जिंदगी का निर्णायक पल
किरण मजुमदार शॉ, 67 वर्ष
इस प्रशिक्षित मास्टर ब्रूअर को दिग्गज शराब निर्माता कंपनियों ने खारिज कर दिया इसलिए इन्होंने अपनी खुद की कंपनी खोली. बाद में उन्होंने एंजाइम्स में प्रयुक्त प्रौद्योगिकी का प्रयोग अपनी कंपनी बायोकॉन में किया जो कालांतर में बायोफार्मास्यूटिकल्स की दिग्गज बन गई
चुनौती देने का माद्दा, हौसला, खुद में भरोसा और विजन हो तभी आप कुछ ऐसा रचते हैं जो जिंदगियां बदल सके. बायोकॉन लिमिटेड की चेयरपर्सन और मैनेजिंग डायरेक्टर 67 वर्षीया किरण मजुमदार-शॉ इस सबके जोरदार मेल के अलावा भी बहुत कुछ हैं. 1970 के दशक के हिंदुस्तान में महिलाओं के खुद अपना कारोबार खड़ा करने की आखिर कितनी कहानियां सुनने को मिलती हैं. मजूमदार की कहानी बाहरी, उथल-पुथल पैदा कर देने वाली शख्सियत की कहानी है जिसने कई बार खारिज कर दिए जाने के बाद यह सब किया.
असल में इसी ने उन्हें भारत की पहली बायोटेक्नोलॉजी कंपनी बनाने के लिए उकसाया. अपने बीते सालों पर नजर डालते हुए, उनकी जिंदगी में एक अहम मोड़ तब आया जब वे ब्रूइंग या निसवन विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए ऑस्ट्रेलिया गईं. उनके पिता दिवंगत रसेंद्र मजूमदार को यकीन था कि करियर के लिए यह पढ़ाई अच्छी होगी. वे कहती हैं, ''मैंने फर्मंटेशन साइंस और बायोइंजीनियरिंग के बारे में इतना कुछ सीखा कि आज भी मेरा पूरा कारोबार और मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं इन्हीं दोनों क्षेत्रों को लेकर हैं.’’
वे अपने को इत्तेफाकन उद्यमी कहती हैं. मास्टर ब्रूअर की नौकरी के लिए भेजी गई अर्जियों के खारिज कर दिए जाने के बाद उन्होंने अपना काम शुरू करने का फैसला लिया. महज 25 साल की उम्र में, एक महिला, जिसकी कोई कारोबारी पृष्ठभूमि नहीं थी, महज 10,000 रुपए की शुरुआती पूंजी के साथ, उस क्षेत्र में कारोबार खड़ा करने उतर पड़ी जिसकी समझ तक बस कुछेक लोगों को ही थी. जाहिर है वे ढेर सारी विषमताओं के बीच काम कर रही थीं. वे याद करती हैं, ‘‘मैं बहुत बड़ा जोखिम थी. मैं युवा थी, न पैसा, न अनुभव, न वेंचर फंड. ज्यादातर आंत्रप्रेन्योर अधेड़ उम्र के आदमी थे जो रिटायर हो चुके थे. यह वक्त स्टार्ट-अप के लिए नहीं था.’’
मगर मजुमदार-शॉ स्वीकार करती हैं कि वे दिलेर और विद्रोही थीं, क्योंकि वे दुनिया के सामने साबित करना चाहती थीं कि एक महिला वाकई सब कुछ कर सकती है. दूसरा बड़ा मोड़ तब आया, जब नए-नए और उथल-पुथल मचाने वाले काम करने की अपनी फितरत के चलते उन्होंने एक ऐसी टेक्नोलॉजी में निवेश किया जिसका कोई सरपरस्त नहीं था, कम से कम कुछ वन्न्त के लिए तो नहीं ही था. यह थी प्रयोग से लेकर संयंत्र लगाने तक के स्तर तक सोलिड सब्स्ट्रैट फर्मंटेशन टेक्नोलॉजी.
तभी शॉ को आइसीआइसीआइ बैंक के पूर्व चेयरमैन नारायणन वघुले की शक्ल में एक सहयोगी मिल गया. मजुमदार-शॉ ने इंडिया टुडे को बताया, ''वघुले ने एक वेंचर फंड शुरू किया था और मुझसे कहा कि मेरी कंपनी ठीक उसी तरह का कारोबार है जिसकी वे निवेश के लिए तलाश कर रहे थे. वह निवेश मेरे लिए निर्णायक क्षण बन गया. अपनी टेक्नोलॉजी को उन्नत करने के लिए मुझे कर्ज के बजाए निवेश मिला.’’ इस निवेश ने बायोकॉन को इतनी ऊंची उछाल दी कि वह एंजाइम टेक्नोलॉजी में अगुआ कंपनी बन गई.
बाद में जब उन्होंने एंजाइम कारोबार छोड़ा तो उनकी बनाई बौद्धिक संपदा ने उन्हें अच्छा-खासा मुनाफा कमाने में मदद की. उनका दूसरा मोड़ 2000 में आया जब उन्होंने एंजाइम के लिए बनाई अपनी टेक्नोलॉजी का फायदा उठाते हुए इसका इस्तेमाल बायोफार्मास्यूटिकल्स के लिए किया. बायोकॉन दुनिया भर में पिकिआ एक्सप्रेशन सिस्टम पर (आरएच-इंसुलिन) विकसित करने वाली पहली कंपनी बन गई और उसने यूएसएफडीए (यूनाइटेड स्टेट्स फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) का अनुमोदन हासिल किया.
मजुमदार-शॉ अपने कंफर्ट जोन से बाहर जाने के लिए अब भी खुद पर जोर डालती रहती हैं. अपने दम पर कामयाबी हासिल करने वाली भारत की यह पहली महिला उद्यमी कहती हैं, ''मैं नए विचार को पहचान पाती हूं और उन विचारों को नया रूप देकर बाजार में ले जा पाती हूं. यही मुझे उद्यमी के तौर पर परिभाषित करता है. मैं जोखिम लेने को तैयार थी और खुद अपनी जगह रचना चाहती थी.’’ बायोकॉन इंडिया की शुरुआत 1978 में आयरलैंड की बायोकॉन बायोकेमिकल्स की सहयोगी कंपनी के तौर पर बेंगलूरू के कोरामंगला में एक किराए के शेड से तीन कर्मचारियों के साथ हुई थी.
पहला निर्यात 1979 में मुमकिन हुआ जब कंपनी ने पपीते से निकाले एंजाइम पापैन अमेरिका और यूरोप को निर्यात किया. 1981 में शॉ ने होसुर रोड पर बायोकॉन के कैंपस का निर्माण शुरू किया. 1989 में यूनिलीवर ने बायोकॉन की आयरिश मातृ कंपनी का अधिग्रहण कर लिया और उन्हें अपनी कंपनी में यूनिलीवर की हिस्सेदारी खरीदने के लिए 1998 तक इंतजार करना पड़ा.
मजूमदार-शॉ की जोखिम लेने की क्षमता ने कई बार उनके निवेशकों को हैरान किया है, लेकिन वे कहती हैं, ''मेरा फलसफा गैरमामूली और गैरपारंपरिक काम करने का है...और अगर आपको लगता है कि मेरे पास अच्छी रणनीति है तभी मुझमें निवेश कीजिए.’’
उन्हें मिली वाहवाहियों और इनामों में 2002 में मजूमदार-शॉ को दुनिया की 100 सबसे ताकतवर महिलाओं की फोर्ब्स की फेहरिस्त में शुमार किया गया. यह उस रास्ते को दी गई मान्यता थी जो उन्होंने दुनिया भर की महिलाओं के लिए बनाया है.

