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विशेषांकः अचानक, मुझे नहीं पता था कि मैं क्या था और क्या नहीं...

...मेरे शरीर की हर कोशिका एक नए, अव्यक्त आनंद की अनूभूति से उत्तेजित थी. वह मेरा पहला आध्यात्मिक अनुभव था’’

सद्गुरु जग्गी वासुदेव
सद्गुरु जग्गी वासुदेव
अपडेटेड 31 जनवरी , 2021

जिंदगी का निर्णायक पल
सद्गुरु जग्गी वासुदेव, 63 वर्ष

धर्मगुरु को 1982 में पहले आध्यात्मिक अनुभव से यह विश्वास जगा कि यह किसी के साथ हो सकता है. उससे उन्हें अंतत: ईशा फाउंडेशन शुरू करने की प्रेरणा मिली, जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक कल्याण की दिशा में अग्रसर एनजीओ है

सद्गुरु जग्गी वासुदेव एक पहेली हैं. कोई सुने ''धर्मगुरु’’ तो ख्याल में चमड़े का परिधान पहने किसी बाइकर की छवि तो नहीं उभर सकती. लेकिन इसी वजह से 73 साल के उम्रदराज अक्तूबर में सुर्खियों में उछले, उत्तरी अमेरिका के आर-पार 10,000 मील की मोटरसाइकिल यात्रा के लिए.

धर्मगुरु, योग गुरु और एक गैर-लाभकारी आध्यात्मिक संगठन ईशा फाउंडेशन के संस्थापक वासुदेव पर्यावरण संरक्षण के अपने प्रयासों के लिए भी सु‌र्खियों में रहे हैं. जनवरी में उन्हें स्विट्जरलैंड के डावोस में आयोजित वल्र्ड इकोनॉमिक फोरम में 'चैंपियंस फॉर वन ट्रिलियन ट्रीज’ प्लेटफॉर्म पर बोलने के लिए आमंत्रित किया गया. स्वदेश में 'कावेरी कॉलिंग’ के नाम से चल रही उनकी परियोजना में किसानों को तमिलनाडु और कर्नाटक में कावेरी बेसिन में 242 करोड़ पेड़ लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है.

वासुदेव की कहानी किसी पौराणिक कथा सरीखी लगती है. मैसूरू में बचपन में वासुदेव अन्य बच्चों से अलग थे. 12 साल की उम्र में जब उनकी उम्र के लड़के खेल-कूद में रुचि लेते थे, वे मल्लदीहल्ली राघवेंद्र से योग सीख रहे थे. वे अंग्रेजी साहित्य की पढ़ाई में जुटे, लेकिन अंतत: अपना पोल्ट्री फार्म और बाद में एक कान्स्ट्रक्शन कंपनी स्थापित करने के लिए उन्होंने शैक्षणिक महत्वाकांक्षाओं को छोड़ दिया. 25 वर्षीय वासुदेव का जीवन बड़े आनंद के साथ बीत रहा था कि 1982 की एक दोपहर अचानक सब कुछ बदल गया.

वह 23 सितंबर था, जब मैसूरू के चामुंडी हिल्स में एक चट्टान पर बैठे वासुदेव को अपना पहला आध्यात्मिक अनुभव हुआ था. वासुदेव बताते हैं, ''अचानक, मुझे पता ही नहीं चल रहा था कि मैं क्या हूं और क्या नहीं. मैं खुद को चारों तरफ देख रहा था. मेरे शरीर में हर कोशिका परमानंद के एक नए, अवर्णनीय स्तर के साथ प्रस्फुटित हो रही थी.’’ उस क्षण तक वासुदेव ने खुद को 'आध्यात्मिक’ नहीं माना, उन्होंने खुद को 'अति शंकालु’ युवा ही समझा था. हालांकि जब वे साढ़े चार घंटे बाद उस जगह से उठे, तब तक उनमें एक नए ज्ञान के प्रस्फुटन जैसा कुछ हो चुका था.

यह मानते हुए कि ऐसा किसी के भी साथ और हर किसी साथ हो सकता है, वासुदेव अपने अनुभव को लोगों के साथ साझा करना चाहते थे. उन्होंने योग को अपना माध्यम बनाने की सोची. 1982 में मैसूरू में आयोजित उनके पहले सत्र में केवल सात लोगों ने भाग लिया और वह भी बहुत समझाने के बाद. वे कहते हैं, ''कुछ जिज्ञासा से आए और कुछ विनम्रतावश.’’ लेकिन जिसे रोजाना दो घंटे वाला चार दिनों का सत्र होना था, वह छह घंटे प्रतिदिन के पांच दिवसीय सत्र में बदल गया.

और फिर क्या था. उन्होंने वहां से पीछे मुड़कर नहीं देखा. वासुदेव ने अपने व्यवसाय को बंद किया और अपना पूरा ध्यान गहन साधना के क्षेत्र 'ध्यानलिंग’ पर केंद्रित किया. करीब एक साल में उन्होंने अपने आपको सभी तरह की गतिविधियों से अलग कर लिया. वे बताते हैं, ''कई प्रक्रियाएं थीं जो अभी भी मेरे भीतर खुद को स्थापित कर रही थीं. हर प्रक्रिया एक उपद्रव जैसी महसूस होती थी, इसलिए मैं कई दिनों तक सिर्फ बैठा रहा.’’

तब से सद्गुरु ने दुनियाभर में हजारों अनुयायी बनाए है. हॉलीवुड अभिनेता विल स्मिथ सहित कई हस्तियां उनसे प्रभावित हैं. हालांकि हाल ही में वे नारीवाद पर अपनी विवादित टिप्पणी के लिए चर्चा में थे. उनकी वेबसाइट पर 'हाउ टु एम्पावर वीमेन’ शीर्षक से प्रकाशित एक लेख में उनके द्वारा दिए गए विवरणों को भ्रामक और महिलाओं से द्वेष की भावना से ओत-प्रोत बताया गया.

मैसूरू में उनके पहले सत्र में सिर्फ सात लोग आए, लेकिन जो रोजाना दो घंटे का चार दिन का सत्र होना था, वह छह-छह घंटे कापांच दिन का हुआ.

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