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‘‘सबने सोचा, जेल आइजी का पद सजा जैसा है...

...लेकिन मैं दिल से जानती थी कि यह मेरे लिए सही है. मैं हमेशा से सुधार-उन्मुख स्वभाव की रही हूं’’

लेफ्टिनेंट गवर्नर किरण बेदी
लेफ्टिनेंट गवर्नर किरण बेदी
अपडेटेड 27 जनवरी , 2021

जिंदगी का निर्णायक पल
किरण बेदी, 71 वर्ष

उन्होंने जेलों की महानिरीक्षक रहते हुए 1993 में जिन सुधारों को लागू किया, उनकी वजह से उन्हें उसके अगले साल मैगसेसे पुरस्कार मिला. पुदुच्चेरि की लेफ्टिनेंट गवर्नर के तौर पर भी उन्होंने अपने सुधारवादी उत्साह को जारी रखा है

पहली महिला जिसने भारतीय पुलिस सेवा (आइपीएस) में अफसर का पद पाया हो, से लेकर पुदुच्चेरि की लेफ्टिनेंट गवर्नर बनने तक, किरण बेदी खुद में एक संस्थान हैं. अपने करियर के दौरान, उन्होंने भारत और विदेशों में जेल सुधारों की शुरुआत की और मानवतावादी पुलिसिंग का खाका तैयार किया. उनकी निडरता की वजह से बेदी की खास प्रतिष्ठा रही है. अपने करियर के जरिए, उन्होंने लाखों युवतियों को दिखाया है कि पुलिस प्रशासन में महिलाएं भी पुरुषों की तुलना में अगर बेहतर नहीं, तो बराबर पायदान पर जरूर खड़ी हो सकती हैं.

बेदी तीन महत्वपूर्ण पड़ावों का जिक्र करती हैं, जिन्होंने उन्हें बनाया. इनमें से एक तब हुआ जब वह महज आठ या नौ साल की थीं. एक दिन, जब वे अपने परिवार के साथ बैठी थीं, तो एक महिला उनके पिता, प्रकाश पेशावरिया के पास मदद मांगने आई. महिला का कहना था कि उसके पति को अन्यायपूर्ण तरीके से गिरफ्तार कर लिया गया है. उनके पिता ने अमृतसर के एसएसपी (सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस) को कॉल किया और उनसे उस महिला से मिलने और मामले को देखने को कहा.

बेदी कहती हैं कि उनके पिता के शब्द थे: ''प्लीज उसकी बात सुनिए और देखिए कि उसके साथ कोई अन्याय न हो.’’ उन्होंने गौर किया कि उनके पिता ने यह नहीं कहा कि ‘उसे (महिला के पति को) छोड़ दो’—इस बात ने बेदी को कई संदेश दिए. वे कहती हैं, ''पुलिस (व्यवस्था) को लेकर यह मेरा पहला परिचय था. (इसने दिखाया) कि यह अन्याय को सुधार सकती है. इसने मुझे बताया कि असर की ताकत से अन्याय को सुधारा जा सकता है. मेरे पिता प्रतिक्रिया देने में बहुत तेज थे—अब मैं भी वैसी ही हूं.’’ 

उनके लिए अगला टर्निंग पॉइंट 12 साल की उम्र में आया. वे उन दिनों अपने अभिभावकों के साथ शादियों में जाया करती थीं. वे याद करती हैं कि तब लड़की के परिवार वाले जो दहेज देते थे उसे खूब सजाकर सामने रखा जाता था—उनके पिता उनसे कहते थे कि ऐसी लड़कियां जो आत्मनिर्भर नहीं होती हैं उनकी शादी दहेज के साथ करनी होती है.

वे कहती हैं, ''मैंने इसे खारिज कर दिया और अपने पिता से कहा कि मैं ऐसा नहीं चाहती. मैं दहेज के विचार से ही नफरत करने लगी—मैं आत्मनिर्भर होने के लिए पली-बढ़ी हूं, और मैंने तय किया कि मैं ऐसा अपनी जिंदगी में नहीं होने दूंगी. जब मेरी शादी हुई, मेरे पति और मैंने शादी की रिसेप्शन का खर्च खुद दिया.’’

स्वावलंबन और अनुशासन की भावना उनके खेल करियर में भी दिखी—अपने ही रिसेप्शन के दिन, बेदी ने पहले एक मैच खेला और तब उस उत्सव में शामिल हुईं. वह पहले टेनिस को लेकर इतनी समर्पित थीं कि राष्ट्रीय जूनियर चैंपियन भी बनीं. इसकी वजह से उनके जीवन में एक और टर्निंग पॉइंट आया और तब वह 16 साल की थीं. राष्ट्रीय चैंपियन के तौर पर उन्हें उम्मीद थी कि उन्हें विंबलडन में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिलेगा, पर उनकी उपेक्षा कर दी गई.

वे कहती हैं, ‘‘इसने मुझे अकादमिक जगत में करियर बनाने की प्रेरणा दी. उन दिनों यह चलन में था कि राष्ट्रीय जूनियर चैंपियन विंबलडन (खेलने) जाता था पर मुझे यह मौका नहीं दिया गया. वह मेरे लिए अहम मोड़ था—मैंने अकादमिक प्रतिभा के दम पर आगे बढऩे का फैसला लिया.’’

बेदी की शैक्षणिक उत्कृष्टता, सेवा की भावना और खिलाडिय़ों जैसी लगन ने उनके आगे बढऩे का रास्ता तैयार कर दिया. आइपीएस अफसर बनने के बाद उन्होंने कई क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दीं, इनमें से सबसे अहम पूर्वोत्तर का इलाका रहा. 1993 में जब उनकी पोस्टिंग दिल्ली में हुई, तो उन्हें जेल महानिरीक्षक (आइजी) के पद का प्रस्ताव मिला.

वे कहती हैं, ''वह एक पनिशमेंट पोस्टिंग माना जाता था. कोई इसे लेना नहीं चाहता था. आज यह पुलिस कमिशनर के बराबर का पद है. उन दिनों, हर कोई मुझसे पूछता, मैं इसे क्यों कर रही हूं. मैं जानती थी कि मैं सही जगह जा रही हूं. मैं दिल से एक सुधारवादी, सुधारक, शिक्षक और समाजशास्त्री हूं.’’

इस पद पर आने के करीब एक साल बाद, बेदी ने जो जेल सुधार लागू किया थे उसकी वजह से 1994 में उन्हें प्रतिष्ठित मैगसेसे पुरस्कार मिला. वे कहती हैं, ''पहली बार यह शांति पुरस्कार किसी पुलिस अफसर को दिया गया था.’’ उनके सुधारों ने भारत में पुलिस व्यवस्था का नया अध्याय खोल दिया, जो अधिक मानवीय था.

2003 में वे ऐसी पहली महिला बनीं जिन्हें तब के संयुन्न्त राष्ट्र महासचिव कोफी अन्नान के अधीन संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के विभाग का नागरिक पुलिस सलाहकार बनाया गया. वे कहती हैं, ''इसने मुझे ग्लोबल पुलिसकर्मी बना दिया.’’ उस भूमिका में, उन्होंने सूडान, कांगो और साइप्रस जैसे कई देशों में पुलिस व्यवस्था के सुधार में अपना योगदान दिया.

71 साल की उम्र में भी बेदी की ऊर्जा प्रेरक है—वे इंस्टाग्राम पर सुबह की प्रेरणादायी बुलेटिन करती हैं और ट्रेडमिल पर चलते हुए अखबार पढ़ती हैं. चौड़ी मुस्कान के साथ वे कहती हैं, ''मैं लेफ्टिनेंट गवर्नर की अपनी मौजूदा भूमिका को भी अपनी जिंदगी में एक टर्निंग पॉइंट की तरह देखती हूं.’’ अब हम सिर्फ इंतजार कर सकते हैं कि उनका यह टर्निंग पॉइंट उन्हें कहां लेकर जाता है. 

''जब भी मैं किसी को गिरफ्तार करती थी तो मुझे पता चल जाता था कि उसने वह अपराध क्यों किया है. मैं दिल से सुधारवादी, सुधारक, शिक्षक और समाजशास्त्री हूं’’.

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