बहु कला केंद्र भारत भवन ने 13 फरवरी को अपनी स्थापना के 37 वर्ष पूरे कर 38वें में कदम रख दिया. भारत भवन सिर्फ कलाओं का घर नहीं, यह कला सौंदर्य से परिपूर्ण समाज गढऩे की एक उम्मीद है. भारत भवन सृजनात्मकता का आंगन है. माना गया है कि कलाओं में समय थमा रहता है. इसलिए भारत भवन कई सुनहरे समय बिंदुओं का संग्रहालय भी है. कलाधर्मिता को नागरिक समाज से जोड़ने में भारत भवन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
भारत भवन की वर्षगांठ पर एक प्रश्न करना अनिवार्य लग रहा है कि क्या हमारा कलाबोध और कलादृष्टि इतनी परिपक्व हुई है, जितनी हमें अपेक्षा थी. सचाई यह है कि कला निरक्षरता एक स्थिति नहीं समस्या बनकर उपस्थित हो गई है. बेशक कलाएं मन की अशुद्धियों को दूर करती हैं, इसलिए आज के प्रौद्योगिकी उन्मादी समाज में कलाओं की उपस्थिति पर विश्व स्तर पर चिंता व्यक्त की जा रही है.
भारत भवन का एक समय ऐसा भी गुजरा है कि जब कला प्रेमी समाज सांस्कृतिक गतिविधियों से एकाकार था. हर समय कुछ अप्रत्याशित होने की राह तकता था. कई अनूठे आयोजन आज भी कई लोगों की स्मृतियों में तरोताजा हैं, चाहे वह कविता एशिया हो या सारंगी उत्सव.
भारत भवन ने कलाओं का अप्रतिम वैभव देखा. निष्णात कलागुरुओं की वाणी सुनी. आज जितना रोमांच होता है उतनी ही निराशा भी होती है. विगत तीन दशकों में एक समस्या निरंतर बनी रही कि भारत भवन की पहचान अभिजात्य वर्ग की बौद्धिक विलासिता के पर्यटन स्थल के रूप में रही. सामान्य नागरिकों से इसका जुड़ाव बढ़ा या घटा, कुछ कहना मुश्किल है. आज कई महत्वपूर्ण आयोजनों में भी दर्शकों की संक्या न्यूनतम रहती है. तो क्या हम मानें कि जैसे-जैसे समय आगे बढ़ रहा है, हमारा कलाबोध भी कम होता जा रहा है? कला निरक्षरता निरंतर बढ़ रही है? आर्थिक विकास के आकलन में कला साक्षरता का कोई संकेतक नहीं जुड़ा है, इसलिए हमें अपनी स्थिति का पता नहीं होता. सौ प्रतिशत कला साक्षर आर्थिक रूप से विपन्न और आर्थिक रूप से समृद्ध व्यक्ति सौ प्रतिशत कला निरक्षर हो सकता है.
कला निरक्षरता को दूर करना एक चुनौती है. यह जिम्मेदारी आखिर किसकी है? यदि कला साक्षरता बढ़ाने का काम चलता रहता तो आज यह स्थिति नहीं होती कि हम गिटार को सितार और सितार को सरोद बोलें या ढोलक को मृदंगम और मृदंगम को ढोलक कहें. जब कलाकार यह कहते हैं कि हमारा कोई मोल नहीं रहा तो दुख होता है. क्या कला पारखी समाज सिमटता जा रहा है? कला सौंदर्य से विहीन समाज कितना नीरस होगा, इसकी कल्पना करना भी भयावह है.
कलाकारों का समय सिर्फ साधना में खर्च होना चाहिए. बेशक आर्थिक सुरक्षा जरूरी है. अनुकूल वातावरण और भी जरूरी है. इसलिए कलाकार कला साक्षरता बढ़ाने का काम करेंगे या करें, इसकी ज्यादा अपेक्षा ठीक नहीं. यह काम कला समीक्षकों, लेखकों, विद्वानों और शिक्षकों को सौंपना फिलहाल एक विकल्प दिखता है. स्पिक मैके जैसी संस्थाएं हैं लेकिन वे पुराने और नवोदित कलाकारों को मंच देकर समाज से परिचय कराने पर ज्यादा ध्यान देती हैं. कला साक्षरता बढ़ाने का काम फिर भी पीछे छूट जाता है.
पिछले साल जब गोंड चित्रकार भज्जूसिंह श्याम को पद्मश्री मिली तो कई पढ़े-लिखे लोगों ने पूछा कि यह कौन है भला? गोंड चित्रकला क्या होती है? वास्तव में हमें नहीं पता कि चित्रकला और गोंड चित्रकला में क्या अंतर है? यह स्थिति क्यों बनी? कला संसार की रचनात्मकता और नवाचारों से क्या हम ऐसे ही अनजान बने रहेंगे? आखिर कलाएं किसकी हैं और किसके लिए हैं? इन कलाओं के साधक कौन हैं? यदि कलाकार अपना पूरा जीवन साधना में लगा देता है और समाज को इससे कोई फर्क न पड़े तो यह भयावह स्थिति है. यह सही समय है कि कला साक्षरता को बढ़ाने के सभी संभावित तौर-तरीकों पर सोचें. भारत भवन की वर्षगांठ पर क्या यह संकल्प लिया जा सकता है?
अवनीश सोमकुवर मध्य प्रदेश सरकार के जनसंपर्क विभाग में उप संचालक हैं और शिक्षा-संस्कृति से जुड़े मुद्दों पर लिखते रहे हैं.
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