
इस साल 7 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर प्रदेश में खुर्जा और भाऊपुर के बीच 351 किलोमीटर के खंड को वाणिज्यिक संचालन के लिए अधिकृत किया. इसके साथ डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (डीएफसी) या समर्पित माल ढुलाई गलियारा परियोजना के पहले चरण की शुरुआत हुई. पूर्वी और पश्चिमी गलियारे मिलकर देश की कुल माल ढुलाई का 70 प्रतिशत हिस्सा संभालेंगे और इसके 2022 तक चालू होने की उम्मीद है.
भारतीय रेलवे लंबे समय तक अकुशल संचालन, बुनियादी ढांचे के धीमे विकास और वित्तीय रूप से अव्यवहार्य परियोजनाओं के कारण बेहाल रहा है. रेलवे बोर्ड, ट्रेनों के स्वामित्व और संचालन के लिए निजी खिलाड़ियों के लिए अपने दरवाजे खोलने पर गंभीरता से विचार कर रहा है. पिछले साल 1 जुलाई को 109 रूटों पर 151 यात्री ट्रेनें का मालिकाना हक रखने, डिजाइन, निर्माण, वित्त और संचालन के लिए निजी खिलाडिय़ों को आमंत्रित करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी. इसी तर्ज पर निजी मालगाड़ियों को चलाया जाएगा.

निजी पूंजी के लिए अवसर के साथ, रेलवे अपने पैसे का उपयोग बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और अगले दशक में नए और दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंचने के लिए कर सकता है. पिछले साल, सरकार ने कहा था कि बुनियादी ढांचा दुरुस्त करने के लिए रेलवे को अगले दशक में 50 लाख करोड़ रुपए की आवश्यकता होगी. 2016 से चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं जब अतिरिक्त-बजटीय धन की व्यवस्था की गई और रेलवे ने सुधारों की शृंखला शुरू की, साथ ही 200 से अधिक परियोजनाओं को पूरा करने के लिए पूंजी के प्रबंध की योजनाएं बनाईं.
पिछले सितंबर में रेलवे बोर्ड का पुनर्गठन और पुनर्निर्माण एक अन्य महत्वपूर्ण सुधार है जो सितंबर 1951 के बाद पहली बार किया गया. बोर्ड के चेयरमैन विनोद कुमार यादव को सीईओ बनाया गया. उन्हें सर्वसम्मति न बनने की स्थिति में सदस्यों के राय की अनदेखी करके अपनी समझ से निर्णय लेने का अधिकार मिला है. आखिर, निर्णय लेने की प्रक्रिया का सरल हो जाना भी तो सुधार की दिशा में हुए किसी भी प्रयास की आधी जंग जीत लेने जैसा ही है.

