पंकज सरन
रूस की यूक्रेन में ''विशेष सैन्य कार्रवाई'' को सात माह पूरे हो गए. ''बाकी'' दुनिया की मनोदशा बयान करते हुए सबसे जोरदार बात डॉ. एस. जयशंकर ने हाल ही में कही, ''यूरोप को अपने इस यकीन से उबरना होगा कि उसकी परेशानियां दुनिया की परेशानियां हैं, पर दुनिया की परेशानियां उसकी नहीं हैं.'' कुछ हजार मील दूर बैठा भारत अधिकांश दुनिया की तरह यूरोप में चल रहा सत्ता संघर्ष देख रहा है, जिसके उसकी अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ रहे हैं.
सात माह के रणनीतिक छापामार हमलों, स्थानीय लड़ाइयों और अहम सैन्य नुक्सानों के बाद साफ हो गया कि रूस की दिलचस्पी के इलाके कौन-से हैं. ये यूक्रेन के पूर्वी छोर के इलाके हैं जो रूस की सीमा से सटे हैं, जिनमें मुख्य हैं डोनेट्स बेसिन, या संक्षेप में डानबास, और ब्लैक सी से सटे यूक्रेन के कुछ हिस्से, जो क्रीमिया के नजदीक हैं. इनमें से कई में रूसी जातीय आबादी बड़ी तादाद में है. हाल में करवाए गए जनमत संग्रह के बाद इनमें से चार इलाके जल्द रूस से ''जुड़'' जाएंगे और रूसी भूभाग बन जाएंगे. जनमत संग्रह युद्ध में एक बड़ा मोड़ है. अपने देश की रिजर्व सेना के सैनिकों को आंशिक रूप से आगे बढ़ने की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की घोषणा से यह भी संकेत मिला कि मॉस्को ने यूक्रेन में अपने मकसद आगे बढ़ाना ठान लिया है.
गलतियों को सुधारने की कोई समय सीमा नहीं होती और यह वाकई बेहद अहम है कि बातचीत के दरवाजे खुले रखे जाएं और दोनों पक्ष वहां लौट जाएं जहां वे 2014 में थे—यानी समझौता वार्ताओं की मेज पर. हम यह भी न भूलें कि सोवियत संघ के विघटन के बाद यूक्रेन और अन्य जगहों को लेकर पश्चिम और रूस के बीच परदे के पीछे की लड़ाई वर्षों से चल रही है. यह ढोंग कि युद्ध 24 फरवरी को शुरू हुआ उतना ही बड़ा ढकोसला है जितना सद्दाम हुसैन के पास जनसंहार के अस्त्र-शस्त्र होने का दावा करना था. 2013 से ही एक अलग किस्म की जंग लड़ी जा रही थी. युद्ध किसने शुरू किया, कौन जीत रहा है और रूस की ओर से अंतरराष्ट्रीय कानून के सिद्धांतों को रौंदने को लेकर खलबली पर पश्चिम का गढ़ा अफसाना एकसमान है. टीवी पर दिखाई जा रही तस्वीरों के बावजूद दोनों ओर से यह अब भी कम तीव्रता का युद्ध है, जिसमें रूस की पूर्ण सैन्य शक्ति अभी तैनात नहीं की गई है. छद्म तरीकों को छोड़ दें तो नाटो को भी तैनात नहीं किया गया है.
टकराव रोकने का अकेला तरीका यह है कि सभी पक्ष अपनी ऊर्जा कूटनीतिक समाधान खोजने में लगाएं. इसमें सभी पक्षों के जायज सुरक्षा हितों का ध्यान रखना होगा. इसमें यह गुणा-भाग न हो कि रूस फंस गया है और उसे घुटनों पर लाया जा सकता है. इसका अर्थ है रूस को तोड़ना और मॉस्को में सत्ता बदल, यह मानकर कि इनमें से एक या दोनों नतीजे आने वाले वर्षों में यूरोप में सभी के लिए अंतत: शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की स्थितियां पैदा कर देंगे. मगर फंदे में फंसा रूस खतरनाक रूस है.
यूक्रेन यूरोप का सीरिया बन गया है. हथियारों, भाड़े के हत्यारों, शरणार्थियों की बाढ़ और उसकी अर्थव्यवस्था तथा राजनीति की बर्बादी से उबरने में बरसों लगेंगे. उसके पुनर्निर्माण की कीमत किसी न किसी को तो चुकानी ही होगी. इस हमले की घड़ी में यूरोप बेशक एकजुट हो गया है, पर टकराव जारी है. ऐसे में उसे आगे बढ़ने के तरीकों को लेकर बढ़ते मतभेदों का सामना करना पड़ रहा है. वह कट्टरपंथियों, जो रूस के साथ कोई समझौता नहीं चाहते, और व्यावहारिकतावादियों के बीच फंस गया है. इटली के चुनाव नतीजों से यूरोप के बड़े हिस्से की मनोदशा की झलक मिलती है. यूरोप ऐसे नेता की तलाश में है जो महाद्वीप को इस दलदल से बाहर निकाल सके.
रूस भी भुगत रहा है. आने वाले वर्षों में वह और भुगतेगा जब पाबंदियां और वित्त, व्यापार, निवेश और टेक्नोलॉजी की पश्चिमी दुनिया से उसका अलगाव असर दिखाने लगेगा. पाबंदियां वैसे भी आमतौर पर देशों को झुका नहीं पाई हैं और रूस कोई ईरान या म्यांमार नहीं है. सच यह है कि पाबंदियां उस अर्थव्यवस्था पर ऊपर से थोपी गई हैं जिसमें बीते कुछ दशकों में कोई सार्थक ढांचागत सुधार नहीं हुआ. इससे भी अहम यह कि अमेरिका से कहीं ज्यादा यूरोप को रूस के अगल-बगल रहने का और रूस को यूरोप के अलग-बगल रहने का तरीका खोजना होगा.
यूरोप तथा अन्य जगहों पर ऊर्जा आपूर्तियों और विकासशील देशों को खाद्य तथा वस्तु आपूर्तियों में उथल-पुथल से चौतरफा महंगाई और मंदी के दबाव पैदा हो रहे हैं. अगले कुछ वर्षों के लिए यूरोपीय अर्थव्यवस्था के पूर्वानुमान धुंधले हैं. अमेरिका मुद्रास्फीति के रुझानों से जूझ रहा है. भारतीय रुपए पर भी दबाव है, पर ज्यादा बेबस अर्थव्यवस्थाएं ज्यादा बड़े खतरों से दोचार हैं. अफ्रीका और चीन भी झंझावातों का सामना कर रहे हैं.
तो भारत के लिए इसका क्या मतलब है? हमें बातचीत और कूटनीति की ओर लौटने के अपने आह्वान पर दृढ़ रहते हुए उसे आगे बढ़ाना चाहिए. हमें युद्ध की लपटों को हवा नहीं देनी चाहिए. हमें अपने हितों और चुनौतियों से भी नजर चूकने नहीं देनी चाहिए, भले ही सभी पक्ष हमें अपने हिसाब से साधने में लगे हों. हमारी सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती ठीक हमारे दरवाजे पर खड़ी है.
हमें आर्थिक चुनौतियों को राष्ट्र की ताकत बढ़ाने के अवसरों में बदलना चाहिए. इसमें से कुछ तो किया ही जा रहा है—हमारे रक्षा उद्योग के स्वदेशीकरण की तेज रफ्तार, जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता में कमी, सेमीकंडक्टर, टेलीकॉम और डिजिटलीकरण सरीखी बेहद अहम टेक्नोलॉजी में निवेश, और 1.3 अरब आबादी के देश को सहारा देने के लिए जरूरी प्राकृतिक संसाधन जुटाना.
भारतीय अर्थव्यवस्था आजादी के बाद किसी भी वक्त के मुकाबले ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ने के लिए तैयार है. घरेलू कोशिशों की भरपाई के लिए हमें विदेशी भागीदारियों की जरूरत है. हमारे मूल्य और अर्थव्यवस्था पश्चिम के साथ घनिष्ठ रूप से गुंथे हैं. अपने हितों के प्रति सजग रहते हुए हमें इस कड़ी को मजबूत करना चाहिए. वैश्विक उथल-पुथल के इस चक्र में फर्क यह है कि हम अपनी आंतरिक रणनीतियों को दुरुस्त करने और विदेशों को अपनी आवाज सुनाने में ज्यादा माहिर हो रहे हैं, और हम कामयाब हैं.
(पंकज सरन रूस में भारत के पूर्व राजदूत और पूर्व उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार हैं)

