मेहमान का पन्नाः सचिन गर्ग
मैनेजमेंट डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट (एमडीआइ), गुरुग्राम में बिताए वक्त ने मुझे अपनी जिंदगी के कुछ सबसे अच्छे दिन दिए. मैं न सिर्फ बौद्धिक स्फूर्ति महसूस करता था बल्कि बहुत मजा भी आता था. मैं ऐसी चीजें सीख रहा था जो पाठ्यपुस्तकों के जरिए नहीं पढ़ाई जा सकतीं.
एमडीआइ में मिले कई प्रोफेसर आज भी मेरे साउंडिंग बोर्ड हैं. मैं ऐसे लोगों से मिला जो आगे चलकर मेरे बेहतरीन दोस्त बने और कुछ ऐसे संगी-साथियों से भी, जो अपने-अपने क्षेत्र के सबसे स्मार्ट लोगों में थे.
एक्सचेंज प्रोग्राम के दौरान एक बार मुझे फ्रांस जाने का मौका मिला. उस यात्रा से जो नजरिया हासिल हुआ, वह अभी कुछ साल पहले अपने कारोबार को दुनिया भर में ले जाते वक्त मददगार साबित हुआ.
एमडीआइ से ग्रेजुएशन करने के एक साल के भीतर मैं आंत्रपेन्योर था. इसमें इंस्टीट्यूट के बेहद जुड़े हुए और मददगार समुदाय ने बहुत अहम भूमिका अदा की. मुझे याद है कि बिल्कुल पहले दिन कॉलेज के एक प्रतिष्ठित पूर्व छात्र को बोलने के लिए बुलाया गया था.
सत्र के बाद मैं दो लोगों के पास गया, दोनों आंत्रप्रेन्योर थे. वे अंतत: न केवल मेरे दोस्त बन गए बल्कि तीन साल बाद कारोबार स्थापित करते वक्त मेरे मेंटर भी बने.
उस दिन से 14 साल हो चुके हैं और आज भी वे ही पहले व्यक्ति होते हैं जिन्हें कामकाज में कोई भी उलझन पेश आने पर मैं फोन करता हूं.
(लेखक, पुस्तक लेखक, प्रकाशक और आंत्रप्रेन्योर हैं. एमडीआइ, गुरुग्राम से उन्होंने 2010 में ग्रेजुएशन किया )