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अर्थात्ः बदले की भाषा

पूरी विदेश नीति गले लगाने या गोली चलाने के बीच बंटी है जबकि कूटनीति इन दोनों के बीच खड़ी होती है.

अर्थात्
अर्थात्
अपडेटेड 12 सितंबर , 2019

कोई देश ऐसे मौके पर भी आर-पार की भाषा बोल सकता है जब उसकी अर्थव्यवस्था-ध्वस्त हो, मुद्रा और साख डूब चुकी हो, बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे पर खड़ा हो?

दुस्साहस की भी अपनी एक कूटनीति होती है. यही वह नया पाकिस्तान है जिसका जिक्र उसके प्रधानमंत्री इमरान खान ने किया और जो प्रामाणिक छद्म युद्ध (आतंकवाद) छेड़कर उसकी तरफदारी में प्रत्यक्ष युद्ध की चेतावनी दे रहा है.

चीनी युद्ध दार्शनिक सुन त्जु कहते थे, खुद को जानो, समझो अपने प्रतिद्वंद्वी को, फिर हजार लड़ाइयां बगैर तबाही के लड़ी जा सकती हैं.

हमने पाकिस्तान के सबसे बुरे वक्त का अपने लिए सबसे बुरा इस्तेमाल किया है. देखते-देखते पाकिस्तान ने वह कूटनीतिक करवट बदल ली. अब उसे आतंक का देश कहे जाने से फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसकी करवट ने बहुत कुछ हमेशा के लिए बदल दिया.

बात ज्यादा पुरानी नहीं है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री, मोदी सरकार के स्वागत समारोह में भाग लेकर इस्लामाबाद लौटे थे. तब पाकिस्तान अपने सबसे बुरे वक्त से गुजर रहा था. अफगानिस्तान से अमेरिकी और नाटो फौजों की वापसी के बाद विदेशी सहायता बंद हो चुकी थी. निवेश नदारद था और  अर्थव्यवस्था लगभग डूब चुकी थी. ठीक उसी वक्त पाकिस्तान ने अमेरिका से दूरी बनाकर अपना आर्थिक भविष्य चीन को सौंप दिया और चीन ने दुनिया के सबसे जोखिम भरे देश पर आर्थिक दांव लगा दिया.

पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों के आसमानी स्वागत के बीच, अप्रैल 2015 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग इस्लामाबाद पहुंचे और पाकिस्तान के साथ 46 अरब डॉलर की परियोजना (चीन पाकिस्तान आर्थिक कॉरिडोर) पर दस्तखत हो गए.

पाकिस्तान के जीडीपी के 20 फीसदी के बराबर निवेश के साथ चीन ने भारत के पड़ोसी की डूब चुकी अर्थव्यवस्था को गोद में उठा लिया. पाकिस्तान के इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक और निर्माण परियोजना (काश्गर से ग्वादर तक 3,000 किमी में फैली सड़कों, रेलवे, तेल-गैस पाइपलाइन, औद्योगिक पार्क का नेटवर्क) शुरू हो गई जिसके तहत बलूचिस्तान व पाक अधिकृत कश्मीर सहित पूरा पाकिस्तान चीन के प्रभाव में आ गया. पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी कंपनियों का ऊधम शुरू होते ही दक्षिण एशिया का कूटनीतिक संतुलन तब्दील हो गया.

भारतीय कूटनीति को उस आर्थिक संकट के वक्त, पाकिस्तान को चीन की शरण में जाने से रोकना था. चीन के करीब जाते ही पाकिस्तान में दो बदलाव हुए:

एक—पश्चिमी देशों ने पाकिस्तान में केवल अस्थायी सामरिक निवेश किया था, चीन ने वहां आर्थिक बुनियादी ढांचा बनाया. यह किसी भी हमले की स्थिति में पाकिस्तान का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच है

दो—पश्चिम के बरअक्स पाकिस्तान अब गैर लोकतांत्रिक कूटनीति की शरण में है, जिस पर दुनिया का नियंत्रण नहीं है

जबरदस्त वित्तीय संकट के बीच चीन पाकिस्तान का खर्चा चला रहा है. कुछ मदद सऊदी अरब दे रहा है. इमरान की गुर्राहट बताती है कि अगर भारत के विरोध की वजह से पाकिस्तान को आइएमएफ की मदद नहीं मिली तो चीन है न.

उड़ी का जवाब देकर भारत ने संयम की नियंत्रण रेखा पार करने का ऐलान कर दिया था लेकिन ध्यान रखना होगा कि हथियार वहीं उठते हैं जहां कूटनीति खत्म हो जाती है इसलिए पुलवामा के बाद पाकिस्तान को घेरने के लिए कूटनीति की शरण में जाना पड़ा.

पाकिस्तान को अलग-थलग करना ही एक विकल्प है और अगर आक्रामक कूटनीति की हिम्मत हो तो मौके अभी खत्म नहीं हुए हैं. अलबत्ता घेराव पूर्व से शुरू करना होगा यानी चीन की तरफ से.

यदि आतंक बढ़ता रहा तो ग्लोबल मंसूबों वाले चीन के लिए पाकिस्तान के साथ खड़ा रहना मुश्किल होगा. अगर किसी मंच (मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव) पर चीन को पाक के आतंक के पक्ष में खुलकर खड़ा दिखाया जा सके तो बड़ी सफलता होगी. अमेरिका के साथ सींग फंसाए और आर्थिक तौर पर परेशान चीन को इस समय भारतीय बाजार की जरूरत है. क्या हम इस मौके का इस्तेमाल कर सकते हैं? यह स्पष्ट है कि अब चीन से आंख मिलाए बिना पाकिस्तान को चौखटे में कसना नामुमकिन है

रूजवेल्ट कहते थे कम बोलो और छड़ी लंबी रखो, दूर तक जाओगे. पाकिस्तान को लेकर वाजपेयी और मोदी की उलझन एक जैसी है. पूरी विदेश नीति को हमने को गले लगाने या गोली चलाने के बीच बांट दिया है. कूटनीति इन दोनों के बीच खड़ी होती है. हमें पाकिस्तान से निबटने के लिए तीसरी भाषा का आविष्कार करना होगा. बदला सिर्फ उसी जबान में लिया जा सकेगा.

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