भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अर्धेंदु भूषण बर्धन ने जब 14 जुलाई, 2008 को यूपीए सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त में एक सांसद की कीमत 25 करोड़ रु. लगाए जाने का आरोप लगाया था, तो यह राजनेताओं की आर्थिक महत्वाकांक्षा में आई जबरदस्त उछाल का अद्भुत नमूना था. इसकी पुष्टि कुछ हद तक 22 जुलाई, 2008 को मनमोहन सरकार के विश्वास मत के दौरान विपक्ष के सांसदों के पाला बदलने से होती दिखी. यह भ्रष्टाचार में एक युग के बदलाव के जैसा था क्योंकि जुलाई, 1993 में नरसिंह राव की सरकार को बचाने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा के चार सांसद चंद लाख रु. में बिक गए थे. तब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री की कुर्सी पर थे, लेकिन जब वैसा ही संकट खुद सिंह के प्रधानमंत्री के काल में आया तो धन का पैमाना बिलकुल बदल चुका था.
लवासा से फोन पर इंडिया टुडे से बातचीत में पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी तब और अब सामने आ रहे घोटालों में 'स्केल’ को बिल्कुल अलग करार देते हैं. वे कहते हैं, ''उस समय बहुत कम ऐसी चीजें उभरकर सामने आती थीं, इसलिए उन चीजों का असर भी ज्यादा होता था. लेकिन अब तो जिस चीज में देखो वहीं भ्रष्टाचार है. यह कैंसर के फोर्थ डिग्री की तरह फैल गया है.”
महाराष्ट्र में 1981 में 30 करोड़ रु. के सीमेंट घोटाले में शामिल होने के आरोप के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री ए.आर. अंतुले की कुर्सी छिन गई थी. लेकिन अब कोयला घोटाला हो या 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, मापंदड ही बदल चुका है. कोयला खदान आवंटन में कैग ने 1,85,000 करोड़ रु. का तो 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में 1,76,000 करोड़ रु. के नुकसान का अनुमान दिया. इनमें सीधे पीएम पर उंगली उठी तो पूर्व संचार मंत्री ए. राजा को जेल जाना पड़ा. संसदीय इतिहास में यह पहला मौका था जब सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री कार्यालय से जवाब-तलब कर हलफनामा मांग लिया.
शीर्ष स्तर पर बैठे नेताओं पर अब इस तरह सीधे उंगली उठाए जाने पर शौरी कहते हैं, ''पहले के घोटालों में शीर्ष स्तर की संलिप्तता कम होती थी और मामले में उनके शामिल होने की बात सामने नहीं आ पाती थी.” 2जी घोटाले ने राजनेता-नौकरशाह-कॉर्पोरेट घराने, मीडिया और बिचौलियों की सांठगांठ को बेपरदा कर दिया.
हाल ही में सीबीआइ निदेशक पद से रिटायर ए.पी. सिंह ने माना, ''2जी घोटाला मेरे कार्यकाल का सबसे बड़ा घोटाला रहा.” सीबीआइ के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह कहते हैं, ''तत्कालीन प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल ने मेरा तबादला सिर्फ इसलिए कर दिया कि मैंने चारा घोटाले में लालू यादव के खिलाफ केस रोकने से इनकार कर दिया था.” उनका मानना है, ''पिछले 25-30 साल में सिर्फ नाम, जगह और रकम बदले हैं लेकिन भ्रष्टाचार उसी तरह से हो रहा है. फर्क इतना है कि पहले सारे मामले सामने नहीं आ पाते थे, अब मीडिया की सक्रियता से आ रहे हैं.”
ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल के करप्शन परसेप्शन इंडेक्स-2011 की रिपोर्ट में भारत 87वें से 95वें पायदान पर खिसक गया. देश में घोटालों की अंतहीन सूची है, लेकिन उसका अंत सजा की बजाए बौद्धिक बहस तक ही सीमित है. 1980 के दशक के सबसे बड़े बोफोर्स घोटाले में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी समेत कई नामचीन हस्तियों का नाम उछला था. बोफोर्स तोप सौदे के मामले में 66 करोड़ रु. की दलाली का आरोप लगा, लेकिन आखिर में सीबीआइ ने मुख्य आरोपी ओत्तावियो क्वात्रोची को भी क्लीन चिट देकर क्लोजर रिपोर्ट दे दी.
उदारीकरण के मुहाने पर खड़े भारत के सामने हर्षद मेहता शेयर घोटाला सामने आया, जिसे कॉर्पोरेट अपराध की शुरुआत माना जाता है. स्टॉक ब्रोकर मेहता पर 5,000 रु. के प्रतिभूति घोटाले में 9 साल तक ट्रायल चला और 2001 में उसकी मौत हो गई. इसी तरह का मामला 2001 में आया, जब 1,000 करोड़ रु. के प्रतिभूति घोटाले में केतन पारेख पर शिकंजा कसा.
क्रिकेट मैच फिक्सिंग ने सन 2000 में खेलों में तो तहलका स्टिंग ने 2001 में राजनीति में भूचाल ला दिया था. फिर 1996 में बिहार का चारा घोटाला सामने आया. 950 करोड़ रु. के चारा घोटाले में लालू के अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र भी आरोपी हैं, लेकिन यह केस अंजाम तक नहीं पहुंचा.
स्टांप पेपर घोटाले ने तो देश की सुरक्षा पर सवाल उठा दिया था, जब अब्दुल करीम तेलगी के 12 राज्यों में फर्जी स्टांप बनाकर बेचने का खुलासा हुआ. करीब 20,000 करोड़ रु. के इस घोटाले में तेलगी को सरकारी विभागों से सहयोग मिला था. हालांकि सजा से पहले ही तेलगी की जेल में मौत हो गई.
हवाला स्कैंडल ने तो पूरी राजनीतिक जमात के लूट में शामिल होने का खुलासा किया. इसमें लालकृष्ण आडवाणी, मदनलाल खुराना, शरद यादव, विद्याचरण शुक्ल, पी. शिवशंकर, बलराम जाखड़ जैसे नेताओं के नाम थे. लेकिन यह मामला तब तक सुर्खियों में नहीं आया, जब तक अक्तूबर 1993 में दो पत्रकारों और दो वकीलों ने जनहित याचिका दायर नहीं की. इस मामले में शुरुआत बहुत धीमी हुई क्योंकि जैन बंधुओं की डायरी बहुत विस्फोटक थी. आरोप है कि सीबीआइ ने इस डायरी को दो साल तक दबाकर रखा. तब मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया ने दो महीने में ही नोटिस जारी कर तत्कालीन सीबीआइ निदेशक विजय रामाराव को निजी तौर पर जवाबदेह बनाकर समय-समय पर प्रगति रिपोर्ट देने को कहा.
ग्यारह सांसदों के सवाल पूछने के बदले घूस लेने और कर्नाटक, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में अपनों को जमीन देने के मामलों ने तो राजनीति-नौकरशाही की बची-खुची साख भी खत्म कर दी. सत्यम घोटाला राजनीति से इतर भारत का सबसे बड़ा कॉर्पोरेट फर्जीवाड़े का केस है. इसमें कंपनी के हेड रामलिंग राजू और उसके परिवार के सदस्यों ने फर्जी बिक्री और फर्जी बैंक एस्टेटमेंट के जरिए कंपनी को 2,743 करोड़ रु. का चूना लगाया. यह घोटाला प्रोफेशनल्स के संलिप्त होने का बड़ा उदाहरण है. पहले के घोटाले में ज्यादातर राजनेताओं की भूमिका ही सामने आती थी.
इस घोटाले पर शौरी कहते हैं, ''तब और अब के घोटाले का सबसे बड़ा फर्क सत्यम घोटाले से मिलता है. घोटालों में अब चार्टर्ड एकाउंटेंट, वकील, नौकरशाह जैसे प्रोफेशनल्स की संलिप्तता बहुत तेजी से बढ़ी है.”
आदर्श सोसाइटी घोटाले में भी नौकरशाही की सांठगांठ सामने आई, तो 70,000 करोड़ रु. के राष्ट्रमंडल घोटाले में सुरेश कलमाड़ी समेत कई लोग जेल जाकर लौट चुके हैं. शौरी के मुताबिक, तब और अब में समानता जरूर दिख रही है, ''तब भी कोई दोषी साबित नहीं हुआ और आज भी कोई दोषी साबित नहीं हो रहा.” हालांकि रिश्वत देने वालों के खिलाफ भी जांच को वे एक अच्छी पहल मानते हैं.
लेकिन सीपीएम महासचिव प्रकाश करात पिछले दो-ढाई दशक में आई घोटालों की बाढ़ के लिए सीधे उदारीकरण को जिम्मेदार मानते हैं. वे कई मौकों पर कह चुके हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, लेकिन मनमोहन बड़े औद्योगिक घरानों को बैंक खोलने की अनुमति दे रहे हैं, जिससे बैंकिंग क्षेत्र में भ्रष्टाचार बढ़ा है.” पर सरकार का दावा है कि घोटालों-भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कई कदम उठाए गए हैं.
संसद में दिए जवाब में प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री वी. नारायणसामी कहते हैं, ''सरकार ने भ्रष्टाचार पर अंकुश के लिए कदम उठाए हैं और सरकार के कामकाज के तरीके में सुधार किया है.” इस दावे में सरकार व्हिसल ब्लोअर्स का प्रस्ताव, सूचना का अधिकार कानून, सिटिजन चार्टर, लोकपाल बिल, भ्रष्टाचार के खिलाफ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन का अनुमोदन, न्यायिक जवाबदेही बिल, सभी ग्रुप ए अधिकारियों की संपत्ति सार्वजनिक कराना, सीवीसी को वैधानिक दर्जा जैसे कदम गिनाती है. फिर भी घोटाला रोकने में नाकामी की वजह क्या है?
जोगिंदर सिंह की दलील है, ''वी.पी. सिंह ने बोफोर्स की बदौलत ही सत्ता हासिल की, लेकिन जब सीबीआइ ने उनसे पूछताछ की तो उन्होंने इस घोटाले के बारे में कुछ भी जानकारी होने से इनकार कर दिया. नेताओं की कोई नैतिकता ही नहीं रह गई है इसलिए महाभारत काल से चली आ रही भ्रष्टाचार की परंपरा भारत में खत्म नहीं होने वाली.” सिंह और शौरी की राय है कि राजा रत्नम, रजत गुप्ता जैसे बड़े मामले तीन महीने में खत्म हो गए, लेकिन हमारे यहां सुखराम जैसा मामला कब से चल रहा है, कुछ पता नहीं.
घोटालों की गिनती और धन डकारने के सारे रिकॉर्ड टूट रहे हैं, इसमें सरकार और निजी जगत का कोई भी अंग अछूता नहीं है. जनवरी, 2012 तक के आंकड़े बताते हैं कि सीबीआइ के पास 7,172 केस लंबित हैं. 2009-12 के बीच ही कुल 2,169 केस दर्ज हुए हैं. लेकिन विशेष अदालतों के गठन में सरकार की रफ्तार धीमी है. 2008-11 के बीच 54 विशेष अदालतें गठित करने को मंजूरी मिली पर अभी तक 10 ही शुरू हो पाई हैं. जबकि घोटाले अंतहीन हो गए हैं. निश्चित तौर पर युवा पीढ़ी के लिए देश की ऐसी छवि बेहद खतरनाक संदेश है.

