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जड़ें जमाती भाजपा

भाजपा की जीत में योगदान देने वाला सबसे बड़ा कारक रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता. इसने कृषि ऋण माफी, बढ़ी हुई कीमतों पर धान की खरीद, राज्य की कांग्रेस सरकार की नई नौकरियों की घोषणा जैसे सभी स्थानीय मुद्दों को पीछे छोड़ दिया.

शिकस्त मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
शिकस्त मुख्यमंत्री भूपेश बघेल
अपडेटेड 29 मई , 2019

साल 2000 में अस्तित्व में आने के बाद छत्तीसगढ़ ने पहली बार विधानसभा और लोकसभा चुनावों में अलग-अलग निर्णय दिया है. राज्य में इससे पहले तीन बार विधानसभा चुनावों के ठीक बाद लोकसभा चुनाव हुए थे जिसमें मतदाताओं ने भाजपा के प्रति लोकसभा में विश्वास जताया था.

2004, 2009 और 2014 में पार्टी को राज्य की कुल 11 में से 10 लोकसभा सीटें दीं जबकि कांग्रेस को हर बार सिर्फ एक सीट मिलती रही. दिसंबर 2018 में कांग्रेस ने प्रदेश के 18 साल के इतिहास में अब तक का सबसे बड़ा जनादेश (राज्य की 90 सीटों में से 68) हासिल किया और उसे उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव में भी बढ़त मिलेगी. पर कांग्रेस कहां मात खा गई?

भाजपा की जीत में योगदान देने वाला सबसे बड़ा कारक रहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता. इसने कृषि ऋण माफी, बढ़ी हुई कीमतों पर धान की खरीद, राज्य की कांग्रेस सरकार की नई नौकरियों की घोषणा जैसे सभी स्थानीय मुद्दों को पीछे छोड़ दिया. दक्षिण छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया और बस्तर तथा कांकेर को छोटे अंतरों से गंवाया. इसने कोरबा सीट जीती, लेकिन उत्तरी और मध्य क्षेत्र मोदी लहर में कांग्रेस के हाथ कुछ नहीं आया.

भाजपा ने छत्तीसगढ़ में इस आम चुनाव में कुछ सख्त फैसले भी लिए. इसने सभी 10 मौजूदा सांसदों का टिकट काट दिया जिसमें राजनांदगांव के सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह, रायगढ़ से केंद्रीय मंत्री विष्णु देव साय और पूर्व केंद्रीय मंत्री तथा रायपुर के सांसद रमेश बैस भी शामिल थे.

भाजपा की राज्य इकाई के विश्वस्त सूत्र बताते हैं कि ऐसा राज्य में पूरी तरह से नए नेतृत्व के निर्माण के लिए किया गया. भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और रायपुर से निर्वाचित भाजपा सांसद सुनील सोनी कहते हैं, ''यह पीएम मोदी की राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं पर जनता के विश्वास की मुहर है. दिसंबर में कांग्रेस ने जो जनादेश हासिल किया था वह अब उसके हाथ से निकल चुका है.''

छत्तीसगढ़ में कई मुद्दे हैं जिन पर केंद्र के साथ मिलकर काम करने की आवश्यकता है. उनमें से एक माओवाद है जो अर्धसैनिक बलों की भारी तैनाती के कारण लंबे समय तक खामोश रहने के बाद फिर सिर उठाने लगा है. दूसरे, विकास परियोजनाओं के लिए बड़ी संक्चया में पर्यावरण और खनन जैसे केंद्रीय मंत्रालयों की मंजूरी की जरूरत होगी.

पड़ोसी राज्यों के साथ कई लंबित मुद्दे हैं, जिनमें केंद्र के हस्तक्षेप और मध्यस्थता की जरूरत है. दंतेवाड़ा में उपचुनाव भी होगा, जहां चुनाव के दौरान माओवादियों ने भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या कर दी थी. उपचुनाव नतीजे इस बात का संकेत देंगे कि कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव के बाद से लेकर अब तक भाजपा के लिए कितनी जगह खाली की है.

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