तान ने परमाणु हथियार की खोज शुरू की और 1980 के दशक के शुरुआती वर्षों में चीन की मदद से हासिल कर लिया. इसके नतीजतन भारत को ठंडे बस्ते में पड़ा अपना परमाणु हथियार कार्यक्रम फिर शुरू करना पड़ा. 1980 के दशक में अफगानिस्तान में सोवियत संघ को लहूलुहान कर देने वाली और अमेरिका के पैसों से लड़ी गई प्रच्छन्न लड़ाई से नए हुनर हासिल करके पाकिस्तानी सेना ने फिर अपनी निगाहें भारत से सटी पूरबी सरहदों पर गड़ा दीं. उसने एक नई रणनीति बनाई जिसे ‘तलवार और ढाल’ रणनीति कहा जा सकता है.

इसमें तलवार आतंकवादियों और तथाकथित ‘गैर-सरकारी कारिंदों’ की थी जिसके जरिए उसने पहले पंजाब और फिर जम्मू-कश्मीर में छद्म जंग छेड़ दी, जिससे हजारों घाव लगे. परमाणु हथियार और उसके इस्तेमाल की खुल्लमखुल्ला धमकियां उसकी ढाल थीं, जिसने भारत की पारंपरिक प्रतिक्रिया को भोथरा कर दिया लगता था.

पिछले साल आधुनिक बन चुकी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अपनी दो डिविजन लामबंद कर दीं और उनकी मदद से उसकी टुकडिय़ों ने बहुत-सी जगहों पर घुसपैठ कर ली. दो मोर्चों पर युद्ध का बढ़ता खतरा, जो माओ त्से तुंग के बाद चीन के सबसे ताकतवर सैन्य नेता राष्ट्रपति शी जिनपिंग के मातहत नए जोशो-खरोश से भरी चीनी सेना और उसके सहयोगी देश पाकिस्तान की तरफ से पैदा हुआ है.

भारतीय सशस्त्र बलों के लिए चौथा और सबसे अहम दौर है. कार्नेगी एंडोवमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के सीनियर फेलो एश्ले जे. टेलिस कहते हैं कि भारत का वास्ता अब एक ऐसी मुश्किल से है जिसका सामना उसने पहले कभी नहीं किया और वह है—ऐन अपने दरवाजे पर एक महाशक्ति देश.

ठप पड़ा सैन्य-औद्योगिक प्रतिष्ठान
भारत की सुरक्षा चुनौतियां जटिल हैं और कोई भी दूसरा वैश्विक लोकतंत्र ऐसी चुनौतियों से नहीं घिरा है. इनसे निपटने के लिए बेशक बहुत ज्यादा संसाधन चाहिए. मसलन, सारी खूबियों से लैस राफेल लड़ाकू विमान की लागत 1,000 करोड़ रुपए से ज्यादा आती है. एक वक्त भारतीय वायु सेना (आइएएफ) 126 राफेल चाहती थी. कहा जा सकता है कि सरहद पर चीन का निर्णायक गेमप्लान और पाकिस्तान के साथ उसका सामरिक गठजोड़ एक और बेहद पेचीदा युद्ध है. राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के पूर्व सदस्य ब्रिगेडियर कुलदीप सिंह (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ‘‘यह पक्का करने के लिए है कि हमारे रक्षा खर्च मुश्किल और लंबी तैनातियों में खप जाए और हम (सेनाओं को) आधुनिक न बना पाएं.’’

तिस पर भी भारत की ढाई मोर्चों की चुनौतियां (आधा मोर्चा बगावत-विरोधी तैनाती का है) ऐसी नहीं हैं जिन्हें महज पैसा फेंककर हल किया जा सके. भारत पहले ही रक्षा पर सबसे अधिक खर्च करने वाला दुनिया का पांचवां देश है, जिसने पिछले साल 4.7 लाख करोड़ रुपए खर्च किए. रक्षा खर्च सरकार के कुल खर्च का 15 फीसद से भी ज्यादा और कर्ज की किस्तों के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्च है.

वह भी तब जब इसमें परमाणु हथियारों और उनके डिलिवरी प्लेटफॉर्म, मसलन चार परमाणु शक्ति संचालित बैलिस्टिक मिसाइल पनडुब्बियां, तैयार करने पर होने वाला सालाना सरकारी खर्च शामिल नहीं है. इस एक परियोजना पर ही 1 लाख करोड़ रुपए की लागत आने का अनुमान है. भारत का विशालकाय सैन्य-औद्योगिक प्रतिष्ठान ठप पड़ा है और उन अत्याधुनिक हथियारों का निर्माण नहीं कर रहा है जिनकी सशस्त्र बलों को दरकार है.

इसी के चलते साल-दर-साल विदेशों से हथियार खरीदने पड़े, जिन्होंने 2014 और 2019 के बीच भारत को दुनिया में रक्षा साजो-सामान का दूसरा सबसे बड़ा आयातक बना दिया, जिसका दुनिया की कुल हथियार बिक्री में 9.5 फीसद हिस्सा था. इसमें कुछ राजनैतिक फैसलों का भी योगदान रहा.

हालांकि हथियारों के आयात से सशस्त्र बलों की क्षमता जरूर एकाएक बढ़ जाती है, लेकिन ये लंबे वन्न्त में कलपुर्जों और अपग्रेड पर निर्भरता भी पक्की कर देते हैं. यह बदतरीन वक्त में मुश्किल साबित हो सकता है और राष्ट्रीय सुरक्षा का संकट पैदा कर सकता है.

भारत की समस्या खर्चों की प्राथमिकता तय करने और उसके सशस्त्र बल द्वारा एकीकृत थिएटर में अपने परिचालनों में तालमेल बिठाने के बजाय साथ मिलकर लडऩे की योजना बनाने की है. उसे अपने सैन्य-औद्योगिक प्रतिष्ठान में सुधार लाने, अधिक आत्मनिर्भरता विकसित करने और सैन्य साजो-सामान का निर्यातक बनने की जरूरत है.

इस तरह भारत अपने बुढ़ाते सैन्य साजो-सामान को आधुनिक बनाने, अपने को आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने सैन्य साजो-सामान को देश में ही बनाने और अपनी लड़ाकू ताकत को इस तरह सुसंगत बनाने की जरूरत है ताकि वह सुरक्षा खतरों से अपनी सरहदों की रक्षा करना पक्का कर सके. उजला पहलू यह है कि आजादी के बाद पहली बार इन कामों का अहसास किया गया है और इनके लिए समय सीमाएं तय की गई हैं. इन्हें हासिल करने तक इस राह पर लगातार आगे बढ़ते रहना बेशक सबसे बड़ी चुनौती होगी.

75 वें वर्ष का एजेंडा
स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देकर और देश को रक्षा उपकरणों का हब बनाकर आत्मनिर्भर भारत पहल को कामयाब बनाएं
सशस्त्र बलों का 17 एकल सैन्य कमांड से पांच एकीकृत कमांड में बदलने का काम करें
अगले पांच साल में रक्षा मैन्यूफैक्चरिंग में 25 अरब डॉलर (1.8 लाख करोड़ रुपए) के टर्नओवर का लक्ष्य साकार करें. इसमें 5 अरब डॉलर (36,460 करोड़ रुपए) के सैन्य हार्डवेयर निर्यात भी शामिल हैं.
भारतीय उद्योग को हर साल 50,000 करोड़ रुपए के ऑर्डर और रक्षा क्षेत्र में स्वचालित मार्ग के तहत एफडीआइ 49 % से बढ़ाकर 74 %
करने की प्रतिबद्धता
सैन्य हार्डवेयर प्राप्त करने को प्राथमिकता देने के लिए एकीकृत क्षमता विकास योजना. इसकी उपलद्ब्रधता तेज करने और सुगम बनाने के लिए रक्षा पूंजी प्राप्ति योजना लाएं

‘‘चीन की सरहद पर धमक और पाकिस्तान के साथ उसका गठजोड़ एक दूसरा मारक छद्म युद्घ है, जो बड़ी चुनौती है.’’

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