मेहमान का पन्नाः घनश्याम तिवारी
इनटेल टेक्लनोलॉजीज ने 2005 में मुझे आइआइएम-बैंगलोर के एग्जीक्यूटिव जनरल मैनेजमेंट प्रोग्राम के लिए मनोनीत किया. संस्थान ने उसी साल यह प्रोग्राम लॉन्च किया था. मुझे कैंपस में पहला दिन अब भी याद है. शिक्षकों की अकादमिक उत्कृष्टता और विवेकपूर्ण वैचारिक नेतृत्व, कैंपस की चमकदार सादगी और देश भर के बहुत अच्छे छात्रों ने मुझे दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर दिया.
तब हो या अब, आइआइएम-बैंगलोर में कदम रखते ही आप तत्काल ये चीजें अनुभव करते हैं, जो इसे सचमुच विश्वस्तरीय बनाती हैं. आइआइएम-बैंगलोर के बाद मैं केलॉग स्कूल ऑफ मैनेजमेंट और हार्वर्ड केनेडी स्कूल पढ़ने गया. मैंने लंदन स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स में भी काम किया.
इन संस्थानों में आइआइएम-बैंगलोर के मुकाबले छात्रों, संकाय और पढ़ाई की गतिविधियों का ज्यादा व्यापक वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र होते हुए भी मैं मानता हूं कि आइआइआइ-बैंगलोर के शिक्षक और पढ़ाई-लिखाई के तौर-तरीके यहां के विद्यार्थियों को अंतरराष्ट्रीय माहौल में भी समान रूप से प्रतिस्पर्धा करने के लिए तैयार करते है.
संस्थान के शिक्षकों और पूर्व छात्रों की कामयाबी की बेहद प्रेरक कहानियां दिखाती हैं कि किस तरह संस्थान विभिन्न क्षेत्रों में सर्वांगीण मिशन के साथ जुटा हुआ है—केवल कारोबार में ही नहीं, सामाजिक और राजकाज के क्षेत्र में भी. आइआइएम-बैंगलोर के पूर्व छात्रों से बात करते हुए मैंने देखा कि कैसे वे अपना असर छोड़ने को लालायित रहते हैं.
अक्सर कामायाबी के विशाल मील के पत्थर गाड़ने के बाद भी जरा विश्राम नहीं करते, बल्कि और ज्यादा काम करने और ज्यादा सेवा करने के लिए उससे भी आगे जाते हैं. मेरे करियर को गढ़ने में मददगार भूमिका निभाने के लिए मैं हमेशा संस्थान का कर्जदार रहूंगा.
(लेखक समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता हैं. वे आइआइएम-बी से 2006 में पास होकर निकले.)