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मेहमान का पन्नाः गंगा से धोखाधड़ी

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट भी बढ़ते प्रदूषण की ओर इशारा कर रही है. यहां तक कि शंकरचार्य स्वामी अविमुकेश्वरनंद ने भी सार्वजनिक रूप से गंगा के मसले पर मोदी सरकार की विफलता पर टिप्प्णी की है

हिमांशु ठक्कर
हिमांशु ठक्कर
अपडेटेड 23 अक्टूबर , 2018

गंगा की रक्षा के लिए अनशन पर बैठे प्रोफेसर जी.डी अग्रवाल की 11 अक्तूबर, 2018 को मौत हो गई जिन्हें लोग स्वामी सानंद के नाम से भी जानते थे. उन्हें अन्न का त्याग किए हुए 111 दिन हो चुके थे. यह घटना नरेंद्र मोदी सरकार के गंगा की स्थिति को बेहतर करने की दिशा में उठाए गए कथित कदमों के पूरी तरह से विफल होने का संकेत देती है. दरअसल, प्रोफेसर अग्रवाल बार-बार यह कहते रहे कि मोदी ने गंगा को बचाने की शपथ ली थी, लेकिन उनकी सरकार के कार्यकाल में नदी की स्थिति और खराब हो गई है, क्योंकि गंगा जलमार्ग, नदी तट विकास परियोजना, चार धाम यात्रा मार्ग, नदियों को परस्पर जोडऩा और बड़ी संख्या में बांधों का निर्माण और नदी घाटी जल विद्युत परियोजनाएं जैसे कदम जो गंगा के विकास के नाम पर उठाए गए थे, वास्तव में उसे बचाने के बजाए, नुक्सान पहुंचा रहे हैं.

गौरतलब है कि प्रो. अग्रवाल को मोदी का सहयोगी माना जाता था, क्योंकि वे ऐसे परिवार से थे जो पीढिय़ों से आरएसएस समर्थक रहा है. संसद की स्थायी समिति, नियंत्रक और महालेखा परीक्षक और विश्व बैंक की रिपोर्ट समेत गंगा से जुड़ी कई स्वतंत्र रिपोर्ट का निष्कर्ष भी वही था जो अग्रवाल कहते रहे थे. केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की रिपोर्ट भी बढ़ते प्रदूषण की ओर इशारा कर रही है. यहां तक कि शंकरचार्य स्वामी अविमुकेश्वरनंद ने भी सार्वजनिक रूप से गंगा के मसले पर मोदी सरकार की विफलता पर टिप्प्णी की है.

मोदी ने सितंबर 2017 में उमा भारती को हटाकर नितिन गडकरी को जिम्मेदारी सौंपी थी. संभवतः वे यह संकेत देना चाहते थे कि तत्परता से काम करने वाले गडकरी बेहतर परिणाम देंगे. गडकरी तय सीमा में निर्धारित काम संभालने में अच्छे हो सकते हैं, लेकिन गंगा को प्रदूषण से मुक्त कर उसे फिर से जीवनदायिनी बनाना उनके बस में नहीं. गंगा पर गडकरी के बयान उनके दिशाहीन संकल्प और लक्ष्य के प्रति उदासीनता को दिखाते हैं. उन्होंने शुरुआत में कहा था कि वे मार्च 2019 तक गंगा को 80 प्रतिशत तक स्वच्छ बना देंगे और दिसंबर 2019 तक गंगा 90 प्रतिशत तक स्वच्छ हो जाएगी. उनका सबसे ताजा बयान है कि उनका मंत्रालय मार्च 2019 तक गंगा को 70 फीसदी स्वच्छ बना देगा.

लेकिन उन्होंने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि यह लक्ष्य वे किन मानकों, किस स्थान और किन बुनियादी आधारों पर हासिल करेंगे. नदी की मौजूदा स्थिति और उसके प्रवाह मार्ग को देखते हुए लक्ष्य असंभव दिख रहा है. शायद वे यह कहना चाहते होंगे कि मार्च 2019 तक वे सभी परियोजनाओं को मंजूरी दे देंगे और विश्व बैंक की सहायता से चलाई जा रही गंगा सफाई परियोजना को आवंटित राशि में से ज्यादातर हिस्सा खर्च कर देंगे. लेकिन परियोजनाओं को मंजूर करना या परियोजना के तहत आवंटित पूरी राशि बांटना और गंगा को स्वच्छ रूप देना बिल्कुल अलग बात है. मोदी का नमामि गंगे भी इसी दिशा में चलता दिख रहा हैः ज्यादा से ज्यादा धन का आवंटन, ज्यादा से ज्यादा बुनियादी ढांचे की योजना और चंद प्रौद्योगिकी जो 1980 के दशक से गंगा कार्य योजना के संबंध में कागजों पर जोरदार दिखती रही हैं, पर जमीनी स्तर पर गंगा के अस्तित्व पर मंडराते बादलों को और स्याह करती आई हैं.

यह सुनिश्चित करने का कोई प्रयास नहीं हुआ कि जिस बुनियादी ढांचे को तैयार किया गया उसके जरिए काम हो और सार्थक नतीजा सामने आए. नमामि गंगे के अहम उद्देश्य अवरिल गंगा को हासिल करने के कोई प्रयास नहीं हुए. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बार-बार कहा है कि अविरल गंगा का लक्ष्य हासिल किए बगैर निर्मल गंगा संभव नहीं.

गडकरी ने अग्रवाल की मौत के एक दिन पहले 10 अक्तूबर, 2018 को पर्यावरण प्रवाह संबंधी नोटिफिकेशन जारी किया. यह पर्याप्त नहीं था और तब तक काफी देर भी हो चुकी थी. न तो इसमें लक्ष्य को लेकर कोई गंभीरता थी, न कोई वैज्ञानिक नजरिया. इसके खिलाफ अग्रवाल का विरोध बिल्कुल सही था. मोदी को लिखी अपनी चिट्ठी में उन्होंने जिन मांगों की सूची दी थी, वे अलग थीः ऊपरी गंगा घाटी में सभी निर्माणाधीन या भावी जल विद्युत परियोजनाएं बंद करें, रेत और पत्थरों का खनन बंद करें, खासकर जो हरिद्वार के करीब हैं, गंगा संरक्षण विधेयक पारित करें और गंगा के प्रति समर्पित व्यक्तियों की एक परिषद बनाएं और गंगा से जुड़े किसी भी काम के लिए उसकी सहमति अनिवार्य की जाए.

मोदी ने 2012 में उनके उपवास के समर्थन में ट्वीट किया था, लेकिन इस साल फरवरी से अनशन पर बैठे अग्रवाल की चिट्ठियों का जवाब देने की फुरसत उन्हें नहीं मिली. प्रधानमंत्री को अग्रवाल की पहली चिट्ठी से ही बेचैन होकर सही दिशा में कदम उठाना चाहिए था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि अगर वे मर गए तो मां गंगा से प्रार्थना करेंगे कि उनकी मौत का जिम्मेदार मोदी को ठहराया जाए. अग्रवाल के देहांत के बाद मोदी को आखिर समय मिल ही गया और उन्होंने उनकी मौत पर ट्वीट किया. पर कई लोगों को अग्रवाल के प्रति उनकी संवेदना और गंगा बचाने का संकल्प ढोंग लग रहा है.

हिमांशु ठक्कर साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैक्वस,

रिवर्स ऐंड पीपल के कोऑर्डिनेटर हैं

प्रधानमंत्री को अग्रवाल की पहली चिट्ठी से ही कदम उठाना चाहिए था जिसमें उन्होंने लिखा था कि अगर वे मर गए तो मोदी को इसका जिम्मेदार ठहराया जाए

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