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‘‘आइआइएम-ए में मैंने जो कुछ भी सीखा, उसने मुझे सिविल सर्वेंट (लोक सेवक) के रूप में समाधान खोजने में मदद की’’

नवाचारों में सबक, लीक से हटकर सोच और तर्कसंगत रणनीति बनाने से छात्र विविध क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने में सक्षम बनते हैं.

ज्ञान का गलियारा : कक्षा के बाहर नोट्स साझा करते आइआइएम-ए के विद्यार्थी
ज्ञान का गलियारा : कक्षा के बाहर नोट्स साझा करते आइआइएम-ए के विद्यार्थी
अपडेटेड 20 नवंबर , 2022

मेहमान का पन्नाः  एस.आर. मोहंती

यह1979 की गर्मियों की बात है जब मैं आइआइएम-अहमदाबाद के विशिष्ट लाल ईंट वाले मेहराबदार गलियारों में चल रहा था. थोड़ा चकित, थोड़ा डरा हुआ लेकिन निश्चित रूप से इस कुलीन संस्थान से अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए अपनी पूरी जी-जान लगा देने के संकल्प से भरा हुआ. इसमें आईआईटी, मानविकी, लॉ स्कूलों, पशु चिकित्सा विज्ञान से लेकर कॉर्पोरेट जगत तक, विभिन्न क्षेत्रों से आए सभी प्रकार के छात्र थे.

पर एक बात सामान्य थी-वे सभी प्रतिभाशाली और सीखने की भूख रखने वाले युवा दिमाग थे. दबाव काफी अधिक था और हमें अपना सर्वश्रेष्ठ देने की जरूरत थी. हमारा एक दोस्त छोड़ना चाहता था. हमने उसे किसी तरह मना लिया और उसने कॉलेज नहीं छोड़ा. आज वह इंफ्रास्ट्रक्चर क्षेत्र का जाना-माना कंसल्टेंट है. 

प्रोफेसर विश्वस्तरीय थे. वे अपने क्षेत्र के बड़े विद्वान और छात्रों से अपनी अपेक्षाओं को लेकर बड़े सख्त भी थे. एक प्रोफेसर ने मुझसे कहा था कि आइआइएम के बाद अपने करियर में आगे जो भी करना, उसकी सामाजिक प्रासंगिकता कितनी है, उसे भी जरूर तौलना. इस बात ने मुझे यूपीएससी परीक्षाओं के लिए आवेदन करने के लिए प्रेरित किया और मैं 1982 में आईएएस में शामिल हो गया. अगले 38 वर्षों में, ऐसे दर्जनों मौके आए जब मेरा मानना है कि मैंने ऐसे निर्णय लिए उसमें, जो मुझे आइआइएम में जो पढ़ाया गया था, उसकी स्पष्ट झलक थी.

आईएएस अधिकारियों के रूप में, हमारे पास इस विशाल देश के बड़े क्षेत्रों को संचालित करने का दायित्व रहता है, जो कि उलझनों और जटिलताओं से भरा है. आइआइएम-ए में मैंने जो कुछ भी सीखा-नवाचार, व्यवस्थित सोच और तर्कसंगत रणनीति निर्माण- उसने मुझे हर विभाग में अपनी प्रतिक्रिया को बेहतर तैयार करने में मदद की क्योंकि मैंने पुरानी समस्याओं के नए-नवेले समाधान खोजने के प्रयास किए.

इंदौर के कलेक्टर के रूप में, मैंने सार्वजनिक स्वास्थ्य वितरण प्रणाली में सुधार किया और रोगी कल्याण समिति (आरकेएस) बनाई, जो सार्वजनिक भागीदारी मॉडल है और इसने अस्पताल प्रबंधन में क्रांति ला दी. उसके बाद से इसे पूरे देश में अपनाया गया है. मुझे आरकेएस अवधारणा के रूप में सबसे प्रगतिशील परियोजना तैयार करने के लिए ग्लोबल डेवलपमेंट पुरस्कार मिला.

आइआइएम-ए में हमें सिखाया गया था कि किसी प्रोजेक्ट में निवेश से पहले उसके फायदे और धन की उपलब्धता देखनी चाहिए. इस सबक ने मेरी निर्णय लेने की प्रक्रिया को युक्तिसंगत बनाया और देश की पहली बॉन्ड-बीओटी योजना के तहत पूरे मध्य प्रदेश में 1,980 किलोमीटर राजमार्गों के डिजाइन और निर्माण में मेरी मदद की. आज, मुझे लगता है कि मैंने जो कुछ किया है, उसका छोटा सा हिस्सा भी मैं नहीं कर पाता अगर मेरे अंदर तर्कसंगत, व्यवस्थित और साहसी निर्णय लेने की वह शैली नहीं पनपी होती जो आइआइएम-ए में हमारे अंदर कूट-कूटकर भर दी गई थी. 

(लेखक मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव हैं. उन्होंने 1981 में आइआइएम-ए से पढ़ाई पूरी की.)

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