नेपाली नेता अपने सार्वजनिक बयानों में भारत को मित्र राष्ट्र बताते हैं और सच भी है कि भारत और नेपाल केबीच जिस तरह के आपसी संबंध रहे हैं उसकी बराबरी के उदाहरण बहुत कम हैं. हालांकि, इस ‘निकटता’ से नेपाल में घरेलू राजनीति का चौसर भी सज जाता है, और भारत विरोधी बातें करके बड़े राजनीतिक फायदे उठाने की कोशिशें होती हैं. क्षेत्रीय और यहां तक कि वैश्विक भू-राजनीति में, विशेष रूप से चीन के साथ-साथ अन्य दक्षिण एशियाई देशों और उससे परे के देशों को भी, भारत के बराबर दर्जा देना भी नेपाल की राजनीतिक बिसात का हिस्सा रहा है.
दुनिया और वास्तव में, भारत और नेपाल कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं और आर्थिक रूप से भविष्य बहुत मुश्किल नजर आ रहा है. इसी बीच, नेपाल ने कुछ भारतीय क्षेत्रों को अपने देश के भूभाग के रूप में दर्शाते हुए एक नया नक्शा जारी करके अपने भूगोल को फिर से लिखने की कोशिश की है. इसकी घरेलू राजनीति और क्षेत्रीय तथा वैश्विक भूराजनीति को प्रभावित करने वाली इसकी नई शक्ति में इसकी वजहें देखी जा सकती हैं.
भारत के साथ नेपाल की पूर्वी और पश्चिमी सीमाएं 1816 में सुगौली संधि द्वारा निर्धारित की गई थीं. काली (महाकाली) नदी को नेपाल की पश्चिमी सीमा स्वीकारा गया था. नेपाल के नए नक्शे में कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख शामिल हैं, जिन्हें पारंपरिक रूप से काली के पश्चिम में माना जाता है. ये इलाके उस क्षेत्र में हैं जहां भारत, चीन और नेपाल तीनों की सीमाएं लगती हैं, और यह कैलाश पर्वत से बहुत दूर नहीं है.
सुगौली और उसके बाद के अधिकांश नक्शों और अन्य दस्तावेजों में इन क्षेत्रों को भारत के इलाके के रूप में माना गया है, लेकिन हाल के वर्षों में नेपाल ने इस सोच के आधार पर इन क्षेत्रों पर अपना दावा जताया है कि इन इलाकों के पश्चिम के भूभाग काली नदी के प्रमुख जलधारण स्रोत थे. यह मामला दो सरकारों के बीच विमर्श का विषय है और भारत और नेपाल के बीच सीमा मुद्दों को सुलझाने के लिए एक उच्चस्तरीय तंत्र भी स्थापित किया गया है.
2017 के अंत में हुए आम चुनाव में भारत विरोध के दबे स्वर के साथ राष्ट्रवादी भावनाएं उभारकर प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली नेपाल में सत्ता में आए थे. उनकी पार्टी ने यह जीत, नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) या सीपीएन (यूएमएल) के पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड की अगुवाई में माओवादियों की एकजुटता और संभवत: चीनियों के उदार समर्थन से हासिल की थी. एकजुट होने से चुनाव में जीत तो मिल गई लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं के बीच सत्ता-संघर्ष जारी रहा और कुछ हफ्तों पहले यह नाटकीय रूप से बहुत तेज हो गया. रिपोर्टों से पता चलता है कि आपसी खींचतान इतनी बढ़ गई थी कि कम्युनिस्ट गुटों को एक साथ बनाए रखने के लिए चीन को हस्तक्षेप करना पड़ा.
सीमा मुद्दे पर भारत के साथ पहली बार बवाल 2019 के अंत में हुआ था, जब भारत ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में स्थिति के बदलाव के बाद अपना नया राजनीतिक मानचित्र जारी किया था. हालांकि उस नक्शे में भारत ने बाहरी सीमाओं में कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन नेपाल में राजनैतिक ताकतों ने भारत पर कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख में नेपाली क्षेत्रों के अतिक्रमण का आरोप लगाया. नेपाली कांग्रेस के नेताओं की अगुआई में सड़क पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए. नेपाली कांग्रेस ने इसे, राष्ट्रवाद के अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने और सरकार तथा पीएम ओली पर भारत समर्थक होने के आरोप लगाने के अवसर के रूप में देखा.
भारत की ओर से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए वर्षों से उपयोग किए जाने वाले मार्ग के समानांतर भारतीय सीमा में एक सड़क के उद्घाटन के साथ गतिरोध का यह नवीनतम दौर शुरू होता है. नेपाल में मानचित्र का विमोचन भी शीर्ष स्तर पर अब तक की सबसे कठोर भाव-भंगिमाओं के प्रदर्शन के साथ हुआ है, जिसमें ओली संसद में जानना चाहते हैं कि भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सत्यमेव जयते है या फिर शेर की शिकारी नजर! उनके द्वारा भारत के वायरस के चीन (कोरोनोवायरस के स्रोत) या इटली (कोरोना के कारण सबसे अधिक मौतों के साथ) की तुलना में ज्यादा खतरनाक बताने को, हमारी आंख में उंगली गड़ा देने के अलावा और कुछ नहीं समझा जा सकता है.
भारत-नेपाल संबंध बहुत पुराने और गहरे रहे हैं और इससे दोनों देशों के लोगों को अनगिनत तरीकों से फायदा होता रहा है. भारत के साथ नेपाल के जैसे रिश्ते रहे हैं, नेपाल उसकी किसी अन्य देश के साथ तुलना नहीं कर सकता और भारत की जगह कोई और देश ले भी नहीं सकता. भारत और नेपाल दोनों में ही सोशल मीडिया पर चीजों के बेलगाम प्रसार को देखते हुए, भारत को लक्ष्य करके उकसाने वाली राजनीति में दोनों देशों के बीच संबंधों को खराब करने की पूरी क्षमता है. बातचीत से ही इसका हल निकाला जा सकता है और इसके लिए दोनों देशों के बीच न केवल कोरोना से मुन्न्त द्विपक्षीय माहौल की जरूरत है, बल्कि इसे क्षेत्रीय और वैश्विक भू-राजनीति सहित अन्य खींचतान और उठापटक से भी मुक्त रखना होगा.
—मंजीव एस. पुरी नेपाल में भारत के पूर्व राजदूत हैं
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