भारत के बेस्ट बी-स्कूल
मेहमान का पन्नाः अभिजित भादुड़ी
दिल्ली यूनिवर्सिटी का आखिरी इम्तिहान अभी हुआ ही था. नतीजे नहीं आए थे. हम कोलकाता में थे. हर गर्मी की छुट्टी मैं वहीं बिताता था. बस एक ही संदेह मन में टीसता था—मुझे एक्सएलआरआइ जमशेदपुर में दाखिला मिलेगा? फैसला दिल्ली में हमारे घर मेल से आना था.
बाबा ने सुझाया, ''क्यों न तुम रेल पकड़कर जमशेदपुर चले जाओ और उनके दफ्तर से पता कर लो?’’वे रेलवे में थे और मानते थे कि देश में ऐसी कोई जगह नहीं जिसे रेलवे ने जोड़ा न हो. मगर रेल स्टेशन टाटानगर था, जमशेदपुर नहीं.
एक्सएलआरआइ देश का पहला बिजनेस स्कूल था. इसकी स्थापना 1949 में जेसुइट प्रीस्ट ने की थी. तब यह बिहार राज्य में था. हमें प्रो. शरद सरीन और प्रो. तमोनाश गंगोपाध्याय सरीखे कई प्रसिद्ध शिक्षकों ने पढ़ाया. फादर मैकग्राथ एस.जे. के सबक अब भी मेरे दिमाग में गहराई से समाए हैं.
वे खूबसूरत अमेरिकी पादरी अपने न्यूयॉर्क के भारी लहजे में हिंदी, बांग्ला और ओडिया बोलते थे. उन्होंने हमें मैनेजमेंट के बुनियादी हुनर सिखाए और पूरी तरह बांध लेते थे. पहले पाठों में एक तथ्य, निष्कर्ष और राय के बीच फर्क करना था.
एक दोपहर जब फादर मैकग्राथ पढ़ा रहे थे, पूरा जूनियर बैच बड़े हॉल में बैठा था. दरवाजा धड़ाम से खुला और एक लड़की दौड़ती हुई दाखिल हुई, कुछ लोग लाठियां और चाकू लिए उसका पीछा कर रहे थे. वह छात्रों के बीच से गुजरती हुई भागी. हथियारबंद लोग भी उसके पीछे भागे. सौ के करीब जूनियर छात्र स्तब्ध और हतप्रभ चुपचाप खड़े देखते रहे.
जब वह चली गई तो फादर मैकग्राथ ने हमसे पुलिस शिकायत का मजमून तैयार करने को कहा. हममें से हरेक ने अलग-अलग मजमून लिखे. कोई एकराय नहीं थी कि उसके पीछे कितने लोग थे, उन्होंने क्या पहना था और वे कौन-से हथियार लिए थे. उस अफरा-तफरी में हमने इस पर भी गौर नहीं किया कि वह लड़की हमारी सहपाठी थी और ''हमलावर’’ हमारे सीनियर थे!
यह फादर मैकग्राथ का हमें पढ़ाने का तरीका था कि हम जो देखते हैं, वह किस तरह हमारे पूर्वाग्रहों से छनकर दिमाग में जाता है. पोस्ट-ट्रूथ या उत्तर-सत्य के दौर में अभिमत या राय से तथ्य को अलग कर पाने की सीख स्वस्थ और समझदार बने रहने में मेरी मदद करता है.
उन दो साल में हमने उम्र भर के दोस्त बनाए. दशकों पहले बने रिश्ते आज भी कायम हैं. हमारे सहपाठी वैश्विक करियर की तलाश में निकल गए. कुछ आंत्रप्रेन्यौर और मंत्री बन गए. 'व्यापक भलाई के लिए’ नारा नहीं, आदर्श है, जो आज भी एक्सलर्स को प्रेरित करता है.
लेखक स्तंभकार और लर्निंग ऐंड डेवलपमेंट ग्लोबली फॉर माइक्रोसॉफ्ट के प्रमुख हैं. उन्होंने एक्सएलआरआइ-जेवियर स्कूल ऑफ मैनजमेंट से 1984 में ग्रेजुएशन किया.