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‘‘आइआइएम-ए में ही मैं पहली बार अपने पैरों पर खड़ी हुई’’

पहले साल के खराब ग्रेड से लेकर प्रोडक्शन डिजाइन में टॉप पर आने तक. साथ ही, थोड़ा धरना प्रदर्शन भी तो किया था. 

उत्कृष्टता ही पहचान : भारत के शीर्ष बिजनेस स्कूल में से एक आइआइएम-अहमदाबाद
उत्कृष्टता ही पहचान : भारत के शीर्ष बिजनेस स्कूल में से एक आइआइएम-अहमदाबाद
अपडेटेड 20 नवंबर , 2022

मेहमान का पन्नाः मल्लिका साराभाई

बहुत मुश्किल समय में मेरा दाखिला आइआइएम-ए में हुआ था. दरअसल, मैंने पिछली शाम अपने पिता विक्रम साराभाई का अंतिम संस्कार करने के बाद 1 जनवरी को आइआइएम की परीक्षा दी थी. यह बड़ा मुश्किल समय था और जब मैं आखिरकार आइआइएम-ए पहुंची, तो मेरा पूरी तरह से नर्वस ब्रेकडाउन हो चुका था. सबको लगता था कि मेरा दाखिला खैरात के तौर पर हुआ है और दरअसल मैं बहुत मूर्ख व्यक्ति हूं.

मुझे फिर से संभलना और चलना सिखाने में मेरे चार-पांच नए दोस्तों का बड़ा सहारा रहा. लेकिन पहला साल बहुत बुरा गुजरा. शिक्षकों ने मुझे बताया कि अगर मैं विक्रम साराभाई की बेटी नहीं होती, तो मुझे 'सी’ मिल जाता. ''लेकिन चूंकि आप जो हैं वह हैं और हम यह नहीं दिखाना चाहते कि हम आपके प्रति कोई विशेष अनुराग रखते हैं. इसलिए हम आपको डी दे रहे हैं.’’ मैं मूल रूप से उस स्थिति से निकलने और पास होने के लिए संघर्ष कर रही थी. 

लेकिन अगला साल अद्भुत था. मैं अपने पूरे रौ में आ चुकी थी. मैंने पाया कि मैं प्रोडक्शन डिजाइन में बहुत अच्छी थी, जो आमतौर पर इंजीनियरिंग स्पेशलाइजेशन है. वास्तव में, मैंने लंबी छलांग लगाई और शीर्ष पर आ गई. शायद सबसे उपयोगी चीज जो मैंने आइआइएम-ए से सीखी है वह है रिटन एनालिसिस ऐंड कम्यूनिकेशन (डब्ल्यूएकेसी) नामक कोर्स.

इसमें आपको 100-पन्नों के केस स्टडी का एक-पन्ने का सारांश लिखना होता था जिसमें आप कुछ भी छोड़ नहीं सकते. और हम सब इसमें धराशाई हो गए. लेकिन मैं इस कोशिश से बहुत अच्छी हो गई क्योंकि इसने मुझे काफी हद तक वह काम सिखाया.

मुझे फाइनेंस (आर्थिक प्रबंधन विषय) से नफरत थी, लेकिन अब मैं अपना अधिकांश समय फाइनेंस में बिताती हूं और एक आर्ट इंस्टीट्यूट चलाने की कोशिश कर रही हूं, जिसका मकसद लाभ कमाना नहीं है और लोगों के आत्मविश्वास को ऊंचा रखने की कोशिश कर रही हूं.

इसलिए अब वहां सीखा मेरा बहुत सारा ऑर्गेनाइजेशनल बिहेवियर और बहुत सारा फाइनेंस आज रोजमर्रा के जीवन में शामिल है और काम आ रहा है. ये दो साल बेहद खास रहे. मैंने कमाल के दोस्त बनाए और एक तरह से मैं पहली बार अपने पैरों पर खड़ी हुई.

जिस साल मेरा दाखिला हुआ, उस साल पहली बार कक्षा में नौ लड़कियां थीं. हमारे लिए कोई हॉस्टल नहीं था, इसलिए उन्होंने हमें एक ऐसे आवास में भेज दिया, जहां एक व्यक्ति की जगह तीन लोगों को रहना होता था. यह बहुत घटिया था.

इसलिए मैं तत्कालीन निदेशक डॉ. सैमुअल पॉल के कार्यालय के बाहर धरने पर तब तक बैठी रही जब तक कि उन्होंने हमें हॉस्टल देने का वादा नहीं किया. दूसरे वर्ष में पहली बार महिलाओं का अपना छात्रावास था.
 
(लेखिका एक एक्टिविस्ट, भारतीय शास्त्रीय नर्तकी और ऐक्टर हैं. उन्होंने 1976 में आइआइएम-अहमदाबाद से पढ़ाई पूरी की).

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